SEBA Class 9 Hindi (Elective) Solution| निबंध 

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SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER

SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (ASSAMESE MEDIUM)

SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (BANGLA MEDIUM)

SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (ENGLISH MEDIUM)

SEBA Class 9 Hindi (Elective) Solution| निबंध

SEBA Class 9 Hindi (Elective) Solution| निबंध ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

1. असम का प्राकृतिक सैंदर्य 

भारत के पूर्वोत्तर में अवस्थित एक छोटा-सा राज्य है असम । यह प्राकृतिक संपदाओं का भंडार हैं, साथ ही प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध भी हैं। असम प्रकृति का लीलाभूमि है। यह राज्य चारों ओर पर्वत पहाड़ों से घिरा हुआ है। प्रकृति का इतना सुंदर रूप भारत के दूसरे स्थान पर दिखाई नहीं देते । नदी पहाड़ वन जंगलों से घिरा हुआ असम का यह रूप अपूर्व – है। लगता है प्रकृतिने अपने सौंदर्य को ढाल कर असम को सजाया है। असंख्य पहाड़ों से घिरा हुआ यह राज्य है। असम के प्राकृतिक सौंदर्य का एक प्रधान उपादान है ब्रह्मपुत्र नद पहाड़ों के बीच ऐसा वृहद नद खूब कम ही दिखाई देता है। ब्रह्मपुत्र का और एक नाम है। लुइत। ब्रह्मपुत्र नद की असंख्य शाखा प्रशाखाओं ने असम को और भी सुंदर बना दिया है। असम के सौंदर्य का और एक उपादान है, यहां के वन जंगल। इतना घना हरियाली से भरा हुआ वनभूमि सब जगह दिखाई नहीं देता वनभूमि में शोल, देवदारु, वन-वृक्षों से भरा हुआ है। असम का प्रकृति ऋतु परिवर्तन से और भी सुंदर हो जाता है। ग्रीष्म का प्रखर ताप असम में नहीं होता। ग्रीष्म में भी असम में हरियाली ही छायी रहती है। वृक्षों में नये पत्ते जन्म लेते हैं, चारों और फूलों के सुगंध, वन जंगलों में पक्षियों के यह चहचहाना । ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु का आगमन होता है। साथ ही प्रकृति मानों नये सौंदर्य से रहस्यमयी हो जाती है। नील पहाड़ो के बीच घने बादल छा जाते हैं। असम में शरद ऋतु बहुत कम समय तक रहती है। वर्षा के शांत होने से पहले ही शीत आ जाती है। चारों ओर शीत का प्रभाव पड़ता है। उसके बाद बसंत ऋतु का आगमन होता है। यह असम की श्रेष्ठ ऋतु है। नाना प्रकार के फूलों से असम और भी सुंदर हो उठता है। 

असम के बाहर वालों की धारणा है कि असम जादू का राज्य है, जो एक बार आता है, वे फिर लौट कर नहीं जाते। वे जादू हैं असम के प्राकृतिक सौंदर्य के आकर्षण और सुख-सुविधा ।

2. विद्यार्थी और राजनीति 

विद्यार्थी जीवन अध्ययन का काल होता है। अध्ययन तपस्या है। एकाग्रचित्तता अध्ययन को पूर्ण और सार्थक बनाती है। अध्ययन का अर्थ होता है— सीखना। पढ़ने के समय छात्रों का ध्यान पूर्ण रूप से अपने विषय की ओर होना चाहिए। यदि विद्यार्थी अध्ययन काल में राजनीति में रुचि लेने लगते हैं तो निश्चित रूप से इससे उनके अध्ययन में व्यवधान पड़ता है। विद्यार्थियों को हर प्रकार की राजनीति से दूर रह कर केवल अध्ययन में मन लगाना चाहिए

ताकि उनका मन-मस्तिष्क होताजा और स्वस्थ रह सके जिससे भविष्य में वे अच्छे नागरिक सिद्ध होने के साथ-साथ हर क्षेत्र में देश की बागडोर भी सफलता के साथ सम्भाल सकें। 

वैदिक काल में विद्यार्थी वेदों का अध्ययन करते थे। अध्ययनकाल में उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं था। आधुनिक काल में जीवन की जटिलता के चलते विद्यार्थियों को राजनीति के निकट आने की विवशता है। छात्र जीवन ज्ञानार्जन का काल होता है। इसमें कुटनीति और जाल फरेब का कोई स्थान नहीं होता। अध्ययन काल में छात्रों का राजनीतिक घटनाचक्रों से परिचित होना एकदम आवश्यक है पर उनमें शरीक होना ठीक नहीं है। विद्यार्थी राष्ट्र के भावी कर्णधार हैं। इन्हें देश को राजनीतिक व्यभिचार से मुक्त करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। राजनीति समाज नीति का ही अंग है। छात्र समाज से जुड़े हैं। राजनीति समाज को बहुत हद तक प्रभावित करती है। विद्यार्थी को राजनीति के क्षेत्र में भी अन्य पढ़ाई की तरह विद्यार्थी बने रह कर ही भाग लेना चाहिए अर्थात् सभी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों को गहराई से देख समझने की कोशिश करनी चाहिए। यदि वे अपनी पढ़ाई करते हुए राजनीति के सभी रूपों का अध्ययन करते रहेंगे, तो स्वस्थ राजनीतिक मार्ग का निर्णय कर पाने में समर्थ होकर कल को वास्तव में देश की बागडोर सम्भाल पाएँगे। 

   3. मातृभाषा का महत्व 

जन्म के बाद बच्चे जिस माध्यम से अपने भाव का आदान-प्रदान करते हैं, उसे ही मातृभाषा की संज्ञा दी जाती है। मानव जीवन के ऊपर मातृभाषा भी उसी प्रकार प्रभाव डालती है, जिस प्रकार एक व्याक्ति के ऊपर अपनी माँ का प्रभाव रहता है। जीवन के आरम्भ से ही बच्चा मातृभाषा में भाव विनिमय करना सीखता है। एक तरफ माता हमें जन्म देकर बाल्यकाल में पालन-पोषण करती है और दूसरी तरक मातृभूमि हमें खेलने-कूदने और सांसारिक जीवन निर्वाह के लिए जगह देती है ठीक उसी प्रकार जीवन के भाव के विकास के लिए मातृभाषा का प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण है। मातृभाषा के जरिये सभी प्रकार के भावों का विनिमय आसानी से हो सकता है। जो दूसरे किसी भाषा के जरिए सम्भव नही हो सकता। इसलिए सभी व्यक्ति को अपनी मातृभाषा का आदर करना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी मातृभाषा का आदर नहीं करता, वह अपनी मातृभाषा की उन्नति तथा उसके साहित्य की उन्नति कदापि नहीं कर सकता। 

मातृभाषा की नींव दृढ़ किये बिना स्वराज की नींव दृढ़ नही हो सकती। यह बात सही है। क्योंकि यह देखा जाता है कि किसी भी देश की उन्नति के लिए उसकी राष्ट्रभाषा या मातृभाषा आवश्यक है। भारत जैसे देशों के राष्ट्रभाषा की उन्नति के लिए प्रान्तीय भाषा की उन्नति करना अत्यावश्यक है। राष्ट्रभाषा और प्रान्तीय भाषा का अत्यंत गहरा सम्पर्क है। इसलिए मातृभाषा और मातृभूमि का संबंध गहरा माना जाता है। अपनी मातृभूमि में अपनी मातृभाषा रहने पर ही उस जाति में जातीयता, एकता तथा संता रहती है। हमलोग सभी प्रकार के भावों को जितनी आसानी से विनिमय कर सकते हैं, दूसरी भाषा में यह नहीं कर सकते हैं। सभी प्रकार के भावों का या ज्ञान ज्ञान-विज्ञान तथा अनजान विषय की बातें मातृभाषा की उन्नति पर ही अपनी संस्कृति, राष्ट्रीयता तथा अपने साहित्य की उन्नति निर्भर करती है। अपने देश की संस्कृति एकता, राष्ट्रीयता तथा अपने साहित्य के विकास के लिए अपनी मातृभाषा को विकसित करना पहला काम होता है। देश के सभी नागरिकों का यह कर्तव्य होता है कि यह मातृभाषा की उन्नति के लिए तन-मन लगाकर काम करें। 

4. मेरे जीवन का लक्ष्य 

लक्ष्यहीन जीवन और पतवार विहीन नाव कभी सार्थकता का किनारा स्पर्श नहीं कर सकता। मानव महत्वाकांक्षी प्राणी है, उसका लक्ष्य अपने जीवन को सार्थक बनाना है। जिसके हृदय में दृढ़ संकल्प, अदम्य साहस और काम करने की लगन होती है वह अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा कर लेता है। मानव जीवन सोना उगाने के लिए एवं उसके लिए ठीक बीज रोपण और कठोर परिश्रम व साधना की आवश्यकता होती है और जीवन के पथ पर चलने के लिए आवश्यक है निर्दिष्ट एक सुपरिकल्पित पथ संकेत। इसलिए जीवन के प्रारम्भ में ही लक्ष्य दृढ स्थिर होना चाहिए। 

मुझे अपने भावी जीवन के लिए ऐसा लक्ष्य चुनना होगा, जिससे न सिर्फ अपने जीवन को सुख-शान्ति मिले बल्कि समाज तथा राष्ट्र का भी हित हो सके। मेरी चिर अभिलाषा आदर्श अध्यापक बनने की रही है। शिक्षण काल से ही मेरी पढ़ने-पढ़ाने की रुचि रही है। तभी से मैंने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लिया कि मुझे आदर्श अध्यापक बनना है, शिक्षक जीवन के प्रति मेरा आकर्षण का कारण है, एक शिक्षक, जो किसी भी श्रेणी का क्यों न हो, वह अपने कर्त्तव्य एवं दायित्व पालन में प्रतिज्ञाबद्ध है। बच्चे व युवक- युवतियों के सामने विश्व के ज्ञान भंडार का द्वार खोलने का गौरवपूर्ण कृतित्व वे ही प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का मार्ग-दर्शक ये शिक्षक ही जाति का मेरूदण्ड निर्माण करते है। शिक्षक अपने प्रत्येक छात्र में आदर्श का बीज रोपण करते है। यही कालक्रम में फूलों जैसे विकसित होकर पूरी जाति व देश के कल्याण में लगा देते हैं। 

आदर्श अध्यापक बनने के पूर्व मुझे आदर्श विद्यार्थी बनना होगा। इसके लिए मुझे कठिन साधना करनी पड़ेगी, तभी इच्छित सिद्धि प्राप्त हो पाएगी। मुझे तपस्वी के समान तपस्या, सैनिक के समान अनुशासन और धरा के समान सहनशीलता अपनानी होगी। वह गुरुता और महिमा की प्रतिभा विद्या का प्रकाश स्तम्भ है। उसका पुनीत कर्त्तव्य है, शिष्यों के अज्ञानांधकार को दूर करना है। मेरा विचार है कि विद्या ही सर्वोतम धन है, इसका दान ही सबसे बड़ा दान है। मेरे जीवन की सार्थकता तभी होगी, जब मैं नश्वर देह को आजीवन विद्या दान करते पाऊँगा, कोशिश करूँगा हजारों-लाखों अन्धकारमय जीवन में शिक्षा की ज्योति सूर्यलोक ढोकर लाने में यदि एक प्राण को भी आलोकमय कर सका तो अपने को सार्थक मानूँगा। 

Sl. No.Contents
Chapter 1हिम्मत और जिंदगी
Chapter 2परीक्षा
Chapter 3बिंदु बिंदु विचार
Chapter 4चिड़िया की बच्ची
Chapter 5आप भोले तो जग भला
Chapter 6चिकित्सा का चक्कर
Chapter 7अपराजिता
Chapter 8मणि-कांचन संयोग
Chapter 9कृष्ण- महिमा
Chapter 10दोहा दशक
Chapter 11नर हो, न निराश करो मन को
Chapter 12मुरझाया फुल
Chapter 13गाँँव से शहर की ओर
Chapter 14साबरमती के संत
Chapter 15चरैवेती
Chapter 16टूटा पहिया
निबंध 

5. समाचार पत्र 

प्रतिदिन विश्व में घटित घटनाओं को हमारे सामने कराते हैं समाचार पत्र समाचार पत्र, जो आज हमारे दैनन्दिन जीवन के अंग बन चुके है। विश्व में रहने वालो विभिन्न जाति- उपजातियों के बीच संयोग बनाये रखने वाला एकमात्र माध्यम है समाचार पत्र । विज्ञान की प्रगति से विश्व को हमारे सामने लाते हैं समाचार पत्र। गणतंत्र के चार स्तम्भ हैं- सरकार, सदन, अदालत और समाचार पत्र प्रत्येक गणतांत्रिक देश में ये चार स्तम्भ रहते हैं। इसीलिए आज के युग में समाचार पत्र समाज में एक उच्च स्थान लेने में समर्थ हुए हैं। 

प्राचीन काल में वर्तमान युग की तरह समाचार पत्र का प्रचलन नहीं था। प्राचीन काल में एक राज्य से दूसरे राज्य तक समाचार ले जाने के लिए राजदूत, प्ररिव्राजक आदि का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन विज्ञान की प्रगति से आज संवाद माध्यम का महत्व भी बढ़ गया है। 

सर्वप्रथम विश्व में समाचार पत्र का प्रचलन चीन में हुआ था। क्योंकि छापाखाखाना का आविष्कार चीन में ही हुआ था। युरोप में वेनिस शहर में समाचार पत्र का प्रचलन हुआ। उसका नाम था “गेजेटा”। इसी से गेजेट शब्द का उद्भव हुआ है। इग्लैण्ड में रानी एलिजाबेथ के दिन से समाचार पत्र का प्रचलन हुआ था। भारत में समाचार पत्र का प्रचलन हुआ था, उसका नाम था “इण्डिया गेजेट”। इसके बाद से विभिन्न देशी भाषा में समाचार पत्र प्रकाशित होने लगे। 

अंग्रेजो ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए “समाचार दर्पण’ नामक एक समाचार पत्र का प्रचलन किया था। इसमे “ईसाई धर्म का मतवाद तथा आदर्श का प्रचार किया जाता था। “राजाराम मोहन राय प्रथम भारतीय हैं जिन्होंने “पत्र कौमुदी” नामक समाचार पत्र का सम्पादन किया था। 

आजकल दैनिक, अर्द्ध साप्ताहिक, अर्द्धमासिक, मासिक, त्रैमासिक, समाचार पत्र निकलते हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर दैनिक पत्र होते हैं। 

“अरुणोदय” सर्वप्रथम अर्द्ध असमीया पत्र है। सन् १८४६ में अरुणोदय का प्रकाशन हुआ था। इसके बाद से असमीया भाषा में विभिन्न समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ था। जैसे- “आसाम वान्धव”, “आसाम विलासनी”, “मौ”, “वाँही”, “जोनाकी”, “आवाहन”, “अरुण”, “अकण”, “रामधेनु”, “दीपक”, “सादिनीया असमीया”, “नाम नाई”, “महाजाति” आदि। आजकल के प्रचलित पत्रों में दैनिक असम, असम ट्रिब्यून, असम वाणी, आजिर असम, सेंटिनल, पूर्वांचल प्रहरी, सादिन प्रतिदिन आदि प्रधान हैं।

निष्पक्ष और शुद्ध समाचार का प्रचार करना समाचार पत्र का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। समाचार पत्र को इस संदर्भ में ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि एक अशुद्ध और अन्याय समाचार का प्रसार समाज में विश्रृंखलता पैदा कर सकता है। प्रतिदिन विश्व में घटित विभिन्न घटना, संस्कृति, राजनीति, विज्ञान, अर्थनीति, शिक्षा, व्यापार, आमोद- प्रमोद, खेल, समाजनीति आदि का शुद्ध आर तत्काल प्रचार करने में ही समाचार पत्र की सार्थकता होती है। काल्पनिक, अशुद्ध वार्ता प्रचार से जनगण- विभ्रान्त एवं विपथगामी होते हैं। इसलिए चाहिए कि संवाद पत्र सदा अशुद्ध अंश को छोड़कर शुद्ध अंश को ही जनगण को दें। तब ही एक समाचार पत्र का जनता आदर करती है। अगर अपनी मूल नीति को छोड़कर किसी समाचार पत्र किसी राजनैतिक दल और किसी व्यक्ति का गुणवान करने लगे तो उसे जनता त्याग देती है। जनता सदा यही चाहती है कि समाचार पत्र निर्भीक, निरपेक्ष, उन्मुक्त होकर अपने दायित्व का पालन करें। 

    6. पुस्तकालय 

ज्ञान प्राप्ति के दो साधन होते हैं। एक है विद्यालय और दूसरा पुस्तकालय स्वस्थ व्यक्ति का मानसिक विकास उच्च ज्ञान की अवधारण से होती है। मनुष्य की अज्ञानता को दूर करने के लिए एकमात्र साधन है पुस्तक। पुस्तक के अध्ययन से मन में रहने वाली अज्ञानता दूर होने के साथ-साथ नये विचार बुद्धि का उदय होता है। इससे मानसिक विकास होता है। 

पुस्तकालय का अर्थ है पुस्तकों का एक विशाल घर ज्ञान प्राप्ति में अधिकांश योगदान देने के लिए पुस्तकालय का होना आवश्यक है। पुस्तक के अध्ययन से मनुष्य की मानसिक शान्ति तथा मनोरंजन की प्राप्ति होती है। इससे मानसिक तनाव भी दूर होता है। अपने देश को संस्कृति सभ्यता आदि के बारे में ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। हमारे पूर्वजों की कर्म पद्धति, विचार, ज्ञान से परिचित होने के लिए पुस्तकों को पढ़ना जरूरी है। पुस्तकालय दो तरह का होता है। (१) निजी पुस्तकालय और (२) सार्वजनिक पुस्तकालय निजी पुस्तकालय किसी संपन्न अध्ययन प्रेमी के घर में होते हैं। वे अपने धन से पुस्तकें खरीदकर एकत्रित करते हैं। इन पुस्तकालयों पर उस एक व्यक्ति का नियंत्रण रहता है। किसी अन्य व्यक्ति को पुस्तक अध्ययन करने के लिए इस पुस्तकालय के अधिकारी से अनुज्ञा प्राप्त करना आवश्यक है, लेकिन सार्वजानिक पुस्तकालय होता है, जहाँ सभी प्रकार के लोग अपनी मर्जी से यहाँ अध्ययन कर सकते हैं। राज्य के प्रत्येक जिलाओं में एक-एक ऐसे सार्वजनिक पुस्तकालय हैं। इस तरह के पुस्तकालय पर पूरी तरह से जनता का नियंत्रण रहता है। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुकूल पुस्तके पढ़ सकता है। क्योंकि इस तरह के पुस्तकालय की स्थापना जनता के अध्ययन के लिए की जाती है। गरीब-अमीर आदि सभी तरह के लोग यहाँ एक साथ अध्ययन कर सकते हैं।

पुस्तकालय पर सरस्वती का निवास होता है। एक अच्छा पुस्तकालय बनाने के लिए इसमें पूरी मात्रा में पुस्तकें उपलब्ध होनी चाहिए। प्रत्येक व्याक्ति अध्ययन के लिए आग्रही हो, उसकी संचालन व्यवस्था अच्छी हो तब एक आदर्श पुस्तकालय बन सकता है। पुस्तकालय के विकास से राष्ट्र का भी कल्याण होता है। 

7. प्रदूषण 

प्रदूषण का अर्थ है– दूषित वातावरण अर्थात् प्राकृतिक असंतुलन, यह मानव निर्मित एक प्राकृतिक विपदा है। प्राकृतिक असंतुलन से आज प्रदूषण काफी बढ़ गया है। मानव चूँकि सबसे बुद्धिमान प्राणी है, ईश्वर ने सभी जीवों से मानव को बुद्धि ज्यादा दी है और इसी बुद्धि के बलबुते पर मनुष्य आकाशचुम्बी सपने देखता है और अपने सपने को साकार करने के लिए नित्य नये आविष्कार करते रहते हैं। धरती से आसमान को छूने की चाहत में नित्य नये आविष्कार करते गये। फलस्वरुप राकेट, हवाई जहाज बड़े-बड़े कल- कारखानने बने। नतीजा वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की मात्रा बढ़ गई। मनुष्य निर्मित यह प्रदूषण की समस्या विश्वव्यापी हैं। हमारा देश विकासशील है और हम औद्योगीकरण ही दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। विकसित देश में बड़े पैमाने पर कल-कारखाने और तेज वाहनों के कारण प्रदूषण सारे वायुमण्डल में फैलकर फ्लोरा कार्बन गैस की मात्रा बढ़ा दी है। कारखानों से लगातार कचरें निकल रहे हैं जो प्राय: जलाशयों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं। कहीं-कहीं खुली भूमि में भी कचरे डाले जाते हैं। इन कचरों में बहुत तरह के जहरीले रसायन होते हैं जो हवा, पानी और भूमि को इषित करते हैं। कृषि भूमि पर कीटनाशक दवाओं का प्रयोग धीरे-धीरे मानवदेह में भयंकर विप संचार कर रहा है। शहर निर्माण के लिए पेड़ों को काट कर परिवेश प्रदूषित कर रहे हैं। वृक्षों को ध्वंस करने से सिर्फ मनुष्य का नेत्र श्यामल स्निग्धा से वंचित नही होता, बल्कि परिवेश का भारसाम्य भी नष्ट होता है। 

ईश्वर एक अम्लान सुन्दर पृथ्वी में हम सबको प्रेरण किये थे पर हमलोग अपने सुख के लिए उसकी पवित्रता और सोन्दर्य को ध्वंस कर रहे है। मनुष्य के द्वारा गठित सभ्यता का अन्यतम कुफल है यह प्रदूषण वर्तमान में सुख-सुविधाओं के लोभ में जिन्दगी भर के लिए ईश्वर द्वारा सजाया गया निसर्ग-संसार को नष्ट कर रहे है।

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