SEBA Class 9 Hindi (Elective) Solution| Chapter-15| चरैवेती

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SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER

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SEBA Class 9 Hindi (Elective) Solution| Chapter-15| चरैवेती

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पाठ 15 

कवि परिचय-नरेश मेहता  : नरेश मेहता का जन्म 1922 ई. में मालवा (मध्य प्रदेश) के शाजापुर कस्बे में हुआ था। सन् 2000 ई. में इनका स्वर्गवास हुआ। नरेश मेहता ने आरम्भ में आज और संसार (दैनिक समाचार पत्र) में काम किया। आगे चलकर उन्होंने राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के साप्ताहिक पत्र भारतीय श्रमिक का संपादन किया, उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका कृतिका का भी संपादन किया था। उन्हें मध्यप्रदेश शासन सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

उनको मुख्य काव्य रचनाएँ हैं- महाप्रस्थान, संशय की एक रात, प्रवाद पर्व, मेरा समर्पित एकांत, वनपाखी सुनो तथा प्रार्थना। 

1. चलते चलो ………..चंदा के संग-संग चलते चलो। 

भावार्थ : कवि ने सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। जिस प्रकार सूरज, चन्दा तारे ये हमारे आदिम प्रतिविम्ब है उनके संग-संग हमें भी चलना है। सूरज अनादि काल से अपनी किरणों से हम मानव को जीवन दान दिया जग को रोशन किया। इन्हीं के साथ चलते हुए हम भी युग परिवर्तन कर पाएँगे, सूरज की किरणें रात के अन्धकार को ऊषा की किरणों से मुक्त करती है। अपनी रोशनी से शाश्वत नभ का नीला रंग विकास करता है और धरती को सुनहरी रोशनी से रंग देती है। यही शाश्वत नियम है। सूर्यास्त के बाद सूरज डूब जाता है और रात अपनी आँचल फैलाकर अन्धकार को अपने में समेट लेती है। और इस निशा को चांद तारे अपनी स्निग्ध से भर देती है। इस प्रकार समय, ऋतुओं के साथ सूरज का विजय पथ प्रकाशित होता है और यहीं जीवन का शाश्वत प्रमाण है। हमें सूरज चंदा के साथ चलते चलते युग परिवर्तन करना है। 

2. रत्नमयी वसुधा पर.. …………संवत् के संग-संग चलते चलो। 

भावार्थ: कवि कहते है यह वसुधा रत्नभण्डार है। सृष्टि कर्ता ने मानव के साथ-साथ धरती को भी प्रकृति के सम्पद से परिपूर्ण किया और सृष्टि कर्ता ने हमें इस सुन्दर वसुधा पर चलने के लिए पैर दिये। मानव ही सृष्टि का श्रेष्ठ श्रृंगार 

है। इस प्रकार पुरातन से चल कर ही हम सुवर्ण काल ला सकते हैं। धरती में बिखरे मोतियों को समेट कर नव निर्माण करेगें। इस युग में हम मुक्त हुए हमे अस्तित्व ज्ञान मिला ईश्वर की अमरत्व दान मिला, इस जीवन के कर्णधार है। इस प्रकार हम क्षितिज पार कर अपनी सृष्टि निर्माण दिखाया, अतः समय के साथ ऋतुओं के साथ चलकर ही हम प्रगति ला सकते हैं। 

3. नदियों ने चल.. ..युग के ही संग-संग चलते चले। 

भावार्थ : कवि कहते है ये विशाल सागर जिसके अतल गहन में मोती बिखरे पड़े है। ये सागर रूप एक दिन में नहीं बना। नदियों ने ही चलकर सागर का रूप दिया। उसी प्रकार नदी के समान अपनी धारा में बहते बहते नवचेतन ला सकते हैं। युग परिवर्तन कर सकते हैं। मेघ भी अपनी वारि से धरती को निमग्न करता है यही सृष्टि का धर्म है और इस शाश्वत नियम से विमुख होने से ही जीवन थम जाएगा अधीत रूकने का नाम ही मरण है। अर्थात पुरातन से जुड़े रहने से हम प्रगति नहीं ला सकते, अतीत हमारे लिए गौरवशाली है पर सामने विस्तृत संसार है अतः युग के साथ चलकर ही हम रंग महल बना सकते हैं। अतः युग के साथ चलकर ही हम समृद्धि ला सकते हैं। 

4. मानव जिस ओर गया…….. नूतन के संग-संग चलते चलो। 

भावार्थ : मानव निरंतर प्रयत्नशील होकर चलते हुए आज यहाँ आ पहुँचा है। आज आदिम प्रतिबिम्ब के साथ चलते हुए हम जिधर गये उधर ही नगरों का निर्माण किया, व्योम से पाताल तक विजय प्राप्त की, धरती पर मंदिर बनाकर तीर्थ स्थान बनाया, प्रकृति के तत्व को अपने वश में किया, इस प्रकार युग के साथ चलते-चलते धरती, अम्बर सबको अपना मित्र बनाया, धरित्री पर अमृत की धारा को पान किया। जिस प्रकार मानव पुराना वस्त्र त्याग कर नूतन वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आदिम प्रतिविम्ब के साथ चलते हुए अपने ज्ञान विज्ञान के आलोक से नयी क्रान्ति लाएँगे एक नया इतिहास रचाएँगे। 

अभ्यासमाला 

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो : 

प्रश्न: 1. ‘चलते चलो’ का संदेश कवि ने किसे दिया है ? 

उत्तर : चलते चलो में कवि ने मानव जाति को आगे बढ़ने को कहा है। सूर्य, तारे, नदी, मेघ आदि आदिम प्रतिविम्व है। ये अनादि-आदि काल से चलते आये है और ये हमारे लिए स्वाधीनता, प्रगति, विकास तथा समृद्धि के प्रतीक बने। इन्हीं के साथ चलकर ही आज हम यहाँ पहुँचे। निरंतर जीवन लक्ष्य को ओर बढ़ते जाना ही जीवन की सार्थकता है। 

प्रश्न : 2. कवि ने वसुधा को रत्नमयी क्यों कहा है? 

उत्तर: कवि वसुधा को रत्नमयी इसलिए कहा है क्योंकि वसुधा रत्नों से सम्पन्न है। यह ईश्वर का वरदान है। चित्रमयी धरती कोसों दूर तक फैली है वन पेड़ों से परिपूर्ण है, खेत खलिहानो से भरी यह धरती रंग-विरंगी फसलों से भरी यह धरती सम्पदों का भण्डार है, सागर के अन्तर में छुपे रत्न है। कवि ने इसीलिए वसुधा को रत्नमयी कहा है। 

प्रश्न: 3. कवि ने किस-किस के साथ निरंतर चलने का संदेश दिया है ? 

उत्तर: कवि ने हमारे आदिम प्रतिविम्ब सूर्य, तारे, नदी के साथ निरंतर चलने को कहा है क्योंकि ये हमारे लिए विकास और समृद्धि के प्रतीक हैं, सृष्टि से आदि तक ये मानव को कर्तव्य का पाठ पढ़ाते आये हैं, इन्ही के पदचिह्न पर चलकर आज हम अपने लक्ष्य पर पहुँच पाए और युग परिवर्तन कर पाएंगे। 

प्रश्न 4. किन पंक्तियों में कवि ने मनुष्य की सामर्थ्य और अजेयता का उल्लेख किया है? 

उत्तर: कवि ने आज तुम्हें मुक्ति मिली’ पंक्तियों में मनुष्य की सामर्थ्य और अजेयता का उल्लेख किया है। आदि से उत्पन्न बिम्बों के साथ चलकर हम वर्तमान में आये है। अपने परिश्रम एवं सामर्थ्य से व्योम से पाताल तक विजय प्राप्त किये, प्रकृति के तत्वों में परिवर्तन लाये, नई-नई सृष्टियाँ रची, ज्ञान विज्ञान का देश बनाया, इस प्रकार हम मानव प्रेमी नव भू-स्वर्ग बसाकर धरती को समृद्ध बनाया। 

प्रश्न: 5. निरंतर प्रयत्नशील मनुष्य को कौन-कौन से सुख प्राप्त होता है ? 

उत्तर : निरंतर प्रयत्नशील मनुष्य को उसका आत्मबल और आत्मविश्वास ही लक्ष्य तक पहुंचाता है जो विषम परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देता है वह कभी भी उन्नति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। जीवन की सार्थकता प्रयत्नशील रहने में ही है और इस तरह हम युग परिवर्तन करके रंग महल बनाये प्रकृति के सम्पदों को उपभोग किया, नदियों की अमृत धारा पान किये। 

प्रश्न : 6. ‘रूकने को मरण’ कहना कहाँ तक उचित है ? 

उत्तर : ‘रूकने को मरण’ कहना अर्थात जीवन चलने का नाम है, और धम जाना ही मरण है। हम सृष्टि के गति के साथ चलते हुए पुरातन से वर्तमान में आये है, परिस्थितियों से जूझ कर समझौता किया, आत्मनिर्भर बने इस प्रकार सफलता के सोपान पर चढ़ पाये। इस प्रकार नई दिशाओं और संभावनाओं मार्ग खुल गये। अतः हम युग परिवर्तन न लाकर यदि रूक जाये तो लिए मरण के समान है। 

प्रश्न : 7. कवि ने मनुष्य को ‘तुमसे हैं कौन बड़ा’ क्यों कहा है? 

उत्तर : कवि ने मनुष्य को तुमसे है कौन बड़ा इसलिए कहा कि मानव सृष्टि का श्रृंगार है। मनुष्य ब्रह्माण्ड का सबसे सुन्दर प्रकाश है, मानव ने भू-मण्डल के सब पृष्ठ पढ़ लिया, ज्ञान-विज्ञान के आलोक से धरती से अम्बर तक विजय प्राप्त कर ली है। मानव प्रेमी ने नव भू-स्वर्ग बसाकर धरती पर स्वाधीन लोक की गौरव गाथा गाते हुए स्वप्नों को चरणों से चलकर स्वाधीन नव प्रभात लाएँगे । 

प्रश्न : 8. युग के ही संग-संग चले चलो-  कथन का आशय स्पष्ट करो। 

उत्तर : युग के ही संग-संग चले चलो का आशय है- मानव प्रयत्नशील है पुरातन से चलते चलते युग का नव निर्माण किया, सृष्टि में परिवर्तन लाया। इस प्रकार युग के साथ चलते हुए रंग महल बना पाये पुरातन से चलकर सुवर्ण काल में पहुँचे स्वाधीन भूमि पर नव जागरण लाएँगे। 

प्रश्न 9. नरेश मेहता’ आस्था और जागृति’ के कवि है- कविता के आधार पर सिद्ध करो। 

उत्तर : मानव को कवि ने सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। आदिम प्रतिबिम्ब, जो प्रगति के प्रतीक है के जरिए कवि मानव में आस्था और जागृति लाना चाहते हैं। मानव को युग के साथ चलते हुए नई मिशाल बनाने को कहा है। पुरातन को छोड़कर नव निर्माण करने को कहा है

Sl. No.Contents
Chapter 1हिम्मत और जिंदगी
Chapter 2परीक्षा
Chapter 3बिंदु बिंदु विचार
Chapter 4चिड़िया की बच्ची
Chapter 5आप भोले तो जग भला
Chapter 6चिकित्सा का चक्कर
Chapter 7अपराजिता
Chapter 8मणि-कांचन संयोग
Chapter 9कृष्ण- महिमा
Chapter 10दोहा दशक
Chapter 11नर हो, न निराश करो मन को
Chapter 12मुरझाया फुल
Chapter 13गाँँव से शहर की ओर
Chapter 14साबरमती के संत
Chapter 15चरैवेती
Chapter 16टूटा पहिया
निबंध 

भाषा एव व्याकरण ज्ञान

10. लखि वक्याश के लिए एक शब्द लख : 

(क) जो दूसरों के अधीन हों

उतर: परधीन ।

(ख) जो दसरों उपका को मानत हों ।

उतर : कृतज 

(ग) जो ब को पढ ।

 उतर: शक्षक ।

(घ) जो गीत की रचन कर ।

उतर: गीतिकर।

(ङ) जो खेतबारी क कम कर ।

उतर: कृषक 

प्रश्न 11. निम्नलिखित समस्त पदों के विग्रह कर समास का नाम लिखो। पीताम्बर, यथाशक्ति, अजेय, धनी-निर्धन, कमल नयन, त्रिफला ।

(क) पीताम्बर = पीत +अंबर =पीला है अंबर जिसका = बहुव्रीहि समास + 

(ख) यथाशक्ति =यथा+शक्ति= शक्ति के अनुसार =अव्ययीभाव समास

(ग) अजेय =जिसे जीता न जा सके= अव्ययीभाव समास । .

(घ) धनी निर्धन =धनी और निर्धन= द्वन्द्व समास । 

(ङ) कमल नयन =कमल के समान नयन = कर्मधारय समास

(च) त्रिफला =तीन फलों का समूह= द्विगु समास 

प्रश्न 12. निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग करो।

(क) अपना उल्लू सीधा करना (अपना मतलब निकालना) = किसी को लाभ हो या हानि, दुकानदारों को तो अपना उल्लू सीधा करना है। 

(ख) आँखों का तारा (बहुत ही प्यारा) = प्रत्येक सुपुत्र अपने माता-पिता की आँखों का तारा है।

(ग) उन्नीस-बीस का अंतर (बहुत थोड़ा फर्क) लव और कुश की आकृति में उन्नीस-बीस का अन्तर होने के साधारण व्यक्ति उनमें भेद नहीं कर सकते थे।

(घ) घी के दीए जलाना (बहुत खुशियाँ मनाना) – अत्याचारी राजा के मरने पर प्रजा ने घी के दीये जलाये।

(ङ) जान पर खेलना (जोखिम उठाना) भारत की स्वतंत्रता के लिए भगत सिंह और सुभाष जैसे वीर जान पर खेल गए।

(च) बाएँ हाथ का खेल (मामूली बात) – इस नदी को पार करना तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है।

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