SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | निबंध

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | निबंध सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | निबंध लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | निबंध

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | निबंध ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

1. कंप्यूटर की उपयोगिता

उत्तर: आज विज्ञान मानव मात्र के लिए अलादीन का चिराग बन गया है। विज्ञान ने मानव को उनके प्रकार की शक्तियां, सुख-सुविधाएं तथा क्रांतिकारी उपकरण दिए हैं, जिनके द्वारा काल और स्थान की दूरियां मिट गई है। प्रकृति पर सर्वत्र मानव का आधिपत्य हो गया है। विज्ञान के अनेक विस्मयकारी तथा महत्वपूर्ण उपकरणों में कंप्यूटर का भी विशेष स्थान है।

कंप्यूटर की तुलना यदि मानव मस्तिष्क से की जाए तो गलत नहीं होगा। यह एक ऐसी मशीन है जो कठिन से कठिन जोड़, घटा, गुणा, भाग आदि को अत्यंत शीघ्रता से तथा शत-प्रतिशत शुद्धता से करने में समर्थ है। कंप्यूटर की विशेषताओं के कारण आज यह हमारे जीवन का आवश्यक अंग बन गया है। आज देश के लगभग हर विद्यालय में इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

कंप्यूटर की विभिन्न भाषाएं हैं- लोटस, कोबोल, पासकल, बेसिक आदि। आजकल कंप्यूटर का प्रयोग बैंकों, रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, कार्यालयों तथा दफ्तरों आदि में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में कंप्यूटर के प्रयोग से रोगी को चिकित्सा में बहुत मदद मिलती है। आजकल तो कंप्यूटर पर ‘इंटरनेट’ सुविधाएं भी उपलब्ध है। शिक्षा के क्षेत्र में कंप्यूटर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। विज्ञान के क्षेत्र में कंप्यूटर के अभूतपूर्व क्रांति उपस्थित की है। टीवी पर दिखाए जाने वाले अनेक कंप्यूटर द्वारा ही विकसित किए जाते हैं। आजकल तो पुस्तकों की छपाई के काम में भी कंप्यूटर की सहायता ली जाती है।

किसी भी कंप्यूटर को पांच भागों में बांटा जा सकता है- मैमोरी, कंट्रोल, अंक गणित का अंग इनपुट यंत्र और आउटपुट यंत्र अतः आज का कंप्यूटर मानव के लिए कल्पतरु और कामधेनु के समान बन गया है, क्योंकि मानव मस्तिष्क का काम कंप्यूटर करने लगा है।

2. “मेरा प्रिय कवि “

आदि काल से लेकर आज तक हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में अनेक कवि हो गुजरे हैं। इन सभी का अपना-अपना योगदान और महत्व है। कोई किसी से कम नहीं। सूरदास यदि सूर्य तुलसीदास चन्द्रसमान इसी प्रकार प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा और मैथिलो शरण गुप्त आदि को सिद्ध करने वाले को भी कमी नहीं है।

मेरे लिए कविवर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ से बढ़कर अन्य किसी कवि का कोई विशेष महत्व नहीं। इसका एकमात्र कारण मेरी दृष्टि में यह कह कर अवरेखित किया जा सकता हैं कि राष्ट्रीय यौवन और पुरुषार्थ का गायन करने वाला उन जैसा दूसरा कोई कवि न तो आज तक कोई हुआ है और न ही निकट भविष्य में होने की कोई सम्भावना ही है।

एक आलोचक के अनुसार उदात्त मानवीय पौरुष, भारतीय यौवन एवं राष्ट्रीय जन भावनाओं के अमर गायक राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ मूलतः छायावादी युग की ही देन माने जाते हैं। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपने ओजस्वी सृजन से हिन्दी काव्य-प्रेमियों की हृदय बोणाओं को झंकृत कर दिया था। आपकी कविता में विद्रोह, राष्ट्र-प्रेम का बखान, अन्याय तथा शोषण के प्रति गर्जना है। ‘राष्ट्र कवि’ का सम्मान देकर राष्ट्र ने उनके प्रति अपनी कृतज्ञता का सच्चा परिचय दिया है।

मेरे इस प्रिय कवि का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के अन्तर्गत सैमरिया घाट नामक ग्राम में 30 सितम्बर सन 1908 ई० में हुआ था। हिन्दी, अंग्रेजी के साथ-साथ दिनकर ने संस्कृत, उर्दू बंगला आदि भाषाओं का भी व्यापक अध्ययन किया। दर्शन, साहित्य, इतिहास और राजनीति शास्त्र में भी इनकी पहुँच गहरी थी। इसी कारण इन्हें समसामयिक राजनीतिक चेतना के साथ- साथ सांस्कृतिक चेतनाओं का भी अमर गायक माना गया हैं। दिनकर जी ने अपनी ओजस्वी रचनाओं से जन-जीवन के झकझोर दिया। दिनकर ने अपने काव्य में भारत की गौरवमयी संस्कृति का वर्णन किया है। इनकी साहित्य सेवा के कारण इन्हें सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा अन्य कई पुरस्कार प्रदान किये गये।

3. विज्ञान से लाभ-हानि अथवा, विज्ञान वरदान या अभिशाप

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। जल, थल और आकाश तीनों क्षेत्रों में इसके आश्चर्यकारी चमत्कार हमें अभिभूत कर देते हैं। विज्ञान ने मानव जीवन को सुखमय बना दिया है।

धूप-छाँह रात-दिन की तरह जीवन के हर कार्य के दो पहलू हैं। इसी प्रकार ज्ञान-विज्ञान के भी दो पहलू स्पष्ट देखे और माने जा सकते है। आज हम जिस प्रकार का जीवन जी रहे हैं, उसमें कदम-कदम पर विज्ञान के अच्छे-बुरे वरदान या अभिशाप वाले दोनों पहलुओं के दर्शन होते रहते हैं। विज्ञान एक शक्ति है, जो नित नए अविष्कार करती है। यह शक्ति न तो अच्छी है, न बुरी, वह तो केवल शक्ति है। अगर हम उस शक्ति से मानव-कल्याण के कार्य करें तो वह “वरदान” प्रतीत होती है। अगर उसी से विनाश करना शुरू कर दें तो वह ‘अभिशाप’ बन जाती है। सत्य तो यह है कि विज्ञान की खोजों और आविष्कारों की प्रक्रिया वास्तव में मानवता की भलाई के लिए ही आरम्भ हुई थी। आरम्भ से लेकर आज तक विज्ञान ने मानव जाति को वह कुछ दिया है कि उसके जीवन क्रम में पूरी तरह बदलाव आ गया. है। विज्ञान की सहायता से आज का मानव धरती तो क्या, जल, वायु मण्डल, अन्तरिक्ष और अन्य ग्रहों तक का स्वतन्त्र विचरण कर रहा है।

मनुष्य ने जहाँ विज्ञान से सुख के साधन जुटाए हैं, वहीं दुःख के अंबार भी खड़े कर लिए हैं। इसने ऐसे-ऐसे विनाशकारी अस्त्र-शस्त्र बनाए हैं, जिनसे सारी पृथ्वी क्षणभर में राख हो सकती है। इसके अतिरिक्त प्रदूषण की समस्या बहुत बुरी तरह फैल गई है। नित्य नए असाध्य रोग पैदा होते जा रहे हैं जो वैज्ञानिक साधनों के अंधाधुंध प्रयोग करने के दुष्परिणाम हैं। वैज्ञानिक प्रगति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम मानव-मन पर हुआ है, वास्तव में विज्ञान विनाश के लिए दोषो नहीं हैं, दोषी हैं इसके प्रयोक्ता हम विवेकशील होंगे तो विज्ञान हमारे लिए वरदान सिद्ध होगा। हम विवेक को ताक पर रखेंगे, तो विज्ञान अभिशाप बन जाएगा।

4. अपना हाथ जगन्नाथ

उत्तर : अपना हाथ जगन्नाथ अर्थात हर व्यक्ति अपना भगवान स्वयं हुआ करता है। वस्ताव में इस लोकोक्ति या कहावत का मूल अभिप्राय आदमी के मन में आत्मविश्वास और परिश्रम का महत्व उजागर करता है। संसार में आदमी का हित- अहित या हानि-लाभ आदि सब कुछ उसके अपने हाथ में होता है। यह संसार उनका नहीं कि जो केवल हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहते हैं। संसार का प्रत्येक काम कर पाने में वहीं सफल हुआ करते हैं, जिन्हें अपने हाथों पर हाथों की उंगलियों की चंचलता, शक्ति और कार्य क्षमता पर विश्वास हुआ करता है। अपना हाथ और उस पर विश्वास वास्तव में आदमी के उद्यम और पुरुषार्थ का प्रतीक है। ऐसा विश्वास लेकर चलने वाला व्यक्ति भाग्य के माथे में भी कील ठोकने में जरूर सफल हो जाया करता है। वह समय और परिस्थितियों को अपनी इच्छाओं के सांचे और हाथों के ढांचे में ढाल कर हर प्रकार की सफलता प्राप्त कर लिया करता है। एक प्रसिद्ध कहावत है कि शेर के समान पुरुषार्थी व्यक्ति को ही लक्ष्मी अपनाया करती है। सब प्रकार के पुरुषार्थ के स्रोत और आधार व्यक्ति के अपने हाथ ही हुआ करते हैं।

5. विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्व 

विद्यार्थी का अर्थ है विद्या पाने का इच्छुक विद्या का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ कर परीक्षाएं पास कर लेना ही नहीं है, बल्कि अपने बाहरी भीतरी व्यक्तितव को उजागर कर के सभी प्रकार की सार्थक योग्यताएं पाकर के, जीवन को सुखी और संतुलित बनाना भी है। यह संतुलन केवल पुस्तकें पढ़ते जाने से नहीं, अपने तन-मन तथा सभी इंद्रियों और मस्तिष्क को भी अनुशासित रखने का अभ्यास करके ही पाया जा सकता है। इसी कारण विद्यार्थी और अनुशासन को एक दूसरे का पूरक माना जाता हैं, तथा एक दूसरे के साथ जोड़कर देखा जाता है।

अनुशासन का अर्थ है शासन के अनुसार शासन का अर्थ यहा पर सरकार न होकर जीवन और समाज में जीने रहने के लिए बनाए गए लिखित अलिखित नियम है। व्यक्ति घर-बाहर जहां भी हो, वहां के शिष्टाचार का मानवीय गुणों और स्थितिपरक आवश्यकताओं का ध्यान रखना ही वास्तव में अनुशासन कहलाता है। विद्यार्थी को मुख्य रूप से अपने विद्या क्षेत्र एवं घर संसार में ही रहना होता है। विद्या क्षेत्र या विद्यालय वास्तव में वह स्थान है कि जहां रह कर एक अच्छा विद्यार्थी अन्य सभी क्षेत्रों के अनुशासन के नियमों को जान-समझ कर उन पर आचरण का अभ्यास कर अपने भावी जीवन के लिए भी संतुलन पा सकता है।

विद्यालय में तरह-तरह की रुचियों और स्वभाव वाले साथी सहपाठी हुआ करते हैं। विद्यार्थी जीवन की सभी प्रकार की उचित आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए उन सभी के साथ उचित व्यवहार करना ही वास्तव में अनुशासन है। गुरुजनों अर्थात बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसकी सोख भी सरलतापूर्वक विद्यालयों में प्राप्त हो जाया करता है।

जो विद्यार्थी अपने विद्या क्षेत्र में सही और संतुलित शिक्षा प्राप्त करता है, अपना व्यवहार एवं आचार भी संतुलित रखा करता है। घर-परिवार में आकर उन सब तथा आस-पास वालों के प्रति उसका व्यवहार स्वयं ही संतुलित हो जाया करता है। यह संतुलन ही वास्तव में अनुशासन है। आदमी की पहचान है। उसके जीवन की सफलता सार्थकता की कुंजी है। उसकी पूर्णता भी है। शिक्षा अपने आप नम्र बनाकर सम्मान का अधिकारी बना देती है। सम्मानित व्यक्ति के लिए कुछ भी प्राप्त कर पाना असंभव या कठिन नहीं रह जाता। इस प्रकार एक अनुशासन ही वह मूल धरातल है, जिस पर खेड़ हो और शिक्षा प्राप्त कर प्रत्येक विद्यार्थी अपनी भावी सफलता के द्वारा खोल लेता है। अन्य को रास्ता नहीं।

6. काजीरंगा

काजीरंगा का नाम लेते ही आंखों के सामने एक सींग वाले गैंडे का दृश्य उभर आता है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान न केवल भारत में वरन पूरे विश्व में एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध है। यह केंद्रीय असम राज्य के गोलाघाट, नगांव और कार्यि आंग्लोंग जिले में स्थित हैं। यह उद्यान उबड़-खाबड़ मैदानों, लंबे-ऊंचे घासों, आदिवासियों और भयंकर दलदलों से पूर्ण कुल 430 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है। यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहरों में से एक काजीरंगा को 1905 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था।

इस उद्यान में प्रसिद्ध एक सींग वाले गैंडे के अलावा हाथी, जंगली भैंसा, दलदली हिरण, भालू, बाघ, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, लंगूर, सियार आदि जानवर सांभर, जंगली सुअर, जंगली भालू, बाघ, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, प्रमुख रूप से पाए जाते हैं। यही नहीं काजीरंगा में बाघों की संख्या दुनिया के किसी भी संरक्षित क्षेत्रों से अधिक है। यही कारण है कि काजीरंगा को सन 2006 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। 57,273.60 एकड़ में फैला काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग है। कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान के बाद काजीरंगा दूसरा ऐसा उद्यान है, जहां पक्षियों की विविधता और बहुलता दोनों एक साथ देखने को मिलती है। इस उद्यान में 450 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती है। जिसमें प्रवासी पक्षिय भी हैं।

हाथी के शफारी के माध्यम से काजीरंगा में वन्यजीवों को देखना अपने आप में एक रोमांचक अनुभूति देता है। उद्यान का कोहोरा अंचल सबसे लंबा पर्यटक मार्ग है। 3 से 4 घंटे की सफारी याला के दौरान काजीरंगा पार्क का संपूर्ण लुत्फ उठाया जा सकता है। मार्ग में प्रसिद्ध गैंडे के अलावा हाथी और जंगली भैंसों को भी देखने का मजा उठाया जा सकता है। इसके साथ इस मार्ग के उत्तरी छोर पर छोटी नदियों के नैसर्गिक सौंदर्य का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। साथ ही छोटे आकार के झीलों में हाथियों के द्वारा किए जा रहे करतब अपने आप में एक अनूठा अनुभव होता है।

काजीरंगा गुवाहाटी से 250 किलोमीटर पूर्व और जोरहाट से 97 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। यह गोवाहाटी हवाई अड्डे से 239 किलोमीटर और जोरहट हवाई अड्डे से 97 किलोमीटर दूर है।

7. “राष्ट्रभाषा का महत्त्व’

जब-जब मैं पक्षियों को कूजते हुए, सिंहो को दहाड़ते हुए, हाथियों को चिंघाड़ते हुए, कुत्तों को भौकते हुए और घोड़ों को हिनहिनाते हुए सुनता हूँ तो अचानक मुझे ख्याल आता है कि ये सब अपनी भाषा में कुछ कहना चाहते हैं, बात-चीत करना चाहते हैं। अपने प्रेम, क्रोध, घृणा अथवा ईर्ष्या के भावों को अभिव्यक्त करना चाहते हैं, किन्तु मैं इनकी भावनाओं को पूरी तरह नहीं समझ पाता, तब मैं यह भी सोचने लगता हूँ कि मानव कितना महान है। कि उसे अपनी बात कहने के लिए भाषा का वरदान मिला है। किसी भी देश में सबसे अधिक ‘बोली एवं समझी जानेवाली भाषा ही वहाँ की राष्ट्रभाषा होती है। प्रत्येक राष्ट्र अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है, उसमें अनेक जातियों, धर्मों एवं भाषाओं के बोलने वाले लोग रहते हैं, अतः राष्ट्रीय एकता को दृढ़ बनाने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है, जिसका प्रयोग प्रत्येक नागरिक कर सके। राष्ट्र के महत्त्वपूर्ण तथा सरकारी कार्य उसी के माध्यम से किए जा सकें। दूसरे शब्दों में राष्ट्रभाषा से तात्पर्य है जनता की भाषा, मनुष्य के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए एक राष्ट्रभाषा आवश्यक है। अतः राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रभाषा की ही आश्यकता होती है। स्वतन्त्र भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकार की गयी हिन्दी, भारत के विस्तृत क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा है, जिसे देश के लगभग 35 करोड़ व्यक्ति बोलते हैं हिन्दी पूरे भारत को एकता सूत्र में बांधने वाली भाषा है, यही भाषा राष्ट्री की आशा-आकांक्षाओं की भाषा है, यह राष्ट्रीयता और भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं को सुरक्षित रखने वाली भाषा है, यही भाषा हमारी सफलता, प्रगति और विजय की भाषा है। भिन्नता रहते हुए समस्त भारत की जड़ अखण्ड है। भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में इस सत्य की प्रतीक हिन्दी है।

8. आपने प्रिय साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द्र

जिस प्रकार कविता के क्षेत्र में तुलसीदास जी ने जनमानस को आकर्षित किया है उसी प्रकार उपन्यास, साहित्य कहानी के क्षेत्र में प्रेमचन्द जी ने अपने अभूतपूर्व साहित्य की रचना के कारण प्रत्येक वर्ग के पाठक को मन्त्रमुग्ध कर देनेवाले साहित्य का सृजन किया उन्हें उपन्यास सम्राट की उपाधि प्राप्त है। किन्तु वे जितने बड़े उपन्यासकार थे उतने ही बड़े काहानीकार भी ते। बस्तुतः वे हिन्दी साहित्य के लिए समर्पित उन महान साहित्यकारों में थे जिन्हेंने स्वयं का मिटाकर भी हिन्दी साहित्य को सम्पन्न बनाया।

प्रेमचन्द जी का जन्म १८८० ई० में वारानसी जिले के अंतर्गत लमही नामक एक छोटे गाँव में हुआ था। प्रेमचन्दु जी में साहित्य सृजन की जन्मजात प्रतिभा विद्यामान थी। १९१५ ई- में उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा पर प्रेमचन्द नाम धारण करके हिन्दी साहित्य जगत में प्रदार्पण किया। प्रेमचंद जी ने सतत् रूप से साहित्य की साधना की ओर अपने साहित्य सृजन काल में लगभग एक दर्जन उपन्यास व ३०० कहानियों की रजना की। उनका यह साहित्य जन हिताय की भावना पर आधारित है।

प्रेमचंद जी की गणना विशव के महान कहानीकारों एवं उपन्यासकारों में की जाती है। आधुनिक कथा साहित्य का तो उन्हें जनक ही कहा जाता है। उन्होंने कथा – साहित्य के क्षेत्र मैं युगान्तकारी परिवर्तन किया और एक नए कथा-युग का सूत्रपात किया। वस्तुतः प्रेमचंद जी से हिंदी तथा साहित्य अत्याधिक गौरवान्वित हुआ। जनता की बात, जनता की भाषा में कह कर तथा अपने कथा-साहित्य के माध्यम से तत्कालीन निम्न एवं मध्यम वर्ग की सच्ची तसवीर प्रस्तुत करके वे भारतीयों के हृदय में समा गए। सच्चे अर्थों में ‘कमल के सिपाही’ और जनता के दुख-दर्द के गायक इस महान कथाकार को भारतीय साहित्य जगत में उपन्यास सम्राट की उपाधि से विभूषित किया गया है।

मुंशी प्रेमचंद भारतीय समाज के सजग प्रहरी और सच्चे प्रतिनिधि साहित्यकार थे। उनके साहित्य में सामाजिक बन्धनों में छटपटाती हुई नारियों की वेदना, वर्ण-व्यवस्था की कठोरता, किसानों की दीन-हीन दशा और हरिजनों की पीड़ा के मर्मस्पर्शी चित्र उपस्थित किए गए है। वे कथा – साहित्य के क्षेत्र में युगान्तकारी परिवर्तन करनेवाले कथाकार सिद्ध हुआ। एक श्रेष्ठ कथाकार और उपन्यास सम्राट के रूप में हिंदी साहित्याकाश में उदित इस चंद्र को सदैव नमन किया जाता रहेगा।

9. मेरे जीवन का लक्ष्य

लक्ष्यहीन जीवन और पतवार विहीन नाव कभी सार्थकता का किनारा स्पर्श नहीं कर सकता। मानव महत्वाकांक्षी प्राणी है, उसका लक्ष्य अपने जीवन को सार्थक बनाना है। जिसके हृदय में दृढ़ संकल्प, अदम्य साहस और काम करने की लगन होती है वह अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा कर लेता है। मानव जीवन सोना उगाने के लिए एवं उसके लिए ठीक बीज रोपण और कठोर परिश्रम व साधना की आवश्यकता होती है और जीवन के पथ पर चलने के लिए आवश्यक है निर्दिष्ट एक सुपरिकल्पित पथ संकेत। इसलिए जीवन के प्रारम्भ में ही लक्ष्य दृढ़ स्थिर होना चाहिए।

मुझे अपने भावी जीवन के लिए ऐसा लक्ष्य चुनना होगा, जिससे न सिर्फ अपने जीवन को सुख-शान्ति मिले बल्कि समाज तथा राष्ट्र का भी हित हो सके। मेरी चिर अभिलाषा आदर्श अध्यापक बनने की रही है। शिक्षण काल से ही मेरी पढ़ने-पढ़ाने की रुचि रही है। तभी से मैंने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लिया कि मुझे आदर्श अध्यापक बनना है, शिक्षक जीवन के प्रति मेरा आकर्षण का कारण है, एक शिक्षक, जो किसी भी श्रेणी का क्यों न हो, वह अपने कर्तव्य एवं दायित्व पालन में प्रतिज्ञाबद्ध है। बच्चे व युवक-युवतियों के सामने विश्व के ज्ञान भंडार का द्वार खोलने का गौरवपूर्ण कृतित्व वे ही प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का मार्ग- दर्शक ये शिक्षक ही जाति का मेरूदण्ड निर्माण करते है। शिक्षक अपने प्रत्येक छात्र में आदर्श का बीज रोपण करते हैं। यही कालक्रम में फूलों जैसे विकसित होकर पूरी जाति व देश के कल्याण में लगा देते हैं।

आदर्श अध्यापक बनने के पूर्व मुझे आदर्श विद्यार्थी बनना होगा। इसके लिए मुझे कठिन साधना करनी पड़ेगी, तभी इच्छित सिद्धि प्राप्त हो पाएगी। मुझे तपस्वी के समान तपस्या, सैनिक के समान अनुशासन और धरा के समान सहनशीलता अपनानी होगी। वह गुरुता और महिमा की प्रतिभा विद्या का प्रकाश स्तम्भ है उसका पुनीत कर्त्तव्य है, शिष्यों के अज्ञानांधकार को दूर करना है। मेरा विचार है कि विद्या ही सर्वोतम धन है, इसका दान ही सबसे बड़ा दान है। मेरे जीवन की सार्थकता तभी होगी, जब मैं नश्वर देह को आजीवन विद्या दान करते पाऊँगा, कोशिश करूँगा हजारों-लाखों अन्धकारमय जीवन में शिक्षा की ज्योति यूर्यलोक ढोकर लाने में यदि एक प्राण को भी आलोकमय कर सका तो अपने को सार्थक मानूँगा।

10. समाचार पत्र

प्रतिदिन विश्व में घटित घटनाओं को हमारे सामने कराते हैं समाचार पत्र समाचार पत्र, जो आज हमारे दैनन्दिन जीवन के अंग बन चुके हैं। विश्व में रहने वालो विभिन्न जाति-उपजातियों के बीच संयोग बनाये रखने वाला एकमात्र माध्यम है समाचार पत्र विज्ञान की प्रगति से विश्व को हमारे सामने लाते हैं समाचार पत्र। गणतंत्र के चार स्तम्भ हैं- सरकार, सदन, अदालत और समाचार पत्र। प्रत्येक गणतांत्रिक देश में ये चार स्तम्भ रहते हैं। इसीलिए आज के युग में समाचार पत्र समाज मे एक उच्च स्थान लेने में समर्थ हुए हैं। प्राचीन काल में वर्तमान युग की तरह समाचार पत्र का प्रचलन नहीं था। प्राचीन काल में एक राज्य से दूसरे राज्य तक समाचार ले जाने के लिए राजदूत, प्ररिव्राजक आदि का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन विज्ञान की प्रगति से आज संवाद माध्यम का महत्व भी बढ़ गया है। सर्वप्रथम विश्व में समाचार पत्र का प्रचलन चीन में हुआ था। क्योंकि छापाखाखाना का आविष्कार चीन में ही हुआ था। युरोप में वेनिस शहर में समाचार पत्र का प्रचलन हुआ। उसका नाम था चोजेटा। इसी से गेजेट शब्द का उद्भव हुआ है। इग्लैण्ड में रानी एलिजाबेथ के दिन से समाचार पत्र का प्रचलन हुआ था। भारत में समाचार पत्र का प्रचलन हुआ था, उसका नाम था ” इण्डिया गेजेट”। इसके बाद से विभिन्न देशी भाषा में समाचार पत्र प्रकाशित होने लगे। अंग्रेजो ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए “समाचार दर्पण” नामक एक समाचार पत्र का प्रचलन किया था। इसमे “ईसाई धर्म का मतवाद तथा आदर्श का प्रचार किया जाता था ।

राजाराम मोहन राय” प्रथम भारतीय हैं जिन्होंने “पत्र कौमुदी” नामक समाचार पत्र का सम्पादन किया था। आजकल दैनिक, अर्द्ध साप्ताहिक, अर्द्धमासिक, मासिक, त्रैमासिक, समाचार पत्र निकलते हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर दैनिक पत्र होते हैं।

“अरुणोदय” सर्वप्रथम अर्द्ध असमीया पत्र है। सन् 1846 में अरुणोदय का प्रकाशन हुआ था। इसके बाद से असमीया भाषा में विभिन्न समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ था। जैसे “आसाम बान्धव”, “आसाम विलासनी”, “माँ”, “वाही”, “जोनाकी”, “आवाहन”, “अरुण”, “अकण”, “रामधेनु”, “दीपक”, “सादिनीया असमीया”, “नाम नाई”, “महाजाति” आदि। आजकल के प्रचलित पत्रों में दैनिक असम, असम ट्रिब्यून, असम वाणी, आजिर असम, सेंटिनल, पूर्वांचल प्रहरी, सादिन, प्रतिदिन आदि प्रधान हैं।

निष्पक्ष और शुद्ध समाचार का प्रचार करना समाचार पत्र का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। समाचार पत्र को इस संदर्भ में ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि एक अशुद्ध और अन्याय समाचार का प्रसार समाज में विशृंखलता पैदा कर सकता है। प्रतिदिन विश्व में घटित विभिन्न घटना, संस्कृति, राजनीति, विज्ञान, अर्थनीति, शिक्षा, व्यापार, आमोद-प्रमोद, खेल, समाजनीति आदि का शुद्ध और तत्काल प्रचार करने में ही समाचार पत्र की सार्थकता होती है। काल्पनिक, अशुद्ध प्रचार से जनगण-विधान्त एवं विपथगामी होते हैं इसलिए चाहिए कि संवाद पत्र सदा अशुद्ध अंश को छोड़कर शुद्ध अंश को ही जनगण को दें। तब ही एक समाचार पत्र का जनता आदर करती है। अगर अपनी मूल नीति को छोड़कर किसी समाचार पत्र किसी राजनैतिक दल और किसी व्यक्ति का गुणवान करने लगे तो उसे जनता त्याग देती है। जनता सदा यही चाहत है कि समाचार पत्र निर्भीक, निरपेक्ष, उन्मुक्त होकर अपने दायित्व का पालन करें।

11. ब्रह्मपुत्र नद

भारत के प्रमुख नदियों में ब्रह्मपुत्र एक है। उत्तर भारत की सभी नदियों में ब्रह्मपुत्र लंबाई में सबसे बड़ी है। इसलिए इसे महानद कहा जाता हैं। पूर्व भारत का यह सर्व प्रमुख नद है। ब्रह्मपुत्र नद की उत्पत्ति तिब्बत स्थित मानसरोवर से हुई हैं। उत्पत्ति स्थल से यह पूरव की ओर पर्वतों के बीच तिब्बतीय पठार से होकर लगभग आठ सौ मिल तक बहता है। इस हिस्से में इसका नाम सांगपो है। पूर्वी तिब्बत में भारत सीमा के समीप वह फिर दक्षिण की ओर मुड़ता है। इस हिस्से में दिहं दिवं और लोहित ये तीन नदियां आकर मिलती है और तब

यह नद पश्चिमाभिमुख होता है। यहीं से उसका नाम ब्रह्मपुत्र हुआ है। इसे लुइत या लोहित भी कहते हैं। लगातार पश्चिम की ओर बहते हुए इस नद में दोनों ओर से अनेक उपनदियां आकर मिलती है। इन उपनदियों में दिखी, सुबनसिरी जिया भराली, ननै, वरनदी, पुधिमारी, वरलिया आदि मुख्य है। इन उपनदियों के जल से समृद्ध होकर धुबड़ी के पास दक्षिणमुखी बन कर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में प्रविष्ट होता है और ब्रह्मपुत्र और यमुना नाम से दो भागों में बंटकर कुछ दूर बने के बाद फिर एक स्थान पर मिल जाता है। इस हिस्से में इसका नाम ‘मेघना’ है। मेघना पद्मा से मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस प्रकार कुल मिलाकर ब्रहमपुत्र लगभग दो हजार नौ सौ किलोमीटर से भी अधिक का मार्ग अतिक्रमण करता है।

ब्रहमपुत्र की उत्पत्ति के संबंध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। ब्रह्मपुत्र की मुख्य जलधारा हिमालय पर्वत में अवरुद्ध थी एक बार कौशिक जमदग्नि ने पत्नी रेणुका पर रुष्ट होकर अपने पुत्रों को इसके वध की आज्ञा दी। परशुराम के अलावा दूसरे पुत्रों ने पिता की आजा नहीं मानी। पर पितृ भक्त परशुराम ने पिता का आदेश शिरोधार्य करते हुए माता का मस्तक कुठार से काट डाला। उस पाप के कारण कुठार उनके हाथ पर चिपक गया। परशुराम पाप से मुक्ति के लिए चारों दिशाओं में घूमने लगे। भारत के इस पूर्वी छोर पर स्थित ब्रह्मकुण्ड मैं नहाने पर उनका पाप धुल गया। उनके हाथ से संलग्न कुठार भी यहीं मुक्त हुआ। इस क्षेत्र का ऐसा पुण्य प्रभाव देखकर परशुराम ने ब्रहमपुत्र की अवरुद्ध जलधारा को पर्वतों के बीच

से मोड़ कर एक बड़ी नदी के रूप में बहा दिया। इस प्रकार ब्रह्मपुत्र की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मपुत्र एक तेज धारा वाला महानद है। पुराने जमाने में इसके तट पर अनेक तीर्थो, नगरों आदि का निर्माण हुआ था। ब्रह्मपुत्र के तट पर ही सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक सधाना स्थली व शक्ति पीठ ‘कामाख्या’ अवस्थित है।

भारत के पूर्वाचल की जीवन संचारिणी ब्रह्मपुत्र की धारा ही है। इसी ने युग-युग से भारत के शेष अंचल के साथ इस भूमि का संबंध जोड़ रखा है। इसी के स्नेह सिंचन से पूर्वांचल की धरती ‘सुजला-सुफला’ बनी हुई है। आधुनिक काल से यहीं नद इस अंचल का प्रमुखतम जलमार्ग है। पुराने जमाने से ही ब्रह्मपुत्र को भारत की पुनीत नदियों में एक माना गया है। खासकर अशोकाष्टमी के अवसर पर इसके जल से स्नान की बड़ी महिमा बताई गई है।

12. लोकप्रिय गोपीनाथ बरदलै अथवा, अपना प्रिय नेता

दमारे देश के प्रसिद्ध नेताओं में लोकप्रिय गोपिनाथ बरदल जी का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। दुनिया में समाज सेवक तो बहुत हैं, पर सच्चे समाज सेवक बिरले होते हैं। सच्चे समाजसेवक बड़े ही लगन से कर्तव्य निभाते हैं, अपनी जाति और समाज तथा अपने देश की उन्नति के लिए अपने को खपाते हैं। ऐसे ही बहु-गुण सम्पन्न महान पुरुष थे गोपीनाथ बरदलजी । उनके नाम के आगे चलोकप्रिय उपाधि उनके सफल नेतृत्व, स्वदेश-प्रेम तथा लोकप्रियता का प्रमाण है।

लोकप्रिय गोपीनाथ बरदल जी का जन्म नगाँव जिले के रोहा नामक गाँव में हुआ था। उनके पिताजी बुद्धेश्वर बरदलै एक अच्छे वैद्य थे माँ-बाप के जीवित रहते समय उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी। बचपन से ही गोपीनाथ बरदले शांत स्वभाव के थे। उनके जीवन पर पिता बुद्धेश्वर बदले समाज-प्रिय तथा समाज सेवक थे। समाज के मुखिया लोग उनसे मिलकर समाज तथा देश की उन्नति के बारे में आलोचना करते थे। उसी से गोपीनाथ बरदले में देश- प्रेम की भावना पैदा हुई। स्कूल में पढ़ने के समय से ही वे देश की उन्नति के बारे में सोचने लगे थे। उनकी धारणा थी कि जनसाधारण को संगठन के द्वारा ही समाज तथा देश की उन्नति की जा सकती है।

उस समय हमारा देश अंग्रेज सरकार के अधीन था। हमारे देश के लोग अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे। महामानव महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश को स्वतंत्रता की पुकार हुई। असहयोग आन्दोलन आरंभ हुआ। गोपीनाथ बरदले भी गांधीजी के नेतृत्व में देश की स्वतंत्रता की पुकार में अनुगामी बनकर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। वे असम को जनता में गांधीजी की वाणियों का प्रसार-प्रचार करने लगे, जिससे असहयोग आन्दोलन को और अधिक बल मिला। इस संदर्भ में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। अनेक कष्टों को सहते हुए भी उन्होंने देश की सेवा की। इस तरह उन्होंने जनता को सच्चा पथ दिखाया।

अंग्रेजों के जमाने में ही बरदलै जी असम के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने प्रधानमंत्री बन का शिक्षा-दीक्षा, उद्योग-व्यवसाय आदि की उन्नति के लिए काम करना शुरू किया। उनके नेतृत्व में हमारा राज्य प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ।

सन् १९४७ में हमारे देश को अंग्रेजो ने स्वतंत्र कर दिया। महात्मा गाँधी चाहते थे कि सभी सम्प्रदाय के लोग मिलजुल कर रहें। पर गांधीजी की बातों पर ध्यान न देकर अखंडित भारतवर्ष को भारत और पाकिस्तान इन दो भागों में बाँट दिया गया। कुछ लोग असम को भी पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे। परन्तु गोपीनाथ बरदल के सबल नेतृत्व में वह हो नहीं पाया, अतः असम भारतवर्ष का अंग बना रहा।

स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् गोपीनाथ बरदल जी पुन असम के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने असम के हर प्रांत के जाति-जनजाति व अन्य पिछड़े हुए लोगों की उन्नति के लिए यथासंभव सहयोग प्रदान किया।

बरदलैजी को जाति भेद से नफरत था। उनके अनुसार हिन्दू-मुसलमान-सिक्ख ईसाई आदि विभिन्न सम्प्रदाय के लोगों में किसी तरह का भेद नहीं है, सभी बराबर हैं। उनके लिए एक ही पहचान है- असमीया ।

असम को शिक्षा में आगे बढ़ाने के लिए गोपीनाथ वरदलै जी ने भरसक प्रयत्न किया। उन्हीं के प्रचार से कामरूप एकाडेमी स्कूल तथा गुवाहाटी विश्वविद्यालय को स्थापना हुई। गांधीजी के निर्देशानुसार असम में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार का उत्तरदायित्व भी लोकप्रिय प्रचार के गोपीनाथ वरदल जी ने ले लिया। इसलिए बरदलैजी ने असम में भाषा हिन्दी के लिए असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की।

सरल जीवन व्यतीत करते थे। उनके रहन-सहन में बड़ी सादगी थी। दूसरों की सेवा करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था। देश की सेवा में ऐसे मग्न रहते थे कि वे अपने परिवार को भी भूल गये थे। उनके के प्रयत्न से ही असम की प्रगति हुई। इसीलिए बरदले जो को असम का निर्माता तथा कलाकार कहा जाता है।

13. अपनी प्रिय पुस्तक

मैंने हिन्दी की अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं। सभी पुस्तकें मुझे अच्छी लगी हैं। परन्तु, उनमें हिन्दी साहित्य के इतिहास के भक्तिकाल के भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमान मेरा सबसे प्रिय ग्रंथ है। चामचरित मानस एक प्रसिद्ध महाकाव्य है।

पुस्तक से ज्ञान का भण्डार बढ़ जाता है। साथ ही साथ वहाँ से विभिन्न शिक्षाएँ मिलती हैं. आदर्श मिलते हैं तथा भविष्य जीवन में चलने का पथ भी मिलता है। इन सभी दृष्टि से रामचरित मानस एक उत्तम काव्य है। इस काव्य में भगवान श्रीरामचन्द्र के जीवन मे विभिन्न घटनाओं का वास्तविक चित्रण मिलता है। प्रस्तुत महाकाव्य के सात काण्ड है, जैसे-बालकांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुन्दर और उत्तर कांड रामचरित मानस के बालकांड में भगवान श्री रामचन्द्र के बाल्यावस्था से सीता के साथ विवाह तक की कथाओं का अत्यंत सरस वर्णन है। मूलकथा रामचन्द्र के साथ-साथ चलती आई है। रामचरित मानस का दूसरा कांड अयोध्याकांड है। इस काण्ड में रामचन्द्र के राज्याभिषेक से शुरू हुआ है, परन्तु विमाता कैकेयी से विताड़ित होकर वन गमन तक की कथा और भरत से राम को अयोध्या में वापस आने में असमर्थ होकर उनकी पादुकाओं को ही अयोध्या में स्थापन करते हुए भरत के शासन ग्रहण तक की कथा की करुण कहानी है। इस महाकाव्य का तीसरा कांड अरण्य कांड हैं। राम के अरण्य तक चले जाने की कथा से रावण द्वारा सीता हरण तथा नारद राम के संवाद तक की कथा अत्यंत मार्मिक है।

रामचरित मानस का चौथा काण्ड किष्किंधा काण्ड है, इसमें रामचन्द्र जी का हनुमानजी द्वारा सुग्रीव के साथ मित्रता से सीता को खोज में हनुमान जी का लंका पहुँचने तक की कथाओं का वास्तविक वर्णन है।

रामचरित मानस का पंचम कांड सुन्दरकाण्ड है, इस काण्ड में घटित विभिन्न घटनाओं के मार्मिक वर्णन से राम-सीताजी को अयोध्या तक प्रस्थान की कथा का वर्णन है। रामचरित मानस का अन्तिम तथा सप्तम काण्ड उत्तर कांण्ड है। इस काण्ड में भरत विरह | गरुड़ के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डी के उत्तर तक की कथा का वर्णन है।”

रामचरित मानस महाकाव्य में राम को आदर्श पितृ भक्त पुत्र, पति, बन्धु, भाई सम्राट, प्रजारंजक, महान वीर आदि विभिन्न रूपों में दिखाया गया है। सीताजी को एक अत्यन्त रूपवती दुहिता, आदर्श पत्नी तथा बहू के रूप में चित्रित किया गया है। सोताजी ने मानस में भारतीय महिलाओं का आदर्श पति ही पत्नी के लिए सबकुछ है, की प्रतिष्ठा की है। उन्होंने अपने प्रियतम राम के मंगल के लिए हजारों कष्टों का सामना की है। इस काव्य में अयोध्या के राजा दशरथ ने एक आदर्श पति, राजा तथा पिता के रूप में अपना परिचय दिया है। प्रस्तुत काव्य में कौशल्या ने भारतीय महिलाओं का आदर्श जारी रखा है। क्योंकि उन्होंने अपने पतिदेव दशरथ राजा की प्रतिज्ञा रक्षार्थ एकमात्र पुत्र रामचंद्र जी को ही वन जाने की अनुमति दी। इनके अलावा इस काव्य में भरत, लक्ष्मण, और शत्रुघ्न ने भी एक महान भाई का परिचय दिया है। भरत ने राम को लौटाने में असमर्थ होकर उनकी पादुकाओं को ही राजगद्दी पर रखकर राज्य न किया। शत्रुघ्न ने भरत के राज्यप्राप्ति की विरोधिता की लक्ष्मण के जैसा आदर्श भातृ तो दुनिया में देखने को ही नहीं मिलता। उन्होंने तो नवविवाहिता पत्नी उर्मिला को छोड़कर

अपने भाई की सेवा के लिए राम के साथ वन गमन किया। कैकेयी ने तो इस काव्य में विमाताओं का ज्यों का त्यों चित्र दिखाया।

रामचरित मानस से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें अपने माँ-बाप, भाई-बहन, कुटुम्ब बन्धुबान्धव आदि के मंगल के लिए तन-मन-धन से कर्तव्य करना चाहिए। हजारों विपत्ति आने पर भी हमें अन्याय को रामचन्द्र की तरह प्रश्रय नही देना चाहिए। राम-लक्ष्मण-सीता आदि की तरह हमें भी अपने गुरुजनों के प्रति परमश्रद्धा रखकर करना चाहिए।

14. विद्यार्थी जीवन अथवा, छात्र जीवन

मनुष्य का बचपन से ही विद्याध्ययन प्रारम्भ होता है। साधारणत: यह अध्ययन कार्य स्कूल से शुरू होकर कालेज या विश्वविद्यालय तक चलता है। उसे विद्यार्थी या छात्र जीवन कहा जाता है। विद्यार्थी शब्द विदधातु में अर्थी शब्द के संयोग से बना है। अतः जो विद्या लाभ करता है अथवा जो विद्या की अर्थी हैं, वह विद्यार्थी कहलाता है। मानव जीवन में विद्या का महत्व सर्वोपरी है। विद्या की कमी होने पर मूढ़ और विद्या के रहने पर मनुष्य को ज्ञानी तथा सच्चा मानव बनानें में समर्थ होता है। इस सन्दर्भ मे भतृहरि का यह श्लोक प्रासंगिक होगा-

विद्या ददाति विनयम्, विनयात् याति पात्रताम्, पात्रताम् धनम् स्वपोति, धनाम् धर्म तनो सुखम् क :

अर्थात विद्या मनुष्य को विनयशील बनाती है। विनयशील होने पर मनुष्य में योग्यता बढ़ती है। योग्यता बढ़ने पर धन का आगमन होता है। धन होने पर लोग धर्म करते हैं, तब ही मनुष्य सुखी बनता है।

अपने समाज तथा परिवेश में ही विद्यार्थी का भविष्य निर्भरशील होता है। विद्यार्थी या छात्र के लिए अपना घर ही प्रारंभिक शिक्षालय है। अतः सही रास्ते पर चलाना माँ-बाप का परम कर्तव्य है। क्योंकि जीवन का वह प्रारंभिक भाग बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इस समय उनको जैसे बनानी चाहते है वैसा ही बनाया जा सकता है। अतः एक बालक का भविष्य छात्र जीवन पर ही निर्भर करता है। आज का विद्यार्थी कल का नागरिक है, भविष्य है। अतः उसे सच्चे रास्ते पर आगे बढ़ाना माँ बाप के साथ-साथ शिक्षक तथा समाज का भी प्रधान कर्तव्य है। इस संदर्भ में कहना होगा कि विद्यार्थी का अपना दायित्व सबसे अधिक होता है। उसे पूज्यनीय जनों का सम्मान, अपने कर्तव्य के प्रति सचेतन तथा पैरों पर खड़े होने की कोशिश करनी चाहिए। विद्यार्थी को संयमी बनकर सच्चाई के पथ पर अहिंसक नीति पर चलना चाहिए, किसी के दोष को त्यागकर गुण को ग्रहण करना चाहिए।

नियमानुवर्तिता का पालन करना विद्यार्थी का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है। क्योंकि बिना नियमानुवर्तिता के शिक्षा अधुरी है।

विद्यार्थी के लिए अनुशासन भी अत्यंत ही आवश्यक है। अनुशासन के बिना कभी विद्यार्थी को सच्चे रास्ते से फिसल जाने की संभावना अधिक रहती है। आज समाज मे विश्रृंखलता, अन्याय, शोषण, असत्य, न्याय-अन्याय आदि पर जरा सा भी ध्यान नहीं डालते, जिसके कारण विद्यार्थी में अनुशासनहीनता देखने को मिलती है।

विद्यार्थी के लिए व्यायाम भी जरूरी है क्योंकि व्यायाम से ही शरीर स्वस्थ रहता है। इसीलिए अध्ययन के साथ-साथ खेल-कूद आदि जरूरी है। क्योंकि विद्यार्थी के लिए खेल-कूद ही अच्छा व्यायाम है।

विद्यार्थी जीवन मानव के भविष्य जीवन की बुनियाद है। इसीलिए सु-स्वाश्य के साथ-साथ सुस्वस्थ गठन करना भी विद्यार्थी जीवन मे एक जरूरी अंग है। इसके बिना भविष्य-मानव जीवन कभी भी सुखी नही बनता।

अनुकरण विद्यार्थी का धर्म है। वह जीवन मे जिन लोगों के संसर्ग में आता है, उसी का दोष- गुण ग्रहण करता है। ऐसी हालत में विद्यार्थी को सुधारने के लिए अथवा सच्चे पथ प्रदर्शन करने के लिए आज के नागरिकों को अपने-अपने चरित्र को साफ या निष्कलंक करना है। आदर्श

चरित्र निर्माण के लिए विद्यार्थी को विनयी, सत्यवादी तथा परिश्रमी होना चाहिए। च्छात्राणा: अध्ययन तपः अर्थात, विद्यार्थी के लिए अध्ययन हो तपस्या होनी चाहिए। यह विद्यार्थी का एक मुख्य कर्त्तव्य है। इसके लिए अध्यावसाय गुण का होना अत्यावश्यक है। विद्यार्थियों को राजनीति से दूर रहना चाहिए क्योंकि विद्यार्थी सामाजिक तथा राजनीति के क्षेत्र मे ज्यादा ध्यान देने के कारण अपने मंजिल से फिसल जाता है और भविष्य-जीवन लक्ष्य भ्रष्ट

हो जाता है। पहले अध्ययन उसके बाद ही राजनीति । “आज का छात्र कल देश का कर्णधार बनेगा। वह अपनी जाति या देश का भविष्य है। अतः हर विद्यार्थी को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

15. लोकनायक शंकर देव

अथवा, 

एक महापुरुष की जीवनी अथवा, श्रीशंकरदेव

जब संसार के किसी देश अथवा अंश में अत्याचार, अनाचार, अन्याय, अभिचार आदि अधिक बढ़ जाता है, तब महापुरुषों का अविर्भाव होता है। वे वहाँ पुनः शांति स्थापना करते है। हिन्दी साहित्य के भक्ति काल में भारत के पतित तथा निपीड़ित लोगों के उदार तथा समाजसुधार हेतु रामानन्द, शंकराचार्य, कबीरदास, गुरु नानक, चैतन्य देव आदि की तरह असम में भी श्री शंकरदेव तथा माधवदेव का श्री अविर्भाव हुआ था।

श्री शंकरदेव का जन्म सन् 1881 ई० मे नगाँव जिले के आलीपुखुरी या बरदोवा गाँव में हुआ था। उनका नाम कुसुम्बर भूआ और माता का नाम सत्यसंध्या था । शंकर भगवान के वरदान से पुत्ररत्न प्राप्त होने के कारण माता-पिता ने बच्चे का नाम शंकर रखा था।

बचपन में हो श्रीशंकर के माता-पिता स्वर्ग सिधारे। अतः दादी खेरसुती ने शंकर का लालान- पालन किया। बाल्यकाल में शंकर को खेल-कूद, व्यायाम, घुमना, तैरना आदि पसन्द था, परन्तु पढ़ाई में रूचि नहीं थी। दादी खेरसुती ने 12 वर्ष की अवस्था में उन्हें महेन्द्र कन्दली के संस्कृत टोल में भरती कर दिया। ‘होनहार वीरवान के होत चिकने पात’। व्यंजन वर्ण सीख लेने के बाद ही शंकर ने आकार उकारहीन एक कविता लिखी, जिसमे ईश्वर की स्तुति की गई। कविता को देखकर पंडित कन्दली खुश होकर उन्हें ओइना छात्र बना दिया। युवावस्था मे श्रीशंकर में कुछ असाधारण प्रतिभा दिखाई देने लगा।

जैसे- शंकर एक बार वर्षा ऋतु में पानी से भरा हुआ विशाल ब्रह्मपुत्र नद तैरकर पार हो गये। और एक दिन की बात है कि उन्होंने एक बलवान साँढ़ की सीग को पकड़कर उसे दमन किया।

थोड़े ही दिनों में आप विभिन्न पुराण, वेद, वेदान्त, ज्योतिष आदि शास्त्रों में पंडित बन गये। तभी से शंकर का नाम श्रीशंकर देव हुआ।

शिक्षा अध्ययन समाप्ति के बाद शंकरदेव ने हरिवर गिरि की कन्या सूर्यवती से शादी की। एक बेटी को जन्म देकर अल्पायु में ही सूर्यवती चल बसी। इस पर शंकर देव के मन में दुःख पहुँचा । ३२ वर्ष की उम्र में हो आपने मथुरा, वृन्दावन, काशी, हरिद्वार, बद्रीकाश्रम, पुरी आदि अनेक तीर्थस्थानों का पर्यटन किया। बाद में आपने फिर एक बार तीर्थयात्रा की। तीर्थभ्रमण के समय उन्होंने अनेक जगहों में साधु-सन्तों से मिलकर धर्म चर्चा करते रहे। इससे उनको बहुत ज्ञान प्राप्त हुआ तथा भागवत के आधार पर पीड़ित मनुष्यों की मुक्ति के लिए आपने भगवती वैष्णव धर्म का प्रवर्तन किया।

असम के पर्वत भैयाम आदि सभी जगहों में घूम-घूम कर शंकरदेव ने वैष्णव धर्म को जनता के बीच प्रचार किया। उन्होंने भागवत पुराण के कृष्ण चरित्र और कृष्ण भक्ति शाखा के अद्वैतावाद का प्रचार किया। भागवती वैष्णव धर्म का मूल मत यह है कि एक देव, एक सेव, एक बिने नाहि केव

असम में पर्यटन करते समय उन्होंने जगह-जगह पर अनेक सत्रों की स्थापना की। ये है- वरदोवा, बरपेटा, मधुपुर (वर्तमान कोछबिहार के अंतर्गत), केटकुछि, पाठबाउसी, चुनपोरा, सुन्दरिया आदि प्रधान है। महापुरुष, माघवदेव आपके प्रधान और प्रिय शिष्य थे। महापुरुष दामोदर देव भी आपके शिष्य थे।

श्री शंकर देव ने कई धर्ममूलक आख्यान, उपाख्यान, काव्य तथा नाट रचना की है। जैसे- हरिशचन्द्र उपाख्यान, कीर्तन घोषा, रामायण, भागवत के दशम खंड, गुण माला, पत्न प्रसाद, रुक्मिणी हरण, परिजात हरण, केलि गोपाल, निशि नव सिद्धि संवाद, रामविजय आदि प्रधान हैं। श्री शंकरदेव की ये अमर कृत्तियाँ असमीया साहित्य की अमूल्य देन हैं। उन्होंने वरणोतों की रचना भी की है।

सन् १५६२ ई० में श्री शंकरदेव १२० साल की उम्र में स्वर्ग सिधारे।-

16. पुस्तकालय

ज्ञान प्राप्ति के दो साधन होते हैं। एक है विद्यालय और दूसरा पुस्तकालय स्वस्थ व्यक्ति का मानसिक विकास उच्च ज्ञान की अवधारण से होती है। मनुष्य को अज्ञानता को दूर करने के लिए एकमात्र साधन है पुस्तक । पुस्तक के अध्ययन से मन में रहने वाली अज्ञानता दूर होने के साथ-साथ नये विचार बुद्धि का उदय होता है। इससे मानसिक विकास होता है।

पुस्तकालय का अर्थ है पुस्तकों का एक विशाल घर ज्ञान प्राप्ति में अधिकांश योगदान देने के लिए पुस्तकालय का होना आवश्यक है। पुस्तक के अध्ययन से मनुष्य की मानसिक शान्ति तथा मनोरंजन की प्राप्ति होती है। इससे मानसिक तनाव भी दूर होता है। अपने देश की संस्कृति सभ्यता आदि के बारे में ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। हमारे पूर्वजों की कर्म पद्धति, विचार, ज्ञान से परिचित होने के लिए पुस्तकों को पढ़ना जरूरी है। पुस्तकालय दो अह का होता है। (१) निजी पुस्तकालय और । (२) सार्वजनिक पुस्तकालय निजी पुस्तकालय किसी संपन्न अध्ययन प्रेमी के घर में होते हैं। वे अपने धन से पुस्तकें खरीदकर एकत्रित करते हैं। इन पुस्तकालयों पर उस एक व्यक्ति का नियंत्रण रहता है। किसी अन्य व्यक्ति को पुस्तक अध्ययन करने के लिए इस पुस्तकालय के अधिकारी से अनुज्ञा प्राप्त करना आवश्यक है, लेकिन सार्वजानिक पुस्तकालय होता है, जहाँ सभी प्रकार के लोग अपनी मर्जी से यहाँ अध्ययन कर सकते है। राज्य के प्रत्येक जिलाओं में एक-एक ऐसे सार्वजनिक पुस्तकालय हैं। इस तरह के पुस्तकालय पर पूरी तरह से जनता का नियंत्रण रहता है। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुकूल पुस्तक पढ़ सकता है। क्योंकि इस तरह के पुस्तकालय की स्थापना जनता के अध्ययन के लिए की जाती है। गरीब-अमीर आदि सभी तरह के लोग यहाँ एक साथ अध्ययन कर सकते

पुस्तकालय पर सरस्वती का निवास होता है। एक अच्छा पुस्तकालय बनाने के लिए इसमें यूटी मात्रा में पुस्तकें उपलब्ध होनी चाहिए। प्रत्येक व्याक्ति अध्ययन के लिए आग्रही हो, उसकी संकलन व्यवस्था अच्छी हो- तब एक आदर्श पुस्तकालय बन सकता है। पुस्तकालय के विकास मैं राष्ट्र का भी कल्याण होता है।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

17. बिहु

अथवा,

असम का जातीय उत्सव

बहु असमीया जाति का प्रधान जातीय उत्सव है। वह असमीया जातीय संस्कृति का मुलाधार है। बिहु शब्द संस्कृत भाषा के विषुव शब्द से निकला है। संस्कृत में विषुव शब्द का अर्थ है संक्रान्ति। अतः संक्रान्ति के अवसर पर मनाये जाने वाले उत्सव को बिहु कहते हैं। बिहु जातीय जीवन का प्रतीक है। यह बिहु उत्सव खासकर कृषि से सम्पर्क रखता है, क्योंकि असम एक कृषि प्रधान राज्य है।

वर्ष के बारह महीने में बारह संक्रान्तियाँ होती हैं। परन्तु उन सभी संक्रान्तियों में बिहु उत्मव नहीं मनाया जाता। मौसम के आधार पर वर्ष में तीन बिहु मनाये जाते हैं- ये रंगाली बिहू, कंगाली बिहु और भोगाली बिहु हैं। रंगाली बिहु या बहारा बिहु चैत और वैशाख महोने की संक्रान्ति में रंगाली या बहारा बिहु उत्सव मनाया जाता है। इन तीन बिहुओं में से यह बिहु प्रधान है। यह उत्सव सात दिन मनाया जाता है। वैशाख महीने के आरम्भ में मनाये जाने के कारण इसे बहाग बिह भी कहते हैं। दूसरी ओर वैशाख महीने की पहली तारीख से असमीया नया साल भी शुरू होता है।

उस समय बसन्त ऋतु होता है। ऋतुराज बसन्त के आगमन से प्रकृति देवी बड़ी मनोरम रूप धारण करती है। चारों तरफ पेड़-पौधों से नये-नये पत्ते निकलते तथा रंग-बिरंग के फूल खिलते हैं। कोयल और चिड़ियाँ मधुर गाना गाने लगती हैं सुन्दर और आनन्दमय प्राकृतिक वातावरण के साथ-साथ सभी के मन में भी आनन्द छा जाता है। इसलिए इस बिहु को रंगालो बिहु कहा जाता है।

इस बिहु के पहला दिन को जगरू (गौ) बिहु कहा जाता है। गाय बैलों की सेवा करना ही इस बहु का तात्पर्य है। क्योंकि बैल कृषि जीवन का प्रमुख साधन है। उस दिन सवेरे गाय-बैल के शरीर पर पीसी हुई उरद, हल्दी और सींगों में तेल लगाते हैं। गाय-बैलों को नहला कर इन्हें कह-बैंगन खिलाते तथा कह बैगन की माला पहनाकर लड़के- युवक गाते कहु खा, बैगन खा, दिन-दिन बढ़ता जा, माँ छोटा, बाप छोटा, तू बन भोटा ताजा उसी दिन गाय-बैलों के पुराने पगाहे बदल कर नये पगाहे दिये जाते हैं। वैशाख महीने के पहला दिन यानी गरू बिहु के दूसरे दिन को मानुह बिहु कहा जात है। उस दिन लोग गुरुजनों तथा बड़े जनों को प्रणाम करते हैं, उन्हें विभिन्न पीठा, दही, मिठाई, पकवान आदि से जलपान कराते हैं तथा उनसे आशीर्वाद लेते हैं। उसी दिन माँ-बहनें अपने पिता-पुत्रों तथा भाइयों को बिहुवान (गमछा) प्रदान करती हैं। विहुवान स्नेह और आशीर्वाद का प्रतीक है। बिहु के प्रारम्भ से युवक-युवतियाँ मिलकर हुचरि और बिहु गाते हैं। हुचरि गीत गाँव के घर-घर में गाया जाता है। परन्तु बिहुगीत गाना और बिहु नाचने की जगहें हैं- मैदान पर, बड़गद पेड़ के नीचे और नदी के तट पर परन्तु आजकल असम के गाँवों तथा शहरों में बिहुमंच पर बिहु नृत्य और बिहुगीत चलते हैं। बिहु कोंवरी और बिहुरानी आदि विभिन्न प्रतियोगिताएँ भी होती हैं।

कंगाली बिहु या काति बिहु आश्विन और कार्तिक महोने की संक्रान्ति में यह उत्सव मनाया जाता हैं। कंगाली शब्द का अर्थ है गरीब। क्योंकि उस समय किसान अथवा साधारण लोगों में खाद्याभाव होता है। इसीलिए इस उत्सव को कंगाली बिहु कहा जाता है। दूसरी तरफ इसको काति बिहु भी कहा जाता है, क्योंकि इस बिहु को कार्तिक महीने के प्रारम्भ में मनाया जाता है। उस दिन शाम को तुलसी के नीचे और खेत में दीये जलाते हैं और प्रसाद आदि महालक्ष्मी जी को चढ़ाते हैं।

भोगाली बिहु अथवा माघ बिहू पौष और माघ को संक्रान्ति में भोगाली या माघ बिहू मनाया जाता है। माघ महीने में कृषकों को विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्रियाँ मिल जाती हैं। उस समय उनका खाद्याभाव दूर हो जाता है। भोग की अनेक वस्तुएँ आसानी से मिल जाती हैं। इसलिए इस बिहु को भोगाली बिहु कहा जाता है। संक्रान्ति के दिन को उरूका कहा जाता हैं। उरूका के दिन शाम को युवक-युवतियाँ मिलकर भोज यानी खाना खाते हैं।

पौष महीने के शेषार्द्ध में गाँवों के युवक फेंस और बाँस से भेजी पर या भेला घर बनाते हैं। भेलाघर के अन्दर युवक उरूका की रात को खाना खाते हैं। दूसरे दिन सवेरे सभी लोग नहा-धोकर भेंजी घर और भेलाघर जलाते हैं। छोटे बड़ों को प्रणाम करते हैं और उनसे आशीर्वाद लेते हैं। उस समय लारू पीठा, विभिन्न प्रकार की मिठाई, दूध-दही तथा पकवान आदि खाते हैं और रिश्तेदार और बन्धुबान्धवों को खिलाते हैं। नामघर, मन्दिरों में नाम कीर्तन किया जाता है। मैदान में युवक-युवतियाँ प्रतियोगिता मूलक खेल-कूद करते हैं। इस तरह ‘बिह के अवसर पर असमीया लोग आनन्दमय जीवन बिताते हैं। प्राचीनकाल से ही बिहु असमीया जातीय जीवन के साथ जुड़े हुए हैं तथा आज तक यह उत्सव परम्परागत चलता आया है। अतः जब तक असमीया जाति रहेगी तब तक बिहु भी रहेगी।

18. हमारा विद्यालय

परिचय – हमारे विद्यालय का नाम सोनाराम उच्चतर माध्यमक विद्यालय है। यह विद्यालय असम के पुराने विद्यालयों में से एक है। इस विद्यालय की स्थापना सन 1864 ई• में हुई थी। ‘यह विद्यालय गुवाहाटी महानगर के पश्चिम अंश में अवस्थित है। यह महाबाहु ब्रह्मपुत्र नद के दक्षिण और भरलू नदी के पश्चिम तट पर अवस्थित है। इस विद्यालय के दाता में एक सोणाराम राजमोध। इसलिए इस विद्यालय का नाम सोनाराम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रखा गया है। इसके उत्तर दिशा में ब्रह्मपुत्र नद, पूरव में भरतु नदी और कालीराम बरूवा बालिका हाई स्कूल है। दक्षिण में राष्ट्रीय पथ तथा भरलुमुख थाना और पश्चिम दिशा में कालीपुर आश्रम है।

वर्णन: विद्यालय में कुल पाँच भवन हैं। विद्यालय के चारों ओर ईंट की दीवार है। इस विद्यालय में पाँचवी कक्षा तक छात्र तथा ग्यारहवो और बारहवों उच्चतर कक्षा में छात्र-छात्राएँ पढ़ते हैं। पाँचवीं से दसवीं तक की कक्षाओं में दो-दो शाखाएँ हैं। ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षाओं में कला और विज्ञान की एक-एक शाखा है। प्रत्येक कमरे में चार खिड़कियाँ और दो-दो दरवाजे हैं। विद्यालय के प्राख्यार्थ का और कार्यालय का तो विशेष कमरे हैं। इनके अलावा शिक्षक और शिक्षायित्री के दो अलग-अलग कमरे भी हैं। हमारे विद्यालय में एक बड़ा हॉल भी है। विद्यालय के पास एक अध्यक्ष का भवन और एक छात्रावास भी है।

हमारे विद्यालय में करीब पाँच सौ छात्र-छात्राएँ हैं। शिक्षक शिक्षयित्री की संख्या ४७ है। सभी विद्वान, अभिज्ञ और परिश्रमी हैं। वे हमें बड़े प्रेम और परिश्रम से बढ़ाते हैं। हमारे विद्यालय में फुटबाल, बॉलीबाल, हैण्डबॉल, क्रिकेट आदि खेलों की सामग्रियाँ हैं।

फुटबाल और क्रिकेट में हमारा स्कूल आगे है। हमारे विद्यालय से अंजलि नामक एक वार्षिक पत्रिका निकाली जाती है। इस पत्रिका में स्कूल के छात्र शिक्षक प्रबंध, कविता, कहानी आदि विभिन्न विषयों पर लिखते हैं।

वार्षिक उत्सव इस विद्यालय में वार्षिक उत्सव प्रति वर्ष मनाया जाता है। वार्षिक उत्सव में प्रतियोगितामूलक खेलकूद, एकांकी, तर्क प्रतियोगिता, कविता आवृत्ति, आकास्मिक भाषण प्रहसन, उद्म भेष प्रतियोगिता आदि होते हैं। इनके अलावा बर-गीत, लघु संगीत प्रतियोगिता भी होते हैं। विजयी छात्र-छात्राओं को पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं।

प्रति वर्ष हमारे विद्यालय में सरस्वती पूजा मनायी जाती है। १५ अगस्त को स्वतंत्रता दिवस, तथा २६ जनवरी को गणतंत्र दिवसभी मनाया जाता है।

उपसंहार – सोनाराम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का एक इतिहास है। इस विद्यालय में एक गोपीनाथ बरदलदेव, स्क हेमचन्द्र गोस्वामी आदि महान पुरुषों ने शिक्षकता की थी। तरूणराम फुकन इस विद्यालय के परिचालना कमेटी के बहुत वर्ष तक अध्यक्ष थे। सन् १९९४ ई में इस विद्यालय का सौ वर्ष पूरा हुआ। इस उपलक्ष्य में शातवार्षिकी उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया गया। हम विद्यालय की उन्नति की कामना करते हैं।

19. असम का प्राकृतिक सौन्दर्य 

भारत के पूर्व भाग में अवस्थित एक छोटा-सा राज्य है-असम। यह प्राकृतिक सम्पदाओं का भण्डार है, साथ ही प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध भी है। असम प्रकृति को सीलाभूमि है, वह राज्य चारों ओर पर्वत पहाड़ों से घिरा हुआ है. प्रकृति का इतना सुन्दर रूप भारत के दूसरे स्थान पर दिखाई नहीं देता। नदी, पहाड़, वन जंगलों से घिरा हुआ असम का यह रूप अपूर्व है, लगता है प्रकृति अपने सौन्दर्य को ढाल कर असम को सजाया है। असंख्य पहाड़ों से घिरा हुआ यह राज्य है। असम के प्राकृतिक सौन्दर्य का एक प्रधान उपादान है ब्रह्मपुत्र नद। पहाड़ों के बीच ऐसा वृहद नद खूब कम ही दिखाई देता है। वहापुत्र का और एक नाम है लुहत, ब्रहापुत्र नट की असंख्य शाखा प्रशाखाओं ने असम को और भी सुन्दर बना दिया है।

असम के सौन्दर्य का और एक उपादान है, यहाँ का वन जंगल। इतना घना हरियाली से भरा हुआ वन भूमि सब जगह दिखाई नही देता वनभूमि में शाल, देवदारू, वन-वृक्षों से भरा हुआ है। असम के प्रकृति ऋतु परिवर्तन से और भी सुन्दर हो जाता है। ग्रीष्म का प्रखर ताप असम में नहीं – होता, ग्रीष्म में भी असम में हरियाली ही छायी रहती है। वृक्षों में नये पत्ते जन्म लेते हैं। चारों ओर फूलों के सुगन्ध वन जंगलों में पक्षियों का चहचहाना बड़ा ही मनोरम लगता है। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु का आगमन होता है, साथ ही प्रकृति मानों नये सौन्दर्य से रहस्यमयी हो जाती है। नील पहाड़ों के बीच घने बादल छा जाते हैं। असम में शरद ऋतु बहुत कम समय तक रहती है, वर्षा के शान्त होने से पहले ही शीत आ जाती है चारों और शीत का प्रभाव पड़ता है। उसके बाद वसन्त ऋतु का आगमन होता है। यह असम की श्रेष्ठ ऋतु है, ना-ना प्रकार के फूलों से असम और भी सुन्दर हो उठता है।

असम के बाहर वालों की धारणा है कि असम जादू का राज्य है, जो एक बार आता है, वे फिर लौट कर नहीं जाते। वे जादू हैं- असम के प्राकृतिक सौन्दर्य के आकर्षण और सुख-सुविधा

20. मध्याह्न भोजन योजना अथवा दोपहर भोजन योजना

राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा पोषणिक समर्थन योजना 15 अगस्त 1994 को प्रारम्भ की गई थी। मध्याहन भोजन योजना हमारे देश में महत्वपूर्ण योजना है जिसके तहत स्कूली बच्चों को सभी कार्य दिवसों पर मुफ्त भोजन प्रदान की जाती है। इस योजना के सफल कार्यान्वयन से जहां एक ओर बच्चों में कृपोषण की समस्या कम हुई है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में सामाजिक संतुलन स्थापित करने में मदद कर रही है तथा रोजगार के प्रावधान के माध्यम से महिलाओं और वंचित सामाजिक के सशक्तिकरण में भी सार्थक साबित हो रही हैं। केन्द्र द्वारा प्रायोजित इस योजना की पहले देश के 2408 ब्लाकों में शुरु किया गया। वर्ष 1997-98 के अंत तक एन. पी. एन. एस.पी.ई. को देश के सभी ब्लाकों में लागु कर दिया गया। 2002 में इसे बढ़ाकर स्थानीय स्कूलों के कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों में पढ़ रहे बच्चों को भी इसके अंतर्गत शामिल कर लिया गया। इस योजना के अंतर्गत शामिल है। प्रत्येक स्कूल दिवस प्रति ब्लाक 100 ग्राम खाद्यान्न तथा खाद्यान्न सामग्री को लाने-ले जाने के लिए प्रति क्वंटल 50 रुपए की अनुदान सहायता। सितंबर 2004 में इस योजना में संशोधन कर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और ई.जी. एम. ए.आई.ई. केन्द्रों में पढ़ाई कर रहे कक्षा एक से पाँच तक के सभी को 300 केलोरी और 8-10 ग्राम प्रोटीन वाला पका हुआ मध्याह्न भोजन प्रदान करने की व्यवस्था की गई। सुखी प्रभावित क्षेत्रों में गर्मियों की छुट्टी के दौरान मध्याहन भोजन उपलब्ध कराने का प्रावधान किया। सरकारी, स्थानीय निकाय तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और ईजीएस तथा एआईइ केन्द्रों में कक्षा एक से पौचवी तक पढ़नेवाले बच्चों को पोषण स्थिति में सुधार।

21. प्रदूषण

प्रदूषण का अर्थ है दूषित वातावरण अर्थात् प्राकृतिक असंतुलन, यह मानव निर्मित एक – प्राकृतिक विपदा है। प्राकृतिक असंतुलन से आज प्रदूषण काफी बढ़ गया है। मानव चूँकि सबसे बुद्धिमान प्राणी है, ईश्वर ने सभी जीवों से मानव को बुद्धि ज्यादा दी है और इसी बुद्धि के बलबूते पर मनुष्य आकाशचुम्बी सपने देखता है और अपने सपने को साकार करने के लिए नित्य नये आविष्कार करते रहते हैं। धरती से आसमान को छूने की चाहत में नित्य नये आविष्कार करते गये। फलस्वरुप राकेट, हवाई जहाज बड़े-बड़े कल-कारखानने बने। नतीजा वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की मात्रा बढ़ गई। मनुष्य निर्मित यह प्रदूषण की समस्या विश्वव्यापी हैं। हमारा देश विकासशील है और हम औद्योगीकरण ही दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। विकसित देश में बड़े पैमाने पर कल-कारखाने और तेज वाहनों के कारण प्रदूषण सारे वायुमण्डल में फैलकर फ्लोरा कार्बन गैस की मात्रा बढ़ा दी है। कारखानों से लगातार कचरें निकल रहे हैं जो प्राय: जलाशयों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं। कहीं-कहीं खुली भूमि में भी कचरे डाले जाते हैं। इन कचरों में बहुत तरह के जहरीले रसायन होते हैं जो हवा, पानी और भूमि को इषित करते हैं। कृषि भूमि पर कीटनाशक दवाओं का प्रयोग धीरे-धीरे मानवदेह में भयंकर विष संचार कर रहा है। शहर निर्माण के लिए पेड़ों को काट कर परिवेश प्रदूषित कर रहे हैं। वृक्षों को ध्वंस करने से सिर्फ मनुष्य का नेत्र श्यामल स्निग्धा से वंचित नहीं होता, बल्कि परिवेश का भारसाम्य भी नष्ट होता है।

ईश्वर एक अम्लान सुन्दर पृथ्वी में हम सबको प्रेरण किये थे पर हमलोग अपने सुख के लिए उसकी पवित्रता और सोन्दर्य को ध्वंस कर रहे है। मनुष्य के द्वारा गठित सभ्यता का अन्यतम ‘कुफल है यह प्रदूषण कर्तमान में सुख-सुविधाओं के लोभ में जिन्दगी भर के लिए ईश्वर द्वारा सजाया गया निसर्ग-संसार को नष्ट कर रहे है।

22. बाढ़

जल का एक पर्यायवाची शब्द है जीवन शायद वह इसलिए कि जल के अभाव में न तो जीवन की रचना या उद्भव संभव है और न ही जीवन उसके बिना रह ही सकता है। केवल मनुष्य ही नहीं, धरती के अन्य सभी छोटे-बड़े पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ आदि सभी का जीवन जल है और उसका अभाव सभी का स्वतः हो अभाव या मृत्यु है। लेकिन यही प्राणदायक प्राकृतिक तत्व जल जब बाढ़ का रूप धारण कर लेता है तो प्रकृति का एक क्रूर परिहास भी बन जाया करता है। जल प्रलय से नदी, समुद्र, तालाब सभी जलाशय किनारा छिन्न कर भयंकर आक्रोश से चराचर के सब कुछ ग्रास करने को अग्रसर होता है। अप्रतिशोध जलप्लावन के आघात से मनुष्य का वासगृह, खलिहान, पशुधन और मकानों आदि के नाश के रूप में धन हानि हुआ करती है। एक तरफ बाढ़ मनुष्य, पशु-पक्षी कीटपतंग सब प्राणी को मृत्यु के अतल अंधकार में खींच लेती है। दूसरी तरफ शस्य खेत प्लावित होकर नष्ट हो जाते है। एक तरफ आसमान जीवन के मृत्यु- अभिसार के सकरूण दृश्य, दूसरी और अपार जलराशि के दिगन्त विस्तृत रुद्रनृत्य, पर जीवन का कोई भी दुःख चिरस्थायी नहीं होती। धीरे- धीरे अन्तराल से जीवन फिर अजेय प्राणशक्ति से भर उठता है और यह भयानक परिणाम जल्दी खत्म नहीं होती पृथ्वी के प्राय सभी देश कभी न कभी बाढ़ के प्रकोप में पढ़ता है किन्तु नदी बहुल भारतीय जीवन में प्राय: नियमित घटता है, कभी-कभी अतिवृष्टि के कारण नदी, तालाब के जलप्रवाह में वृद्धि पाकर बाढ़ का कारण बनता है। तो कभी पर्वतों के बर्फ प्राकृतिक कारणों से अचानक बृहत परिमाण में बाढ़ का कारण बनता है। पर बाढ़ की भीषणता के अन्तराल में एक कल्याणमय रूप रहता है। जलप्रवाह से गंदगी साफ हो जाती है. कृषि जमीन उर्वर हो जाती है, जहाँ फसल अच्छा होता है।

23. इन्टरनेट की उपयोगिता

इन्टरनेट सूचना का एक समृद्ध और व्यापक स्रोत और एक आवश्यक संचार उपकरण प्रदान करता है। ऑनलाइन बैंकिंग आवेदन, शॉफिंग और नौकरी की मांग के रूप में कई सेवाए प्रदान करता है। इन्टरनेट लोगों के माध्यम से भी साझा और विभिन्न साइटों पर बातचीत के माध्यम से एक ही हितों के साथ अन्य लोगों से मिलने में सहायता करता है। इन्टरनेट ऑनलाइन शिक्षण प्रदान करता है, संचार को आसान बनाता है। नवीनतम और अतीत खबर सुर्खियों में देता है। ऐसे बुकिंग टिकट, धन हस्तांतरण, उपयोगिता बिल का भुगतान और करों के रूप में मनोरंजन प्रयोजनों और कई ऑनलाइल सेवाओं के लिए इस्तेमाल सही से अपने पर बैठकर ही कर सकते है। इन्टरनेट की सहायता से नौकरी खोज और आवेदन पत्र और होटल के रूप में भी उड़ान बुकिंग कर सकते हैं। लोग इन्टरनेट पर अपने दैनिक कार्यों और आवश्यकताओं का उपयोग कर सकते हैं। इन्टरनेट की दुनिया सबसे निराली और सबसे प्यारी है। हम एक यंत्र के माध्यम से इस दुनिया में प्रवेश कर सकते हैं। यहां पर हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है। चिकित्सा, भौगोलिक, विज्ञान, औद्योगिक, साहित्य इत्यादि से संबंधित कोई भी जानकारी चाहिए तुरंत उपलब्ध हो। जाएगा। इन्टरनेट ने संसार को एक बॉक्स में कैद कर लिया है। इन्टरनेट की सहायता से दूसरे देशों में भ्रमण के लिए जाने से पहले इन्टरनेट के द्वारा जानकारी उपलब्ध कर सकते हैं। उस देश में संबंधित हर स्थान के विषय में सठीक जानकारी इसके माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। इन्टरनेट ने दुनिया को जोड़ने का कार्य किया हैं। लोग मेल के माध्यम से अपने अपने राज्य या देश से अन्य राज्य या देश में स्थिति कार्यालय से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं। साथ ही उसे वेब कैमरे की सहायता से देखा भी जा सकता है। इन्टरनेट की दुनिया में अब शॉपिंग की सुविधा भी उपलब्ध हो गई है। घर बैठे कुछ भी मंगवा सकते है।

24. प्लाष्टिकः मनुष्य का शत्रु

प्लाष्टिक गांव से लेकर शहर तक लोगों की सेहत बिगाड़ रहे हैं। शहर का ड्रेनेज सिस्टम अक्सर प्लाष्टिक से भरा मिलता है। इसके चलते नालियाँ और नाले जाम हो जाते हैं। प्लष्टिक के गिलासों में चाय या गर्म दूध का सेवन करने से उसका केमिकल लोगों के पेट में चला जाता है। इससे डायरिया के साथ ही अन्य गंभीर बीमारियाँ होती है।

प्लष्टिक का बढ़ता हुआ उपयोग न केवल वर्तमान के लिए बल्कि भविष्य के लिए भी खतरनाक होता जा रहा है। प्लष्टिक पूरे देश की गंभीर समस्या है। प्लष्टिक का प्रोयग हमारे जीवन में सर्वाधिक होने लगा है। इसका प्रयोग नुकसानदायक है यह जानते हुए भी हम धड़ल्ले से इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि इसके प्रयोग पर रोक लगे तो बात बने। प्लष्टिक को जलाने से भी नुकसान होगा। इसका जहरीला धुआँ स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं। पॉलिथीन की पन्नियों में लोग कूड़ा भरकर फेंकते हैं। कूड़े के ढेर में खाद्य पदार्थ खोजते हुए पशु पत्नी निगल जाते हैं। ऐसे में पन्नी उनके पेट में चली जाती हैं। बाद में ये पशु बीमार होकर दम तोड़ देते हैं।

प्लाष्टिक और पॉलिथीन का प्रयोग प्रयविरण और मानव की सेहत दोनों के लिए खतरनाक हैं। कभी न नष्ट होने वाली पॉलिथीन भूजल स्तर को प्रभावित कर रही है। देखा जा रहा है कि कुछ लोग अपनी दुकानों पर चाय प्लष्टिक की पन्नियों में मँगा रहे हैं। गर्म चाय पन्नों 1 में डालने से पन्नी का केमिकल चाय में चला जाता है, जो बाद में लोगों के शरीर में प्रवेश कर जाता है। चिकित्सकों ने प्लाष्टिक के गिलासों और पॉलिथीन में गरम पेय पदार्थों का सेवन न करने की सलाह दी हैं।

वास्तव में प्लष्टिक पर्यावरण के लिए काफी खतरा है। पर्यावरण में रहने वाले सभी जीव- जंतु मनुष्य एवं जल में रहने वाले जीवों के लिए काफी खतरनाक है। काफी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि प्लष्टिक प्रदूषण की वजह से जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण आदि जो जाते हैं और मनुष्य को इन प्रदूषण की वजह से काफी समस्याएं होती है। वास्तव में हम सभी को प्लास्टिक से होने वाले खतरों के बारे में जानकर इस ओर जागरूक होना चाहिए और प्लाष्टिक बैगों का उपयोग नहीं करना चाहिए। हमें इस ओर ध्यान देते हुए अपने पर्यावरण को बचाना चाहिए क्योंकि पर्यावरण है तो हम हैं।

25. स्वतन्त्रता दिवस

15 अगस्त, 1947 ई० से पूर्व हमारा देश अग्रेजी शासन के अधीन था। ब्रिटिश शायनो के अन्तगत हयु विवश और पीड़ित थे। ब्रिटिश शासकों के अत्याचार और शोषण के विरुद्ध हमारा राष्ट्र प्रारम्भ से संघार्षरत था किन्तु इस संघर्ष का फलप्राप्त हुआ 15 अगस्त 1947 ई० को, जब हमारा देश स्वतन्त्र हौ गया। 15 अगस्त भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है। जिस दिन सदियों बाद परतन्त्रता की घटा छाँटी थी। 15 अगस्त का सवेरा भारतवासियों के लिए एक नई उमंग लेकर आया। इसी दिन हमारी परतन्त्रता की बेड़ियाँ खुल गई अंग्रेजो ने भारतीय कर्णधारों को सत्ता सौंप दी। तभी से प्रतिवर्ष इस दिन हम स्वतन्त्रता प्राप्ति की वर्षगाँठ मनाते है और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते है। हम भारतवासी अपने राष्ट्रध्वज के समक्ष उसके सम्मान में राष्ट्रीय गीत गाते है अपने देश की अखण्डता और अपने अस्तित्व को बनाए रखने तथा प्रत्येक दृष्टि से भारत को प्रगतिशील बनाने की दृष्टि से यह एक ऐसा महान अवसर है जब हमें निजी स्वार्थों से ऊपर उठ कर स्वयं से राष्ट्रमे भावना को जाग्रत करना चाहिए तथा अपने राष्ट्र की समृद्धि, प्रगति एवं खुशहाली हेतु समर्पित भाव से जुट जाना चाहिए।

प्रत्येक भारतवादी को आज के दिन भारत की समृद्धि और अखण्डता की सुरक्षा के लिए प्रतिज्ञा करनी चाहिए। यह न भूलें कि हमारा कर्तव्य अब सिर्फ झण्डे फहराना और राष्ट्रीय गीत गाना ही नहीं रह गया है, हमें अभी अनेक बन्धनों से मुक्त होना है।

स्वतन्त्रता दिवस हमें हमेशा प्रेरित करता है कि हम अपने अतीत से सबक लेकर अपने उज्वल भविष्य को संवारे।

26. अनुशासन 

राष्ट्र निर्माण चट्टों तथा वृक्षों से नही वरन उसके नागरिकों के चरित्र से होता है। अनुशासित नागरिक ही देश को उन्नति के पथ पर अग्रसर करते है। सामान्य व्यक्ति से लेकर राष्ट्र और सम्पूर्ण समाज का विकास अनुशासन के द्वारा ही सम्भव है।

छात्र जीवन में अनुशासन का अत्यधिक महत्व है। किसी भी देश का उत्थान-पतन उसके भावी कर्णधारों पर ही निर्भर है और अनुशासित छात्र ही सच्चरित्र तथा मन, वयन एवं कर्म से शुद्ध होते है।

विद्या क्षेत्र या विद्यालय वास्तव में वह स्थान है कि जहाँ रह कर एक अच्छा विधार्थी अन्य सभी क्षेत्रों के अनुशासन के नियमों को जान समझ कर उन पर आयरण का अभ्यास कर अपने भावी जीवन के लिए भी सन्तुलन पा सकता है। विद्यार्थी जीवन को सभी प्रकार की उचित आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए उन सभी के साथ उचित व्यवहार करना ही वास्तव में अनुशासन है। जो विद्यार्थी अपने विद्या क्षेत्र में सही और सन्तुलित शिक्षा प्राप्त करता है, अपना व्यवहार एवं आचार भी सन्तुलित रखा करता है, घर-परिवार में आकर उन सब तथा आसपासवालों के प्रति उसका व्यवहार स्वयं ही सन्तुलित हो जाया करता है। यह सन्तुलन ही वास्तव में अनुशासन है। आदमी की पहचान है। अनुशासित व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में शिक्षित भी कहलाता है। इस प्रकार यह अनुसासन ही वह मुल धरातल है जिस पर खड़े हो और शिक्षा प्राप्त कर प्रत्येक विद्यार्थी अपनी भावी सफलता के द्वार खोल लेता है।

अत: जिस प्रकार थल सेना, जल सेना, नभ सेना तथा राज्य के अस्तित्व के लिए अनुशासन परमावश्यक है उसी प्रकार सामान्य मानव जीवन सर्व विद्यार्थी जीवन के लिए भी अनुशासन अनिवार्य है।

27. गणतन्त्र दिवस

गणतंत्र दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है। राष्ट्रीय पर्व होने के कारण इसका महत्व सभी जाति और सभी संप्रदाय के लोगो के लिए समान है। यह पर्व 26 जनवरी के दिन मनाया जाता है।

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास पर यदि हम नजर डालें तो हमें पता चलेगा कि 26 जनवरी, 1930 के दिन हमारे देश के नेताओं ने पर नेहरु की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज की मांग की थी, तभी से हर साल यह माँग उस समय तक दोहराई जाती रही जब तक कि 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद नहीं हो गया, आजादी की प्राप्ति के बाद भी भारत को गणतंत्र बनाने के लिए संविधान निर्माण में ढाई वर्ष लग गए। भारत का संविधान बना और उसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया, तभी से 26 जनवरी का दिन प्रतिवर्ष ‘गणतंत्र दिवस’ के रुप में मनाया जाने लगा।

26 जनवरी अनन्त बलिदानों और पवित्रतम त्यागों की पावन स्मृति लेकर उपस्थित होती है। इस पवित्र दिवस के शुभ अवसर पर हम अपने अमर शहीदों की कुर्बानियों की याद करते हैं और उनसे देश पर न्यौछावर होने की प्रेरणा ग्रहण करते है। वास्तव में यह दिवस राष्ट्रीय भावनाओं की प्रेरणा का दिन है, यह दिवस हमारे भीतर राष्ट्रीय चेतना का अमंद (तीव्र) और अक्षय स्रोत प्रवाहित करता है, इस दिन घर-घर में चहल-पहल और प्रसन्नता का वातावरण रहता है, यह पर्व हमारे राष्ट्रीय संकल्प का पर्व है। इस दिन हम यही संकल्प लेते है कि हमारी जान भले ही चली जाए, हम अपने राष्ट्रीय ध्वज की शान नही मिटने देंगे।

इस पवित्र और अविस्मरणीय अवसर पर राष्ट्रपति सर्वप्रथम राष्ट्रीय ध्वज महराते हैं। राष्ट्रीय ध्वन को 37 तोपों की सलामी दी जाती है। इस दिन लड़ाई के काम आने वाले विभिन्न प्रकार के उपकरण प्रदर्शित किए जाते हैं। विभिन्न प्रकार के टैंकों, मिसाइलों और युद्ध में काम आने वाले विभानों को भी इस दिन देशवासियों के सामने प्रदर्शित किया जाता है, इन्हें देखकर देशवासियों में अपनी मातृभूमि की सुरक्षा में समर्थ केन्द्रीय सरकार के प्रति आश्वस्ति (आश्वासन) का भाव जगता है।

इस प्रकार गणतंत्र दिवस या 26 जनवरी का त्योहार एक ऐसा त्योहार है जो जनता के हृदय में उत्साह पारस्परिक सहयोग, भाईचारा, स्वाभिमान की भावनाएँ जगाता है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने कितना संघर्ष किया था और कितने कष्ट झेले थे, इन शहीदों ने हमें आजादी दी, हमारा कर्तव्य है कि हम उस आजादी की रक्षा करे, तथा हर कीमत पर इस गणतन्त्र की रक्षा करनी है। हमें आपसी भेद- भाव को मिटाना है और राष्ट्र निर्माण के प्रत्येक कार्य में योगदान देना है जिससे हमारा देश हमेशा प्रगति के मार्ग बढ़ता रहे और संसार में सम्मान के साथ सिर ऊँचा उठाए रखे।

28. महात्मा गाँधी 

महात्मा गाँधी अहिंसा, सत्य और प्रेम की प्रतिभा है, इन्हे हम राष्ट्रपिता कहते है। इन्हें हम श्रद्धा और प्रेम से ‘बापू’ के नाम से भी पुकारते हैं। इन्ही के अथक प्रयास से भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिली, भारत देश से राष्ट्र हुआ, हिमालय की ऊँचाई, महासागर की गहराई और आकाश की नील विस्तृति से इनका व्यक्तित्व निर्मित हुआ है। जिसने न केवल भारतीय राजनीति का नकशा बदला, बल्कि सम्पूर्ण विश्व को सत्य, अहिंसा, शांति और प्रेम की अजेय शक्ति के दर्शन कराए।

महात्मा गाँधी का जन्म 1869 में 2 अक्टुवर को काठियावाड़ के पोरबन्दर नामक स्थान में वैश्य परिवार में हुआ था, इनके पिता का नाम करमचंद गाँधी और माता का नाम पुतलीबाई था, महात्मा गांधी का पुरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था।

विशेषता प्रकट होने लगी थी, बाल्यकाल में ही इनमें सत्य के प्रति अटूट आस्था उत्पन्न हो •मोहनदास स्कूल-जीवन में साधारण कोटि के छात्र थे, परन्तु व्यावहारिक जीवन में इनकी गई थी, उन्होंने अध्यापक द्वारा नकल कराए जाने पर नकल करने से इंकार कर दिया, सत्यप्रिय बालक मोहनदास ने ऐसा नहीं किया पहले तो शिक्षक मोहनदास पर बहुत बिगड़, पर बाद में इनकी सत्यप्रियता से बहुत प्रसन्न हुए, वे 1887 में कानून पढ़ने के लिए विलायत चले गए, विलायत जाते समय उन्होंने अपनी माँ के सामने संकल्प किया कि ये मांस, शराब, और महिला से अलग रहेंगे। इन्हेंने अपने इस संकल्प को भलीभांति निभाया वे बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। वकालत के सिलसिले में उन्हें एक बार दक्षिणी अफ्रीका जाना पड़ा। यहाँ भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था, स्वयं मोहनदास के साथ भी ऐसा दुर्व्यवहार घटित हुआ, उसे देखकर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। उन्होंने 1894 में ‘नटाल इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना करके गोरी सरकार के विरुद्ध बिगुल बजा दिया, सत्याग्रह का पहला प्रयोग उन्होंने यहाँ किया था भारत आकर गाँधी जी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होने सत्य और अहिंसा -को आधार बना कर राजनीतिक स्वतन्त्रता का आंदोलन छेड़ा। 1920-22 में उन्होंने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध असहयोग आंदोलन छेड़ दिया, विदेशी वस्तों की होली जलाई गई। सन 1929 में गाँधी जी ने पुनः आंदोलन प्रारम्भ किया। यह आन्दोलन ‘नमक सत्याग्रह’ के नाम से प्रसिद्ध है। गाँधीजी ने स्वयं साबरमती आश्रम से डांडी तक पदयात्रा की तथा वहाँ नमक बनाकर नमक कानून का उल्लधंन किया, सन 1942 में अपने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन छेड़ दिया। देश भर में क्रान्ति की ज्वला सुलगने लगी, देश का बच्चा-बच्चा अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने पर उतारु हो गया, गाँधीजी को देश के अन्य नेताओं के साथ बंदी बना लिया गया 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतन्त्र हो गया।

गाँधी नें बुद्ध की करुणा और ईसा के प्रेम का मधुर समन्वय था। इन्होने उपेक्षितो, शोषितों, और रुग्ण तथा जड़ परम्पराओं में पिसते लोगो को अपना अशेष प्यार दिया, गाँधीजी मानवता के साक्षात विग्रह थे। विश्वबन्धुत्व इनके जीवन का आदर्श था, दुदर्शी, प्रज्ञाचक्षु लोकनायक महात्मा गाँधी ने भारत का राजनीतिक परतन्त्रता से मुक्ति दिलाई, सामाजिक जड़ता से मुक्त होने के मार्ग निर्दिष्ट किए और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में फैले गहन अंधकार को दूर करने के उपाय बताए। ये केवल भारत के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के बन्दनीय पुरुष बन गये। उन्होने शाताब्दियों से सोए हुए भारतबर्ष को जाग्रत किया और देश में आत्मसम्मान की लहर दौड़ाई।

29. मोबाइल फोन

मोबाइल फोन विज्ञान का एक अद्भुत आविष्कार है जिसने पूरी दुनिया का नक्शा ही बदल दिया है, इसके कारण लोगों की सोचने समझने का तरीका ही बदल गया है। दुनिया में सभी के पास आजकल मोबाइल है और वर्तमान में तो मोबाइल फोन को ही स्मार्टफोन का रूप दे दिया गया है, जिससे इसको मिनी कंप्यूटर भी कहा जाने लगा है। क्योंकि जो कार्य एक कंप्यूटर करता है वह सभी कार्य अब स्मार्टफोन से भी हो सकते हैं। मोबाइल फोन के कारण हर क्षेत्र में बदलाव आया है चाहे वह व्यापार का क्षेत्र, विज्ञान हो या फिर कृषि क्षेत्र मोबाइल के आविष्कार के कारण लोग चलते-फिरते दुनिया के किसी भी क्षेत्र में बातचीत कर सकते हैं या फिर वीडियो काल करके एक-दूसरे को देख भी सकते है।

पुराने जमाने में जो संदेश पहुंचने में सप्ताह भर से ज्यादा का समय लग जाता था आजकल वे संदेश चंद मिनटों में एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाता है, यह सब कुछ सिर्फ मोबाइल फोन के कारण ही संभव हो पाया है मोबाइल फोन के कारण दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव तो आए हैं लेकिन साथ ही यह अपने साथ कई दुष्परिणाम भी लेकर आया है जिसके कारण वर्तमान में सभी लोग इसके नुकसान से ग्रसित है। मोबाइल फोन से लाभ और हानि दोनों होता है। मोबाइल फोन के लाभ :

मोबाइल फोन से हम दुनिया के किसी भी व्यक्ति से बिना उसके पास जाएं बात कर सकते हैं। व्यापार में केलकुलेटर के रूप में उपयोग में लिया जा सकता है। इसका उपयोग करके हम एक दूसरे को संदेश भेज सकते हैं मोबाइल फोन से हम फोटो और वीडियो 1 भी बना सकते हैं। इससे हम इंटरनेट का उपयोग कर सकते हैं जिसे हम इंटरनेट पर उपलब्ध सभी जानकारियों को देख और पढ़ सकते हैं। मोबाइल फोन बहुत ही छोटा उपकरण है जो कि हमारे जेब में आसानी से आ जाता है जिसके कारण हम किसी भी जगह इसका उपयोग कर सकते है। इससे हम किसी भी वस्तु, व्यक्ति के बारे में या फिर अन्य कई जानकारी तुरंत प्राप्त कर सकते हैं। हम कोई नए शहर या देश में जाते हैं तो अगर वहा हम भटक जाते हैं तो इसकी सहायता से हम मैप और अपनी करंट लोकेशन देख सकते हैं। इसकी सहायता से इंटरनेट पर नए दोस्त बना सकेत हैं और साथ हो अपने दोस्तों और परिचितों के साथ जुड़े रह सकते हैं जैसे हम हर पल की जानकारियां सभी लोगों को एक साथ दे सकते हैं। आजकल तो इसके उपयोग से हम पैसों का लेन-देन भी कर सकते हैं जिसके कारण हमें बैंक में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मोबाइल फोन से हम घर बैठे आनलाइन शापिंग कर सकते हैं और कोई भी सामान अपने घर में मंगवा सकते हैं बिना किसी दुकान पर जाएं।

मोबाइल फोन से हानि

मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमान से आंखे कमजोर होने लगती है जिससे भविष्य में कम दिखाई देने की समस्या उत्पन्न हो सकती है। स्मार्ट फोन के इस्तेमाल से विद्यार्थियों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि विद्यार्थी पूरे दिन इसी में मनोरंजन के लिए संगीत और गेम खेलते रहते है जिससे बार बार उसका ध्यान स्मार्ट फोन की तरफ ही जाता है। इसके ज्यादा इस्तेमाल से यादाश्त भी कमजोर होती है क्योंकि हम सब कुछ मोबाइल में ही सेव कर लेते हैं और याद रखने की कोशिश नहीं करते हैं। मोबाइल फोन के कारण दुर्घटनाएं भी अधिक घटित होने लगी हैं क्योंकि लोग वाहन चलाते समय मोबाइल पर बातें करते रहते हैं और ध्यान सड़क से हट जाता है। मोबाइल से ज्यादा बातें करने पर इसमें से रेडिएशन निकलता रहता है जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। आजकल ज्यादातर युवा मोबाइल से पूरे दिन गाने सुनते रहते हैं जिसके कारण उनके सुनने की शक्ति कमजोर हो जाती है।

30. राजनीति और विद्यार्थी

विद्यार्थी जीवन अध्ययन का काल होता है। अध्ययन तपस्या है। अध्ययन का अर्थ होता है- सीखना पढ़ने के समय छात्रों को ध्यान पूर्ण रूप से अपने विषय को ओर होना चाहिए। यदि छात्र अध्ययनकाल में राजनीति में रूचि लेने लगते हैं तो निश्चित रूप से इससे उनके अध्ययन में व्यवधान पड़ता है।

वैदिक काल में विद्यार्थी वेदों का अध्ययन करते थे। अध्ययन काल में उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं था। विद्यार्थियों को हर प्रकार की राजनीति से दूर रह कर केवल अध्ययन में मन लगाना चाहिए। विद्यार्थी जीवन ज्ञानार्जन का काल होता है। इसमें कूटनीति और जाल फरेब का कोई स्थान नहीं होता। अध्ययनकाल में छात्रों का राजनीति घटनाचक्रों से परिचित होना एकदम आवश्यक है, पर उनमें शरीक होना ठीक नहीं है। आधुनिक जीवन में राजनीति हर क्षेत्र में हावी हो रहे हैं। छात्र भी इससे अछूते नहीं है। यदि छात्र राजनीति के इस काले पक्ष की रसंगति कर लेते हैं तो उनका जीवन निरर्थक हो जाता है। वे उस नाव की तरह हो जाते हैं जिसकी पतवार खो गई हो। विद्यार्थियों को हर प्रकार से राजनीति से दूर रह कर केवल अध्ययन मैं मन लगाना चाहिए, ताकि उनका मन-मस्तिष्क तरोताजा और स्वस्थ्य रहे सके. जिससे भविष्य में वे अच्छे नागरिक सिद्ध होने के साथ-साथ हर क्षेत्र में देश की जागडोर भी सफलता के साथ सम्भाल सकें।

छात्र राष्ट्र के भावी कर्णधार है। छात्र समाज से जुड़े हैं। शिक्षा प्रणाली, शिक्षा व्यवस्था, पाठ्यक्रम, शैक्षिक वातावरण इन सब पर किसी न किसी रूप में राजनीति का असर होता ही है किन्हीं असुविधाओं के विरोध में आवाज उठाना राजनीति नहीं है, राजनीति तो तब है जब उस आवाज के पीछे कोई राजनीति प्रतिबद्धता हो । छात्र शिक्षा प्रणाली, शिक्षा व्यवस्था के प्रति आवाज उठा सकते हैं, पर इस आवाज के पीछे उद्देश्य की स्वच्छता होनी चाहिए। विद्यार्थी को राजनीति के क्षेत्र में भी अन्य पढ़ाई की तरह विद्यार्थी बने रह कर ही भाग लेना चाहिए।

31. दूरदर्शन और विद्यार्थी

आधुनिक युग में दूरदर्शन मानव जीवन का एक अभिन्न एवं अनिवार्य अंग है। दूरदर्शन के माध्यम से मानव जीवन अत्यंत सुगम, सरल एवं सुविधाजनक बन गया है। मनुष्य आज पर बैठे ही देश-विदेश में होने वाले विविध प्रकार के समाचार, विचार-विमर्श, मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धक समाजोपयोगी कार्यक्रम देखकर ज्ञानार्जन कर सकता है। अर्थात दूरदर्शन एक ऐसा उपकरण है जिसने संपूर्ण विश्व को सुगमता से एक ही स्थान पर एक चित्र कर दिया है जिसके फलस्वरूप मनुष्य सहजता से ही स्वयं का ज्ञानवर्धन र सकता है।

आज के युग में दूरदर्शन का सबसे ज्यादा प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ा है। दूरदर्शन ज्ञानवर्धनका अत्यधिक प्रभावशाली माध्यम है, किंतु उन के विद्यार्थी दुर्भाग्य से केवल मनोरंजन की सामग्री ढूढ़ते हैं, वे चलचित्र, खेलकूद, संगीत, टीवी सीरियल इत्यादि देखकर अपना अमूल्य समय नष्ट करते हैं। बाहरी दुनिया से कटकर विद्यार्थी केवल दूरदर्शन देखकर ही अपना तन, मन एवं शरीर नष्ट करते हैं तथा आत्मकेंद्रीत हो जाते हैं।

दूरदर्शन विद्यार्थियों के अध्ययन में भी बहुत बड़ी बाधा है, इसपर ऐसे मनोरंजक, सनसनीखेज एवं आकर्षक कार्यक्रम दिखाए जाते है, जिससे विद्यार्थी का मन स्वतः हो अध्ययन से बहुत दूर चला जाता है। विद्यार्थी जीवन के मूल उद्देश्य से भटक जाते है, चूंकि इसका प्रभाव सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों है अतः विद्यार्थियों को दूरदर्शन के दोनों पहलुओं को समझना चाहिए एवं ध्यान रखना चाहिए कि यह उपकरण हमारे साधन है, साध्य नहीं। समाज में अपने आपको प्रतिष्ठित करने के लिए एवं एक आदर्श नागरिक बनने के लिए संयम से इसके वरदानों को अपने जीवन में उतारना चाहिए तभी विद्यार्थी अपने जीवन के लक्ष्य को सुगमता से पा सकेगा एवं समाज का एक सक्षम तथा आदर्श नागरिक कहलाएगा।

32. होली

भारत उत्सवों का देश है। होली सबसे अधिक रंगीन और मस्त उत्सव है। होली चैत मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है, होली के मूल में हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद और होलिका का प्रसंग आता है। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मार डालने के लिए होलिका को नियुक्त किया था। होलिका के पास एक ऐसी चादर थी जिसे ओढ़ने पर व्यक्ति आग के प्रभाव से बच सकता था होलिका ने उस चादर को ओढ़कर प्रहलाद को गोद में ले लिया और अग्नि में कुद पड़ी। वहाँ दैवीय चमत्कार हुआ। होलिका आग में जलकर भस्म हो गई, परन्तु विष्णुभक्त प्रहलाद का बाल भी बाँका न हुआ, भक्त की विजय हुई, राक्षस की पराजय । उस दिन सत्य ने असत्य पर विजय घोषित कर दी। तब से लेकर आज तक होलिका दहन की स्मृति में होली का मस्त पर्व मनाया जाता है ।

समाजशास्त्रियों का कथन है कि कृषिप्रधान देश भारत के सारे पर्व फसल के साथ जुड़े है। होली रबी फसल की आशा की खुशी में मनाई जाती है ‘होली’ का अर्थ दुग्धपूर्ण अनाज का भूना हुआ रूप होता है। अगजा के दिन गाँवों और शहरों में एक निशिचत स्थान पर ‘होलिकादहन’ होता है। निश्चित समय पर सभी लोग एकत्र होते. है, बच्चों द्वारा एकत्र किए गए लकड़ी-गोवठे और घास पात में आग लगाई जाती है। आग लगते ही ढोल पर थाप देकर लोग होली गाने लगते है। अजीब आनन्द का वातावरण छा जाता है। दूसरे दिन होली खूब धुमधाम से शुरु होती है। रंग, गुलाल, नए वस्त्र और मुस्कराते हसते चेहरे यही है इस पर्व की पहचान इस दिन कोई किसी का शत्रु नहीं होता, जीवन में रस का संचार करने वाली होली का वास्तविक अभिनन्दन तभी सार्थक होगा जब हम संप्रदाय, जाति, धर्म, ऊँच-नीच की भावना और विद्वेष से ऊपर उठकर सबको गले लगाने के लिए तैयार होंगे।

होली प्रेम, उमंग और उल्लास का पर्व है। इस पर्व की जुबान पर हिन्दुओं की जिन्दादिली की कथा होती है। इस पर्व के हृदय में हिन्दुओं के उच्छल प्रेम का मधुर लाभवेदीय संगीत होता है।

होली प्राणों का शीतल पर मादक रस है होली आत्मा की झकृति का संगीत है होली मन के खिले पुष्य की गंध है।

33. भ्रमण अथवा पर्यटन 

मानव-मन परिवर्तन चाहता है क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। मनुष्य प्रतिदिन कुछ न कुछ नया चाहता है, इसी कारण वह विभिन्न देशों एवं स्थानों का भ्रमण करता है। भ्रमण से केवल मनेरजंन ही नहीं होता वरन यह हमारे लिए अन्य कई दृष्टियों से एक वरदान भी है।

मनुष्य प्राचीनकाल से ही भ्रमण करता रहा है, मनोरंजन मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। एकरसता से ऊवकर मानव-मन परिवर्तन चाहता है। भ्रमण ज्ञान-प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। भ्रमण करने वाला व्यक्ति कष्टसहिष्णु होता है, उसकी क्षुद्र स्वार्थ- भावना समाप्त हो जाती है। उसके जीवन में नियमितता धैर्य, साहस, दृढ़ता, परोपकार, जनकल्याण तथा उदारता का विकास होता है। भ्रमण से हमारे ज्ञान की संकीर्णता दूर होती है। हम विभिन्न जातियों, वर्गों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के प्रत्यक्ष संपर्क में आते है।

किसी भौगोलिक स्थान की भौगोलिक स्थिति की जानकारी के लिए उस स्थान का भ्रमण जरुरी है। जो ज्ञान पुस्तको के अध्ययन से भी प्राप्त नही होता वह प्रत्यक्ष दर्शनन से अधिक प्रभावशाली रूप में प्राप्त होता है।

पुस्तकीय ज्ञान से व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त नहीं होता भ्रमण द्वारा पुस्तकीय ज्ञान व्यावहारिक ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है। प्रत्येक क्षेत्र और देश के व्यावहार तथा संस्कृति में अन्तर होता है। भ्रमण के माध्यम से हम प्रत्यक्ष रुप से उनके व्यवहार एवं संस्कृति का ज्ञान प्राप्त कर सकते है। इस प्रकार भ्रमण से विश्व शान्ति के प्रायासों में सहायत मिलती है और सद्भावना बढ़ती है। जीवन की यथार्थ को समझने एवं संसार की राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थिति तथा कला-कौशल का ज्ञान प्राप्त करने में भ्रमण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्राचीनकाल में यातायात की इतनी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी, फिर भी लोग तीर्थाटन के बहाने भ्रमण करते थे, यो यात्राएँ कष्टकर होती थी। आजकल एक स्थान से दूसरे स्थान तक आना-जाना अत्यन्त सुगम तथा सरल हो गया है।

अतः यह स्पष्ट है कि भ्रमण केवल राष्ट्रीय एकता दृढ़ करने में ही नहीं, अंतराष्ट्रीय सद्भाव, मैत्री तथा सहयोग बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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