SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-5| सड़क की बात

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-5| सड़क की बात सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-5| सड़क की बात लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-5| सड़क की बात

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पाठ 5

सड़क की बात

अभ्यासमाला

शन 1. एक शब्द उतर दो 

(क) ‘मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती’ यहां ‘मैं’ किसके लिए प्रयुक्त है?

उतर सड़क।

(ख) रुव वनाथ ठाकुरजी किस आया से विषित ? 

उत्तर: गुरुदेव रवींद्रनाथ ‘ठाकुर ‘विश्व कवि’ की आख्या से विभूषित हैं।

(ग) वनाथ ठार के पिता का नाम क्या था? 

उत्तर : रवींद्रनाथ ठाकुर के पिता का नाम देवेंद्रनाथ ठाकुर था।

(घ) कौन-सा काव्य-ग्रंथ रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कीर्ति का आधार स्तम्भ है ?

उत्तर: कवि शिरोमणि रवींद्रनाथ ठाकुर को कीर्ति का आधार स्तम्भ है उनका काव्य-ग्रंथ ‘गीतांजलि’ ।

((ङ)) सड़क किसी आख घड़िय का इतजार कर रही ?

उत्तर: सड़क जड़ निद्रा में पड़ी पड़ी अपार धीरज के साथ अपनी धूल में लोटकर शाप की आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही है। 

(च) सड़क किसकी तरह सब कुछ महसूस कर सकती है? 

उत्तर: सड़क बोल नहीं सकती, पर अंधे की तरह सब कुछ महसूस कर सकती है। 

(छ) सड़क की बात शीर्षक लेख के लेखक कौन है ?

उत्तर : सड़क की बात शीर्षक लेख के लेखक है रवींद्र नाथ ठाकुर ।

(झ) सड़क किसकी कोई भी कहानी पूरी नहीं सुन पाती ?

उत्तर : सड़क संसार की कोई भी कहानी पुरी नहीं सुन पाती।

प्रश्न 2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो 

(क) कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म कहाँ हुआ था ? 

उत्तर : कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, 1861 ई. को कोलकाता के जोरासाँको में हुआ था।

(ख) गुरुदेव ने कब मोहनदास करमचंद गाँधी को ‘महात्मा’ के रूप में संबोधित किया था? 

उत्तर: शांतिनिकेतन में जब गांधी जी आए थे, तब गुरुदेव ने उन्हें ‘महात्मा’ के

रूप में संबोधित किया था।

(ग) सड़क के पास किस कार्य के लिए फुरसत नहीं है? 

उत्तर : सड़क के पास इतनी भी फुरसत नहीं कि अपने सिरहाने के पास एक

छोटा-सा नीले रंग का बनफूल भी खिला सके। 

(घ) सड़क ने अपनी निद्रावस्था की तुलना किससे की है? 

उत्तर: सड़क ने अपनी निद्रावस्था की तुलना सुदीर्घ अजगर से की है।

(ङ) सड़क अपनी कड़ी और सूखी सेज पर क्या नहीं डाल सकती ? 

उत्तर: सड़क अपनी कड़ी और मुखी सेज पर एक भी मुलायम हरी घास या हम नहीं डाल सकी।

प्रश्न 3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में) 

(क) रवींद्रनाथ ठाकुर जी प्रतिभा का परिचय किन क्षेत्रों में मिलता है ?

उत्तर कवि गीतकार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार, संगीतकार, कलाकार, समाज सुधारक, शिक्षा संस्कृति प्रेमी और राजनीतिज्ञ रवींद्रनाथ ठाकुर बहुमुखी प्रतिभा के अधिकारी थे उनका काव्य ग्रंथ ‘गीतांजलि’ जिस पर उनको सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उनके द्वारा रचित ‘जन गण मन…’ भारत वर्ष का राष्ट्रीय संगीत है।

(ख) ‘शांतिनिकेतन’ के महत्त्व पर प्रकाश डालो। 

उत्तर: रवींद्रनाथ ठाकुर विश्वास करते थे कि उदार प्रकृति के शांत परिवेश में स्वाधीन शिक्षार्थी को अपने मन के अनुरूप शिक्षा ग्रहण करने की सुविधा देने से मनुष्यत्व का पूर्णतर विकास सहज होगा। इसलिए रवींद्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में वीरभूम जिले के अंतर्गत बोलपुर के शांत निर्जन प्राकृतिक परिवेश में ‘शांतिनिकेतन’ नामक एक शैक्षिक- सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की थी। यह केंद्र गुरुदेव के सपनों का मूर्त रूप रहा और आगे यह विश्व भारती विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

(ग) सड़क शाप मुक्ति की कामना क्यों कर रही है ?

उत्तर: सड़क बहुत दिनों से बेहोशी की नींद सो रही है जड़ निद्रा में पड़ी धीरज के साथ अपनी धूल में लोटकर शाप की आखिरी घड़ियों तक इंतजार कर रही है। वह स्थिर और अविचल है। एक ही करवट में सोते-सोते थक गई है। वह किसी का लक्ष्य नहीं बन पाती। सबका उपाय मात्र होती है, वह छोटे-छोटे बच्चों को अपना स्नेह और प्यार भी नहीं दे पाती। बच्चे अपने निर्मल हृदय के साथ उससे बातें करते हैं, पर वह उन बच्चों को अपना स्नेह, प्यार भी नहीं दे पाती, इसलिए सड़क शापमुक्ति की कामना करती है।

(घ) सुख की घर-गृहस्थी वाले व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क क्या समझ जाती है ? 

उत्तर : सड़क लोगों के कदमों के आहट से उसके आने-जाने का पता लगा लेती है।

अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से आने वालों के हृदय को पढ़ लेती है। जिसके पास सुख को घर-गृहस्थी है, ऐसे व्यक्ति के पैरों की आहट से वह समझ है कि उसमें स्नेह की छाया है. जहाँ-जहाँ उसके पैर पड़ते हैं, कहाँ-वहाँ क्षणभर में म एक-एक लता अंकुरित और पुष्पित हो उठती है। 

(ङ) गृहहीन व्यक्ति के पैरों की आहट सुनने पर सड़क को क्या बोध होता? 

उत्तर: सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती है। उसके ग को समझ जाती है। सड़क गृहहीन व्यक्ति के पैरों की आहट से समझ जाती है कि उसके पास कोई घर नहीं है, न कोई आश्रय है। उसके पदक्षेप में न आशा है, न अर्थ है। उसके चलन में थकावट होती है वह सोचता है मैं चलूं तो क्यों, और तो किसलिए और उसके कदमों से मेरी सुखी हुई धूल मानो और सूख जाती है।

(च) सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण चिह्न को क्यों ज्यादा देर तक नहीं देखसकती ? 

उत्तर : सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण चिह्न को भी ज्यादा देर तक नहीं रख सकती। उसके ऊपर लगातार चरण चिह्न पड़ रहे हैं, पर नए पाँव आकर पुराने चिह्न को पोंछ जाते हैं। जो चला जाता है, वह तो पीछे कुछ छोड़ ही नहीं जाता। कदाचित उसके सिर के बोझ से कुछ मिलता भी है, तो हजारों चरणों के तले लगातार कुचला जाकर कुछ ही देर में वह धूल में मिल जाता है। इस तरह सड़क एक चरण चिह्न को ज्यादा देर तक नहीं देख सकती।

(छ) बच्चों के कोमल पाँवों के स्पर्श से सड़क में कौन से मनोभाव बनते हैं? 

उत्तर: सड़क पर जब छोटे-छोटे बच्चे उसके पास आकर खेलते हैं। अपनी कोमलहाथों से जब थपकियाँ देकर परम स्नेह से उसे मुलाना चाहते हैं। वहीं बच्चों के छोटे-छोटे कोमल पाँव जब मेरे ऊपर से चले जाते हैं, तब सड़क सोचती है वह कुसुम कली की तरह कोमल बन जाए, जिससे उन बच्चों के पाँव में चोट न लगे। 

(ज) किसलिए सड़क को न हँसी है, न रोना ? 

उत्तर : प्रतिदिन नियमित रूप से जो सड़क के ऊपर चलते हैं, ऐसे ही कितने ही पौधों के शब्द नीरव हो गए हैं पर सड़क किस-किस को याद रख सकती है। उसे तो पलभर के लिए भी शोक या संताप करने की फुसरत नहीं मिलती। वह किस-किस के लिए शोक करे। ऐसे कितने ही आते हैं और चले जाते हैं। उसके एक साँस छोड़ने से ही तपी हुई भूल नील आकाश को धुआंधार करके उड़ी चली जाती है। अमीर, गरीब, जन्म और मृत्यु सब कुछ उसके ऊपर एक हो सांस में धूल के स्रोत की तरह उड़ता चला जाता है। इसलिए सड़क को न हँसी है, न रोना।

(झ) राहगीरों के पाँवों के शब्दों को याद रखने के संदर्भ में सड़क ने क्या कहा? 

उत्तर : राहगीरों के पाँवों के शब्दों को सड़क कहाँ तक याद रख सकती है। लाखों लोगों की कितनी हँसी, कितने गीत, कितनी बातें सुनती है, पर थोड़ी-सी बात ही सुन पाती है। ऐसे कितने ही पाँवों के शब्द नीरव हो गए हैं। सड़क किस-किस को याद रख सकती है। सिर्फ उन पाँवों की करुण नूपुर ध्वनि अब भी कभी-कभी याद आती है, पर उसे घड़ी भर भी शोक या संताप करने की फुरसत नहीं मिलती है। सड़क किस-किस के लिए शोक करे? ऐसे कितने ही आते हैं और चले जाते हैं। सड़क अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती।

प्रश्न 4. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में) 

(क) ‘सड़क की बात’ शीर्षक लेख के आधार पर सड़क के किन्हीं तीन दुःख के कारणों को रेखांकित करो। বিভিন্ন

 उत्तर : (i) सड़क जब जड़ निद्रा में पड़ी पड़ी आपर छीरज के साथ अपनी धूल

में लोटकर शाम को आखिरी घड़ियों का इंतजार करती है। (ii) सड़क को दिन-

रात यही संताप सताता रहता है कि उसपर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता।

उस पर कोई खड़ा रहना पसंद नहीं करता। (iii) बिछुड़े हुए सब मिल जाते हैं और

उस पर केवल थकावट का कारण मानते हैं।

(ख) जड़ निद्रा में पड़ी सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके बारे में क्या- क्या समझ जाती है ? 

उत्तर : जड़ निद्रा में पड़ी सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हैं। कौन घर जा रहा है, कौन परदेश जा रहा है, कौन काम से जा रहा है, कौन आराम करने जा रहा है, कौन उत्सव में जा रहा है और कौन श्मशान में जा रहा है। किसके पास सुख की घर-गृहस्थी है, स्नेह की छाया है, और किसके पास घर नहीं, आश्रय नहीं है, उसके पदक्षेप में न आशा है, न अर्थ है। उसके कदमों में मेरी सुखी हुई धूल मानो और सूख जाती है। इस तरह न जाने कितने युगों की कितनी टूटी-फूटी बातें और बिखरे हुए गीत मेरी धूल के साथ धूल बन गए हैं।

(ग) सड़क संसार की कोई भी कहानी क्यों पूरी नहीं सुन पाती ?

उत्तर : सड़क बोल नहीं सकती पर अंधे की तरह सब कुछ महसूस कर सकती है। अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदय को पढ़ लेती

है पर संसार की कोई भी कहानी सड़क पूरी नहीं सुन पाती सैकड़ों-हजारों वर्षों से वह लाखों-करोड़ों लोगों की कितनी हँसी, उनकी खुशियों, कितनी बातें, कितने गीत सुनती आई है. पर थोड़ी-सी हो बात सुन पाती है। क्योंकि बाकी सुनने के लिए जब वह कान लगाती है, तब तक वह आदमी ही नहीं रहता। इस तरह कितने युगों की कितनी टूटी- फूटी बातें और बिखरे हुए गीत उसके धूल के साथ धूल बन जाती है। बस आधी रात तक उसकी पग ध्वनि मेरे कानों में गूँजती रहेगी।

(घ) “मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सबका उपाय मात्र हूँ।” सड़क ने ऐसा क्यों कहा है? 

उत्तर: सड़क किसी का लक्ष्य नहीं होती, सबका उपाय मात्र है। वह किसी का घर नहीं होती, पर सबको घर ले जाती है। उसे दिन-रात यही दुख सताता रहता है। कि उस पर कोई स्थिर और चिंतामुक्त होकर कदम नहीं रखना चाहता। उस पर कोई खड़ा रहना पसंद नहीं करता। जिसका घर बहुत दूर है, वे मुझे ही कोसते हैं और शाप देते रहते हैं। मैं जो उन्हें परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वार तक पहुँचा देती है। इसके लिए कृतज्ञता कहाँ पाती हूँ। मेरे कारण ही बिछड़े हुए सब मिल जाते हैं। और मुझ पर केवल थकावट का भाव दर्शाते हैं। मुझे केवल विच्छेद का कारण मानते हैं।

(ङ) सड़क कब और कैसे घर का आनंद कभी-कभी महसूस करती है? 

उत्तर : सड़क कभी-कभी घर का आनंद भी महसूस करती है, जब छोटे-छोटे

बच्चे हँसते-हँसते मेरे पास आते हैं और शोरगुल मचाते हुए मेरे पास आकर खेलते हैं। अपने घर का आनंद वे मेरे पास ले आते हैं। उनके पिता का आशीर्वाद और माता का स्नेह घर से बाहर निकल कर मेरे पास आकर सड़क पर ही मानो अपना घर बना लेते हैं और अपने छोटे-छोटे कोमल हाथों से उसकी ढेरी पर हौले-हौले से धमकियाँ दे-देकर परम स्नेह से उसे सुलाना चाहते है, तब मुझे घर का आनंद महसूस होता है।

(च) सड़क अपने ऊपर से नियमित रूप से चलने वालों की प्रतीक्षा क्यों करती है? 

उत्तर: सड़क अपने ऊपर से नियमित रूप से चलने वालों की प्रतीक्षा करती है। उन्हें अच्छी तरह पहचानती है, पर वे नहीं जानते कि उनके लिए कितनी प्रतीक्षा करनी पड़ती है करोड़ों लोगों की हंसी, उनके गीत, उनकी बातें वह आधा ही सुन पाती हूँ बाकी सुनने के लिए यह प्रतीक्षा करती है कि जो बात पूरी कह नहीं पाई, उसे कहने जरूर आएगी। वह मन ही मन कल्पना भी करती है कि बहुत दिन हुए ऐसी ही एक प्रतिमा अपने कोमल चरणों का लेकर दोपहर को बहुत दूर से आती, छोटे- छोटे दो नूपुर रूनझुन करके उसके पाँव रो-रोकर बजते रहते। शायद उसके ओठ बोलने के ओठ न थे, शायद उसकी बड़ी-बड़ी आँखें संध्या के आकाश की भांति ग्लान दृष्टि से किसी के मुँह की ओर देखती रहती, ऐसे ही एक प्रतिमा की प्रतीक्षा करती है। 

प्रश्न 5. सम्यक् उत्तर दो ( लगभग 100 शब्दों में) 

(क) सड़क का कौन-सा मनोभाव तुम्हें सर्वाधिक हृदयस्पर्शी लगा और क्यों ? 

उत्तर: सड़क पर जब छोटे-छोटे बच्चे उसके पास आकर खेलते हैं, सड़क पर आकर ही मानो अपना घर बना लेता है। अपनी कोमल छोटे-छोटे हाथों से थपकियाँ दे देकर परम स्नेह से उसे सुलाना चाहते हैं अपनी निर्मल हृदय लेकर बैठे-बैठे वे उसके साथ बातें करते हैं, तब सड़क सोचती है इतना स्नेह, इतना प्यार पाकर भी मेरी यह धूल उसका जवाब नहीं दे पाती। वह समझती है यह उसके लिए शाप है। वही बच्चे जब अपने कोमल पाँव उसके ऊपर से चले जाते हैं, तब अपने को वह बहुत कठिन अनुभव करती है। मालूम होता है। उनके पाँवों में लगती होगी, उस समय उसे कुसुम कली की तरह कोमल होने की सुध होती है ताकि बच्चों के पाँवों में चोट न लगे। सड़क की इन्हीं बातों से उसकी आकांक्षा, मनोभाव सर्वाधिक हृदयस्पर्शी लगा।

(ख) सड़क ने अपने बारे में जो कुछ कहा है, उसे संक्षेप में प्रस्तुत करो ।

उत्तर: सड़क किसी शाप से चिरनिद्रित सुदीर्घ अजगर की भाँति देश-देशांतरों को

घेरती हुई बहुत दिनों से बेहोशी की नींद सो रही है। हमेशा से एक ही करवट सो रही है। इतना भी सुख नहीं कि अपनी इस कड़ी और सूखी सेज पर भी मुलायम हरी घास या दूब डाल सकूँ मैं बोल नहीं सकती पर अंधे की तरह सब कुछ महूसस कर सकती हैं। अपनी इस गहरी जड़निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हूँ। मैं समझ जाती हूँ कौन घर जा रहा है और कौन परदेश जा रहा है। किसके पास सुख की घर-गृहस्थी है, स्नेह की छाया है और किसके पास घर नहीं है, अश्रय नहीं है। उसके पदक्षेप में न आशा है, न अर्थ है। उसके कदमों से ही पता चल जाता है। मैं किसी का लक्ष्य नहीं है, सबका उपाय मात्र हूँ। मैं किसी

का घर नहीं हूँ, पर उन्हें परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वार तक पहुँचा देती हूँ। इसके लिए कृतज्ञता कहाँ पाती हूँ। बिछड़े हुए सब मिल जाते हैं, मुझे केवल विच्छेद का कारण मानते हैं।

(ग) सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की जो बातें उजागर हुई है, उन पर सक्षिप्त प्रकाश डालो। 

उत्तर: कवि गुरु ने अपनी सूक्ष्म और पैनी दृष्टि से सड़क के अंतरतम का निरीक्षण करके उसकी आकांक्षा, स्थिति एवं मनोभावों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि सड़क की बातें जीवंत हो उठती है। यह एक मनोरम आत्मकथात्मक निबंध है। इसमें सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की कई महत्वपूर्ण बातें भी उजागर हुई है। सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती है। मैं किसी का घर नहीं हूँ पर सबको घर ले जाती हूँ। मुझ पर कोई खड़ा रहना पसंद नहीं करता। जिनका घर बहुत दूर है, वे मुझे ही कोसते हैं और शाप देते हैं। मैं जो उन्हें परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वार तक पहुँचा देती हूँ। इसके लिए कृतज्ञता कहाँ पाती है? वे अपने घर आराम करते हैं, घर पर आनंद मनाते हैं, घर में उनका सुख-सम्मिलन होता हैं। बिछड़े हुए सब मिल जाते हैं और मुझ पर केवल थकावट का भाव दर्शाते हैं, केवल अनिच्छाकृत श्रम हुआ समझते हैं। घर के उस आनंद का एक कण भी एक बूँद भी मैं नहीं पाऊँगी, पर मनुष्य केवल मुझे ही विच्छेद का कारण मानते हैं।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

प्रश्न 6. सप्रसंग व्याख्या करो 

(क) “अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हूँ।” 

उत्तर : संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित “सड़क की बात” नामक आत्मकथात्मक निबंध से लिया गया है। 

प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियों में कवि गुरू सड़क की बातें उसकी आकांक्षा स्थिति एवं महोभाव के यहाँ दर्शाया है।

व्याख्या : सड़क बोल नहीं सकती पर अंधे की तरह सब कुछ महसूस कर सकती है। अपनी इस गहरी जड़निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदय को पढ़ लेती हूँ। मैं समझ जाती हूँ कि कौन घर जा रहा है, कौन परदेश जा रहा है और कौन काम से जा रहा है, कौन उत्सव में जा रहा है और कौन श्मशान को जा रहा है, जिसके पास घर गृहस्थी है, स्नेह की छाया है, वह हर कदम पर सुख की तस्वीरें.खींचता है, आशा के बीज बोता है। जिसके पास पर नहीं है, आश्रय नहीं है, उसके पदक्षेप में न आशा है, न अर्थ है। मैं जो उन्हें परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वार तक पहुँचा देती हूँ, इसके लिए कृतकता कहाँ पाती हूँ। मुझे केवल विच्छेद का कारण मानते हैं।

(ख) “मुझे दिन-रात यही संताप सताता रहता है कि मुझ पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता।” 

उत्तर : संदर्भ: प्रस्तुत गद्यावतार कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित ‘सड़क

को बात’ नामक पाठ से लिया गया हैं। 

प्रसंग: सड़क किसी का भी लक्ष्य नहीं है, सबका उपाय मात्र है, फिर भी उसे ही विच्छेद का कारण मानते हैं।

व्याख्या: सड़क सबका उपाय मात्र है, जो चला जाता है, वह तो पीछे कुछ छोड़ ही नहीं जाता। मुझे दिन-रात यही संताप सताता है कि मुझ पर कोई खड़ा रहना पसंद नहीं करता। जिनका घर दूर है वे मुझे ही कोसते हैं और शाप देते हैं। मेरे कारण अपने घर आराम करते हैं और मुझ पर केवल थकावट का भाव दर्शाते हैं। क्या इसी तरह बार-बार दूर ही से घर के झरोखे में पंख पसार कर बाहर आती हुई मधुर हास्य- लहरी मेरे पास आते ही शून्य में विलीन हो जाया करेगी। घर के उस आनंद का एक कण भी एक बूंद भी मैं नहीं पाऊँगी।

(ग) “मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँ और पड़ी रहूँगी।” 

उत्तर : संदर्भ : प्रस्तुत गद्यावतरण कवि गुरु द्वारा रचित ‘सड़क की बात’ नामक पाठ से ली गई है।

प्रसंग : प्रतिदिन नियमित रूप से जो सड़क के ऊपर चलते हैं। ऐसे ही कितने ही पाँवों के शब्द नीरव हो गए हैं।

व्याख्या सड़क अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती। वह किस-किस को याद रख सकती है। उसे तो पलभर के लिए भी शोक या संताप करने की फुरसत नहीं मिलती। ऐसे कितने ही आते हैं और चले जाते हैं। उसके एक साँस छोड़ने से ही तपी जाती है। अमीर और गरीब, जन्म और मृत्यु सब कुछ उसके ऊपर एक ही साँस में धूल के स्रोत की तरह उड़ता चला जाता है। इसलिए सड़क को न हँसी है, न रोना। वह अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँ और पड़ी रहूँगी।

  भाषा एवं व्याकरण ज्ञान

1. निम्नलिखित सामासिक शब्दों का विग्रह करके समास का नाम लिखो :  

दिन-रात, जड़निद्रा, पगध्वनि, चौराहा, प्रतिदिन, आजीवन, अविल, राहखर्च, पथभ्रष्ट, नीलकंठ, महात्मा, रातोरात

 उतर : 

दिन-रात―दिन  और  रात―द्वन्द्व समास । 

जड़निद्रा―जड़ है जो निद्रा―कर्मधारय ।

पगध्वनि―पग की ध्वनि―सम्बंध तत्पुरुष ।

चौराहा―चार राहों का समाहार―द्विगु ।

 प्रतिदिन―दिन-दिन― अब्ययीभाव ।

आजीवन―जीवन पर्यन्त―अव्ययीभाव ।

राहखर्च―राह के लिए खर्च―सम्प्रदान तत्पुरुष ।

पथभ्रष्ट―पथ से भ्रष्ट―अपादान तत्पुरुष ।

नीलकंठ―नीला है कंठ जिसका (शिव)― बहुव्रीहि ।

महात्मा―महान है जो आत्मा―कर्मधारय ।

 रातोरात―रात ही रात―अब्ययीभाव ।

2. निम्नांकित उपसर्गों का प्रयोग करके दो दो शब्द बनाओ:

 परा, अप, अधि, उप, अभि, अति, सु, अव

उत्तर : परा―पराजय, पराधीन ।

 अप― अपमान,  अपशब्द । 

अधि―अधिकार, अधिकांक्ष ।

 उप― उपमन्त्री, उपनाम ।

 अभि―अभिशाप, अभिलाष । 

 अति― अति सुंदर, अति अतभूत ।

 सु― सुहाग,  सुर्य । 

 अव― अवगुण,  अवगत । 

3. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग को अलग करो

 अनुभव, बेहोश, परदेश, खुशबू, दुर्दशा, दुस्साहस, निर्दय―

उत्तर :    अनुभव―अनु

            परदेश―पर

            दुर्दशा―दुः

            निर्दय―नि

            बेहोश―बे

            खुशबू―खुश

            दुस्साहस―दुः

4. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखो:

सड़क, जंगल, आनंद, घर, संसार, माता, आँख, नदी

उत्तर :   सड़क―पथ, राह ।

          जंगल―विपिन, अरण्य ।

          संसार―दुनिया, जगत ।

          आनंद―हर्ष, प्रसन्न । 

          घर―आलय, गृह । 

          माता―माँ, मातृ । 

          आँख―नयन, नेत्र । 

          नदी―प्रवाहिनी, सरिता ।

5. विपरीतार्थक शब्द लिखो:

मृत्यु, अमीर, शाप, छाया, जड़, आशा, हँसी, आरंभ, कृतज्ञ, पास, निर्मल, जवाब, सूक्ष्म, धनी, आकर्षण ।

उत्तर : 

 मृत्यु ― जन्म, 

अमीर―गरीब,

 शाप―वरदान, 

 छाया―काया, 

 जड़―चेतन,

 आशा―निराशा,

 हँसी―क्रन्दन, 

आरंभ―अन्त, 

 कृतज्ञ―कृतघ्न,

 पास―नापास,

 निर्मल―मलिन, 

 जवाब―प्रश्न,

 सूक्ष्म―स्थूल,

 धनी―निधंनी, 

आकर्षण―विकर्षण ।

6. सन्धि विच्छेद करो :

देहावसान, उज्वल, रवीन्द्र, सूर्योदय, सदैव, अत्याधिक, जगन्नाथ, उच्चारण, संसार, मनोरथ, आशीर्वाद, दुस्साहस, नीरस । 

उत्तर: 

 देहावसान = देह + अवसान।

उज्वल = उत् + ज्वल ।

रबीन्द्र = रवि + ईन्द्र ।

सूर्योदय = सूर्य + उदय । 

अत्यधिक = अति + अधिक ।

उच्चारण = उत् + चारण ।

मनोरथ = मनः + रथ ।

दुस्साहस = दुः+ साहस ।

सदैव = सदा + एव ।

 जगन्नाथ = जगत् + नाथ ।

संसार = सम + सार । 

आशीर्वाद = आशीः + वाद । 

नीरस = निः + रस ।

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