SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | भाव पल्लवन करो

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | भाव पल्लवन करो सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | भाव पल्लवन करो लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | भाव पल्लवन करो

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| व्याकरण | भाव पल्लवन करो ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

वृद्धिकरण अथवा विस्तार वृद्धिकरण का अर्थ है– वृद्धि करना या बढ़ाना है। जिसे अंग्रेजी में Amplification कहा जाता है। हिन्दी में इसके अनेक नाम हैं, जैसे- भाव-पल्लवन, विचार- विस्तार आदि। किसी भी कहावत या सृस्टि को समझाने के लिए उसका विस्तार पूर्वक वर्णन करना है भाव पल्लवन या विचार विस्तार होता है। जैसे- कहना से करना भला। यह एक हिन्दी भाषा में प्रचलित कहावत है।

1. जहाँ चाह वहाँ राह

जहाँ चाह होती है वहाँ राह होती है। यदि हम सच्चे मन से कुछ चाहते हैं तो हमें उसकी प्राप्ति का रास्ता भी मिल जाता है। केलव चाहने से कुछ नहीं होता, चाहने में मन की लगन, तल्लीनता, तत्परता और सच्चाई भी होनी चाहिए। सच्चे मन से काम करने से कठिन से कठिन काम भी आसान हो जाते हैं। धैर्य, कर्त्तव्यनिष्ठा और इच्छाशक्ति से हम अपने भाग्य का सूर्य स्वयं उदित कर सकते हैं। जिसमें दृढ़ इच्छाशक्ति है, उसके लिए सफलता का द्वार हमेशा खुला हुआ है। यदि हमारे इरादे मजबूत है और हमारी इच्छाओं में दृढ़ता है तो कोई कारण नहीं कि हमें विफलता विलज्जित करे।

2. जिसकी लाठी उसकी भैंस

सवत्र शक्तिशाली की विजय होता है। आखिर कार मोहन अपने धन के बल पर चुनाव जीत हो गया। अनपढ़ गवार फिर भी अपनी ताकत के बल पर नेता बन गया अब देखना देश की कैसे खोखला करता है। नरेश जी इतने अच्छे व्यक्ति थे। देश सेवा को ही अपना धर्म समझते थे पर क्या हुआ कहावत है जिसकी लाठी उसकी भैंस ।

3. बुद्धि ही श्रेष्ठ बल है

बुद्धि ही श्रेष्ठ बल है का अर्थ-बुद्धि हो मनुष्य के लिए सबसे बड़ी शक्ति है। इस बल की तुलना में शारीरिक बल को महत्ता कम है। बुद्धि से यदि काम नहीं किया जाए और केवल शारीरिक बल का प्रयोग किया जाए तो सफलता नही मिल सकती। युद्ध में अगर सैनिक बुद्धि से काम न लें और केवल शारीरिक बल का प्रयोग करें तो उसका बुद्धिमान शत्रु उसे अवश्य पहाजित कर देया। अत: बुद्धिमान व्यक्ति अपनी बुद्धि के बल पर असम्भव को सम्भव कर सकता है, क्योंकि वे लोग अपनी शारीरिक बल का प्रयोग न कर बुद्धि का प्रयोग करते हैं। जिस प्रकार गाँधी जी ने बुद्धि के बल पर इस बात को सिद्ध कर दिया है। गाँधी जो ने बुद्धि का परिचय दिया और अपने सत्याग्रह के अस्त्र से अंग्रेजो को परास्त कर दिया।

4. अधजल गगरी छलकत जाय

इसका अर्थ है- कम ज्ञानी लोग अपने को बहुत ज्ञानी बतलाने की कोशिश करते हैं। जिस प्रकार आधा भरा घड़ा छलकता है, उसी प्रकार कम ज्ञान वाले व्यक्ति में अपने ज्ञान को दिखलाने की भावना अधिक होती है वे समझते हैं कि उनका ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है और वे ही दुनियाँ के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी व्यक्ति हैं। वे सदा बढ़-चढ़ कर बाते करते रहते हैं तथा अपना ज्ञान दिखलाना शुरू कर देते हैं। इसके विपरीत जो ज्ञानी हैं, वे लोग गम्भीर रहते हैं। ज्ञान के बोझ से वे झुक जाते हैं। ज्ञान की अधिकता उन्हें गम्भीर बना देती है। कम पढ़े-लिखे अपनी बड़ाई के दर्प में किसी से ठीक से बात तक नहीं करते, इससे स्पष्ट होता है अधजल गगरी ज्यादा छलकती है।

5. नाच न जाने आंगन टेढ़ा

जब मनुष्य किसी कार्य को करने में असमर्थ होता है तो वह दोष दूसरों पर थोप देता है। स्वयं नहीं कर पाया तो दूसरों को दोषी ठहराने से क्या फायदा? मनुष्य जन्म श्रेष्ठ जन्म है। ईश्वर सब जीवों से मनुष्य को ही बुद्धि अधिक दी है। अत: अपनी चेष्टा, बुद्धि, धैर्य, लगन से किसी काम को करने की ठान लें तो असंभव भी संभव हो जाता है। पर हम अपनी बुद्धि, आत्मबल का प्रयोग करना ही नहीं चाहते। फलस्वरूप असफलता पाने पर कहते हैं आंगन ही टेढ़ा है तो हम नृत्य कैसे करें। असल में नाच हमको आता ही नहीं पर हम दोष आंगन पर डाल देते हैं। अगर हम लगन, धैर्य से नाच सीखने की कोशिश करें तो हम जरूर सफल होंगे। अपने ऊपर आत्मविश्वास लाना चाहिए और इसी आत्मविश्वास के द्वारा कुछ भी कर सकते हैं।

6. कल करे सो आज कर, आज करे सो अब

मनुष्य जीवन का हर पल मूल्यवान होता है। इन दुर्लभ क्षणों को सही ढंग से अपने जीवन के काम में लगाना चाहिए। क्योंकि जो दिन बीत गया, उसे हम वापस ला नहीं सकते। इसलिए जीवन के अमूल्य समय को सदव्यवहार में लगाना चाहिए। कोई भी काम दूसरे दिन के लिए छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि कब क्या हो जाए, कोई बता नहीं सकता। इसलिए समय का सदुपयोग करना चाहिए। किसी को भी अपने लक्ष्य पर चलने के लिए तो समय का महत्व और भी लाभदायक है। यही समय उनके जीवन-निर्माण का होता है। समय के सद्व्यवहार से ही मानव अपने को उज्जवल और अतीत को गौरवशाली बनाता है। क्योंकि जीवन का हर का सही ढंग से व्यवहार करके वर्तमान और भविस्य को उज्जवल कर सकते हैं।

7. ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’

मनुष्य घर की वस्तु का महत्व नहीं समझते। वास्तविकता यही है कि आसानी से उपलब्ध होने वाली वस्तुओं को वह प्रतिष्ठा नहीं मिलती, जो दुर्लभ वस्तुओं को मिलती है। कहावत है दूर का ढोल सुहावन। दूर के ढोल की आवाज अच्छी लगती है, पर अपने नजदीक बजने वाला ढोल उतना कर्णप्रिय नहीं होता। उसी प्रकार कभी-कभी बड़े-बड़े विद्वान भी अपने घर आस-पड़ोस में वह सम्मान नहीं पाते, जो बाहर जाकर साहित्यिक सभाओं में अध्यक्ष बन कर भाषण देते हुए पाते हैं। किसी व्यक्ति या वस्तु की प्रतिष्ठा का यह आधार सही नहीं है। प्रतिष्ठा का सही आधार व्यक्ति या वस्तु को गुणवत्ता होना चाहिए।

8. “जहाँ चाह वहाँ राह”

जहाँ चाह होती है वहाँ राह होती है। यदि हम सच्चे मन से कुछ चाहते हैं तो हमें उसकी प्राप्ति का रास्ता भी मिल जाता है। सच्चे मन से काम करने से कठिन से कठिन काम भी आसान हो जाते हैं। धैर्य, कर्तव्यनिष्ठा और इच्छाशक्ति से हम अपने भाग्य का सूर्य स्वयं उदित कर सकते हैं। जिसमें दृढ़ इच्छाशक्ति है, उसके लिए सफलता का द्वार हमेशा खुला हुआ है। यदि हमारे इरादे मजबूत हैं और हमारी इच्छाओं में दृढ़ता है तो कोई कारण नहीं कि हमें विफलता लज्जित करे। भाग्य हमारी दृढ इच्छाशक्ति का मोहताज होता है।

9. ” मुख में राम बगल में छुरी”

यह प्रसिद्ध लोकोक्ति है। यह उन लोगों के लिए कही जाती हैं, जो धर्म की आड़ में स्वार्थ की पूर्ति करते हैं। आज के समाज में ऐसे भक्तों की कमी नहीं होती, जो दिखाने के लिए राम नाम जयते हैं, पर उनके भीतर कपट की छुरी होती है। समाजकि अधिकांश लोग धार्मिक अंधविश्वास के शिकार होते हैं, वे ऐसे कपटी भक्तों के आडंबरों से प्रभावित हो जाते हैं। धर्म के नाम पर शोषण करने की कला कपट-मुनियों की विशिष्ट कला होते हैं। ये धर्म की आड़ में समाज की आँखों में धूल झोंकते हुए अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं।

10. कहना से करना भला 

कहना बहुत आसान है पर उस कार्य को कर दिखाना ही पुरुषार्थ है। बहुत से व्यक्ति अपने अहं में कुछ भी कह देते हैं पर उसको वास्तविक रूप नहीं देते। अपने बड़प्पन में वहककर सबके सामने कह देते हैं- मैं ये काम कर दूंगा। पर वास्तव में वे करते ही नहीं, कहने के बाद भूल ही जाते हैं। पर जो सज्जन ज्ञानी होते हैं, वे कहते कम करते ज्यादा हैं। जिस प्रकार सागर की गहराई में इतने सम्पदों का भण्डार है, ऊपर से पता ही नहीं चलता। उसी प्रकार संसार में जो प्रकृत ज्ञानी हैं, वे कभी वर्हिप्रकाश नहीं करते, अपने ज्ञान को दर्शाते नहीं, उनके आचरण से ही उनके ज्ञान का पता चल जाता है। पर दुष्ट व्यक्ति बोलते ज्यादा करते कम हैं।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

11 न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी

एक ही धरती, एक ही आसमान के नीचे रह कर भी इन्सान इन्सानों के ही खून का प्यासा हो जाता है। इसका एकमात्र कारण हम अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। सम्पत्ति भी एक बला है, इस सम्पत्ति के लिए भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है। रमेश और सुरेश की सम्पत्ति के कारण मुँह देखना भी बन्द हो गया। नित्य झगड़े से तंग आकर बड़ा भाई अपना मकान, जायदाद बेचकर दूर गाँव चला गया। वह सोचने लगा- इस सम्पति के लिए इतना खून-खराबा हो रहा है, इसे ही बेच दे। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी ।

12. आप भला तो जग भला 

आप भले तो होंगे जग भला होगा। यह उक्ति यथार्थ है- जो सज्जन हैं, वे दूसरों के हित में ही लगे रहते हैं। अपना सारा जीवन परोपकार, लोकसेवा में ही लगा देते हैं। उनका जीवन निःस्वार्थ होता है। जिस प्रकार एक-एक बुँद से सागर बनता है। उसी प्रकार एक-एक मनुष्य से जग बनता है। अतः इस जग की भलाई में ही सज्जन लोग अपना जीवन उत्सर्ग करते हैं। जो खुद अच्छे होते हैं उनके लिए पूरा जग ही अच्छा है।

13. करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान। 

जीवन में उन्नति करने के लिए अनेक हुणों की आवश्यकता पड़ती है। इनमें अध्यवसाय तथा परिश्रम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लगातार अभ्यास से व्यक्ति कहीं से कीं पहुँच जाता है। अभ्यास और परिश्रम के प्रभाव से मुर्ख भी बुद्धिमान तथा शक्तिहीन भी शक्तिशाली बन जाते है। अर्जुन इतना महान धनुर्धर बना तो केवल परिश्रम एवं अभ्याय के बलपर मानव-जीवन के क्षण सीमित है, जिसने इन क्षणों का सदुपयोग नहीं किया तथा अभ्यास के बल पर अपने लक्ष्य को प्राप्ति नहीं की सफलता उससे कोसो दूर भागती नजर आई। निरन्तर अभ्यास करने से मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक उन्नति होती है।

14. “खोदा पहाड़ निकला चूहा ” 

सुरेन्द्र सोचा था इस बार खेती करके अच्छी फसल उपजाएगा, इतना परिश्रम किया पर क्या हुआ, गाँववाले सुरेन्द्र को मना भी किया था कि यह जमीन फसल के लिए ठीक नहीं है। पर सुरेन्द्र किसी को बात नहीं सुनी वह सोचा था परिश्रम से सब हो सकता है। पर क्या हुआ कहावत है खोदा पहाड़ निकला चूहा।

15. “जैसी करनी वैसी भरनी “

दूसरों का बुरा चाहने वाला अपना ही अनिष्ट ज्यादा करता है। कहावत है- बोयेगा बबुर का पेड़ तो आम कहा से खायेगा। दूसरों को दुःख पहुँचाने वाले व्यक्ति को कभी सुख नहीं मिलता। तुम जैसा करोगे, तुमको वैसा ही फल भोगना पड़ेगा पाप-पुण्य का फल मनुष्य इसी जन्म में ही भोगता है। इतिहास गवाह है- अपने कर्मों का फल यहीं मिलता है। मुगल साम्राज्य के उत्थान ने बहुतों की हत्या करके सिहासन प्राप्त की थी और मुगल साम्राज्य का पतन भी कितना दर्दनाक था। अतः ईश्वर द्वारा दिया गया, यह मनुष्य जीवन अन्छे कर्मों में लगाना चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि ऐसे अच्छे कर्म करे, जिसमे दूसरों को भी शीतलता मिले और स्वयं भी सुख-शान्ति पा सके।

16. “छोटा मुँह करता बड़ी बात’

बात को बढ़ा-चढ़ा कर करने की आदत है मनोज को, करता तो कुछ भी नहीं पर ऐसा भाव दिखाता है जैसे सब कुछ वह जानता है। सभा में इतने बड़े-बड़े पंडित आये हैं। उनके भाषण सुनकर वह व्यंग करने लगा। जब उसे भाषण देने को कहा गया तो मुँह छुपा लिया। इसी को कहते है छोटा मुँह बड़ी बात।

17. अंधो में काना राजा

गुणहीन लोगों में थोड़े गुणवाला व्याक्ति बहुत गुणवाला माना जाता है। महेश अपने दोस्तों से कुछ ज्यादा पढ़ा-लिखा है। जिसके कारण अपने दोस्तों के सामने अपना रोब जमाता है। पर देखा जाए तो महेश का ज्ञान भी सीमित है पर कुछ ज्यादा ही बढ़-चढ़ कर बोलता है सुनने वाला समझता है कि वह बहुत ज्ञानी है, यह तो वही हुआ अंधो में काना राजा।

18. धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का

जिसका कोई निश्चित स्थान अथवा मत न हो वह तो न इधर का रहता है न उधर का। शिवप्रसाद भी कोई आदमी है, न कोई उसका सिद्धान्त न कोई आदर्श उसकी बात पर विश्वास करके कोई काम नहीं करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति खुद भी अपने सिद्धान्त से गिरता है दूसरो को भी ले डूबना है। क्योंकि उसका अपना सिद्धान्त हो ठीक नहीं है उस पर आँख बंद कर विश्वास भी नहीं करना चाहिए।

19. ऊँट के मूँह में जीरा

आवश्यकता से कुछ कम मिलना। मोहन दिनभर परिश्रम करता है। पर दिन रात मेहनत करने के बाद उसे क्या मिलता है। जो कमाता है उससे अपना और परिवार का पेट भी नहीं भरता, खाने को सिर्फ दो रोटी ही मिलता है यह तो उसके लिए ऊँट के मुंह में जीरे के समान हुआ। इतना हट्टा-कट्टा आदमी पर दो रोटी से उसका क्या पेट भरेगा।

20. जिसकी लाठी उसकी भैंस 

सवत्र शक्तिशाली की विजय होता है। आखिर कार मोहन अपने धन के बल पर चुनाव जीत हो गया। अनपढ़ गवार फिर भी अपनी ताकत के बल पर नेता बन गया अब देखना देश की कैसे खोखला करता है। नरेश जी इतने अच्छे व्यक्ति थे। देश सेवा को ही अपना धर्म समझते थे पर क्या हुआ कहावत है जिसकी लाठी उसकी भैंस ।

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