SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-8| पद-त्रय

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-8| पद-त्रय सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-8| पद-त्रय लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-8| पद-त्रय

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-8| पद-त्रय ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

पाठ 8

मीरा बाई (1498-1546)

मीराँ बाई :हिंदी को कृष्ण भक्ति काव्य धारा में मीरों बाई को महाकवि सूरदास जी के बाद ही स्थान प्राप्त है। हालांकि हिंदी कवयित्रियों में आप अग्रणी स्थान के अधिकारी हैं। कवयित्री मीराँ बाई द्वारा विरचित गीत-पद हिंदी के साथ-साथ भारतीय साहित्य की भी अमूल्य निधि है। भक्ति भावना एवं काव्यत्व के सहज संतुलन के कारण आपके गीत- पद अनूठे बन पड़े हैं।

कवयित्री मीरा बाई भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका थी। अपने आराध्य के प्रति एकनिष्ठ प्रेम भक्ति के कारण आपको ‘कृष्ण प्रेम दीवानी’ की आख्या मिली। अपने आराध्य के प्रति सम्पूर्ण एवं उनकी एकनिष्ठ साधना का जो दृष्टांत भक्त कवयित्री मीरा बाई ने प्रस्तुत किया। वह सबके लिए आदरणीय एवं अनुकरणीय है।

1. मैं तो चरण लगी गोपाल…… चरण कमल बलिहारी।

भावार्थ इस पद में श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी और उनको अनन्य आराधिका मीरा बाई ने श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन किया है। मीरा बाई कृष्ण दर्शन की दीवानी थी। अपने प्रियतम कृष्ण भगवान के सिवा और कुछ सोच ही नहीं सकती। श्री कृष्ण को अपना आराध्य ही नहीं पति भी मानती हैं वे कहती हैं मैं तो गोपाल जी के श्रीचरणों की शरण में आ गई हूँ। जब मेरी प्रीति आपसे आरंभ हुई, तब किसी को पता नहीं चला और अब जब वह प्रीति प्रौढ़ हो गई तो सारी दुनिया को पता चल गया है। प्रभु गिरधर मुझ पर कृपा करें, मुझे दर्शन दें। शीघ्र ही मेरी सुध लें। मैं तो प्रभु जी के चरण कमलों में अपने को न्योछावर कर चुकी हूँ, मीरा कहती हैं श्रीकृष्ण की और मेरी जन्म-जन्मान्तर की प्रीति है।

2. म्हारे घर आवो सुंदर श्याम….. राषो जी मेरो पाण। 

भावार्थ– कवयित्री मीरों बाई अपने जीवनाधार सुंदर श्याम जी को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कहती हैं कि हे स्वामी तुम्हारे विरह में मेरे प्राण पक कर पोली पड़ गई है। तुम्हारे आए बिना मैं सुध-बुध खो बैठी हूँ। मेरा ध्यान तो तुम्हीं पर है मुझे किसी दूसरे की आशा नहीं अतः तुम जल्दी आकर मुझसे मिलो और मेरे मन की रक्षा करो।

3. राम नाम रस पीजै मनुओं ताहि के रंग में भीजै । 

भावार्थ : कवयित्री मीरों बाई मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आश्वान करते हुए कहती है कि सभी मनुष्य कुसंग छोड़े और सत्संग में बैठकर सदा कृष्ण का कीर्तन सुनें। काम, क्रोध, भेद, लोभ जैसा छः रिपुओं को चित्त से निकाल देना चाहिए और प्रभु कृष्ण प्रेम-रंग-रस से सरोवर हो उठिए ।

अभ्यासमाला

प्रश्न 1. ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में उत्तर दो : 

(क) हिंदी की कृष्ण भक्ति काव्य धारा में कवयित्री मीराँ बाई का स्थान सर्वोपरि है।

उत्तर : नहीं।

(ख) कवयित्री मीरों बाई भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका थीं।

उत्तर : हाँ।

(ग) राजपूतों की तत्कालीन परंपरा का विरोध करते हुए कांतिकारिणी मीरा सती नहीं हुई।

उत्तर : हाँ।

(घ) मीरा बाई अपने  को श्रीकृष्ण जी के चरण-कमलों में पूरी तरह समर्पित नहीं कर पाई थीं। 

उत्तर : नहीं।

(ङ) मीरां बाई ने सुंदर श्याम जी को अपने घर आने को आमंत्रण दिया है।

उत्तर :हाँ।

प्रश्न 2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो 

(क) कवयित्री मीरा बाई का जन्म कहाँ हुआ था। 

उत्तर : मौरों बाई का जन्म सन् 1498 के आस-पास प्राचीन राजपूताने के अंतर्गत

‘मेड़ता’ प्रांत के ‘कुड़की’ नामक स्थान में हुआ था।

(ख) भक्त कवयित्री मीरा बाई को कौन-सी आख्या मिली है? 

उत्तर : मीरा बाई को ‘कृष्ण प्रेम दीवानी’ की आख्या मिली।

(ग) मीराँ बाई के कृष्ण भक्तिपरक फुटकर पद किस नाम से प्रसिद्ध है? 

उत्तर मीरों बाई के कृष्ण भक्ति परक फुटकर पद मीरों बाई की पदावली नाम से प्रसिद्ध है।

(घ) मीरा बाई के पिता कौन थे?  

उत्तर : मीराँ बाई के पिता राव रत्न सिंह थे। 

(ङ) कवयित्री मीरों बाई ने मनुष्यों से किस नाम का रस पीने का आहवान किया है? 

उत्तर : मीराँ बाई ने प्रभु कृष्ण के प्रेम रंग-रस पीने का आह्वान किया है।

प्रश्न 3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में) 

(क) मनुष्य को मीरांबाई ने क्या सलाह दी थी ? 

उत्तर : मीराँबाई मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए कहती हैं कि सभी मनुष्य कुसंग छोड़े और सत्संग में बैठकर सदा कृष्ण का कीर्तन सुनें। 

(ख) मीरों भजनों की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।

उत्तर मीरा बाई के काव्य का मुख्य स्वर कृष्ण भक्ति है। वे श्रीकृष्ण की उपासिका थीं और अपने जीवन के संपूर्ण उतार-चढ़ाव में भी वे अपने ‘गिरिधर गोपाल’ का गुणगान करती रहीं। उनकी भक्ति साधना ही उनकी काव्य साधना है। उनका प्रत्येक पद सच्चे प्रेम की पीर से परिपूर्ण है भाव-विभोर होकर गाए गए तथा प्रेम एवं भक्ति से ओतप्रोत उनके गीत आज भी तन्मय होकर गाए जाते हैं। कृष्ण-भक्तिपरक लगभग दो सौ फुटकर पद ही विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये फुटकर पद ‘मीरा बाई की पदावली’ नाम से प्रसिद्ध है। यही उनकी प्रसिद्धि का आधार तथा एक महत्वपूर्ण कृति है। 

(ग) मीरा बाई का बचपन किस प्रकार बीता था?

उत्तर : बचपन में ही माता के निधन होने और पिता राव रत्न सिंह के भी युद्धों में व्यस्त रहने के कारण बालिका मीरा बाई का लालन-पालन उनके दादा राव दूदाजी की देखरेख में हुआ। परम कृष्ण भक्त दादाजी के साथ रहते-रहते बालिका मीरा बाई के कोमल हृदय में कृष्ण भक्ति का बीज अंकुरित होकर बढ़ने लगा। आगे आपने कृष्ण को ही अपना आराध्य प्रभु एवं पति मान लिया। 

(घ) मीराँ बाई का देहावसान किस प्रकार हुआ था ? 

उत्तर मीरों बाई का प्रभु की आराधना और साधुओं की संगति में ही समय बीतता था। अब वे अपने प्रभु गिरिधर नागर की खोज में निकली पड़ी। साधु-संतों के साथ घूमते-घूमते और अपने प्रभु को रिझाने के लिए नाचते-नाचते मीराँबाई अंत में द्वारकाधाम पहुँची। प्रसिद्ध है कि वहाँ श्री रणछोड़ जी के मंदिर में अपने प्रभु गिरिधर गोपाल का भजन-कीर्तन करते-करते सन् 1546 के आसपास वे भगवान की मूर्ति में सदा के लिए विलीन हो गईं।

(ङ) कवयित्री मीराँ बाई की काव्य भाषा पर प्रकाश डालो। 

उत्तर मीराँ बाई ने ब्रजभाषा को अपनाकर अपने गीतों की रचना की। वैसे तो उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी की उपभाषा राजस्थानी में काव्य रचना की है परंतु उसमें ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी, गुजराती आदि के भी शब्द मिल जाते हैं। कृष्ण प्रेम माधुरी, सहज अभिव्यक्ति और सांगीतिक लय के मिलन से कवयित्री मीरों बाई के पद त्रिवेणी संगम के समान पावन एवं महत्त्वपूर्ण वन पड़े हैं।

प्रश्न 4. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में) 

(क) प्रभु कृष्ण के चरण-कमलों पर अपने को न्योछावर करने वाली मीराँ बाई ने अपने आराध्य से क्या-क्या निवेदन किया है? 

उत्तर : मीरा बाई भगवान कृष्ण के सगुण रूप की उपासिका थीं। मीरों कृष्ण को अपना आराध्य ही नहीं, पति भी मानती है। मीराँ कहती है वह कृष्ण प्रेम की दीवानी है। श्री कृष्ण की और मेरी जन्म-जन्मांतर की प्रीति है। उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकती। मीराँ कहती है मैं तो श्रीकृष्ण के चरणों की शरण में आ गई हूँ। मोगे कहती कब उनका मन गिरिधर गोपाल में लगा, कब उनकी दीवानी हुई कोई न पा अब तो प्रौढ़ावस्था में सबको पता चला। अब तो संसार को यह बात मालूम हो गई है। अतः गिरिधर मुझ पर कृपा करें, मुझे दर्शन दे, शीघ्र ही मेरी सुध लें। आपके लिए मैं तो अपने कुल को त्यागा, लोक-लाज को त्यागा, आपके बिना यह संसार निस्सार और व्यर्थ है। 

(ख) सुंदर श्याम को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कवयित्री ने उनसे क्या-क्या कहा है? 

उत्तर : मोरी बाई श्रीकृष्ण के प्रेम में आत्मविभोर होकर कहती है कि मैं तो साँवले श्रीकृष्ण के रंग में पूरी तरह से रंग गई हूँ। अर्थात मैं भगवान कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से निमग्न हो गई हूँ। मीरों अपने जीवनधार सुंदर श्याम जी को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कहती है कि हे स्वामी! तुम्हारे विरह में मैं पके प्राण की तरह पीली पड़ गई हूँ। तुम्हारे आए बिना मैं सुध-बुध खो बैठी हूँ। मेरा ध्यान तो तुम्हीं पर हैं। मुझे किसी दूसरे की आशा नहीं है। अत: तुम जल्दी आकर मुझसे मिलो और मेरे मान की रक्षा करो। इस पद में श्रीकृष्ण के प्रति मीरों के अनन्य प्रेम निवेदन है।

(ग) मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए मीराँ बाई ने उन्हें कौन-सा उपदेश दिया है? 

उत्तर: इस पद में श्रीकृष्ण के प्रेम की दीवानी और उनकी अनन्य आराधिका मोरों बाई ने भगवान के नाम की महिमा का वर्णन किया है। मीरों बाई का श्रीकृष्ण के प्रति निश्छल प्रेम है। मीराँ बाई मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए कहती है कि सभी मनुष्य कुसंग छोड़े और सत्संग में बैठकर सदा श्रीकृष्ण का कीर्तन सुने, वे काम-क्रोधादि छह रिपुओं को चित्त से निकाल दें और प्रभु कृष्ण प्रेम रंग-रस से सरोबर हो उठे।

प्रश्न 5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में)  

(क) मीरों बाई के जीवन वृत पर प्रकाश डालो ।

उत्तर : कृष्ण-प्रेम भक्ति की सजीव प्रतिमा मीरा बाई के जीवन वृत्त को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कहा जाता है कि उनका जन्म सन् 1498 के आस- पास प्राचीन राजपूताने के अंतर्गत ‘मेड़ता’ प्रांत के ‘कुड़की’ नामक स्थान में राठौड़ वंश की मेड़तिया शाखा में हुआ था। बचपन में ही माता के निधन होने और पिता- राव रत्न सिंह के भी युद्धों में व्यस्त रहने के कारण बालिका मीराँबाई का लालन- पालन उनके दादा राव दूदाजी की देखरेख में हुआ। परम कृष्ण भक्त दादाजी के साथ रहते-रहते बालिका मीरा के कोमल हृदय में कृष्ण भक्ति का बीज अंकुरित होकर बढ़ने लगा। कृष्णजी को ही अपना आराध्य प्रभु एवं पति मान लिया। सन् 1516 में मेवाड़ के महाराजा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर भोजराज के साथ मीरा बाई का विवाह हुआ, परंतु दुर्भाग्यवश विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराज का स्वर्गवास हो गया। अब उनका सारा समय श्रीकृष्ण भक्ति ही बीतने लगा।

(ख) पठित पदों के आधार पर मीरों बाई की भक्ति भावना का निरूपण करो। 

उत्तर : मीराँबाई के इस पद में उनके हृदय का भक्ति भाव प्रकट हुआ है। मीराँ कृष्ण की भक्ति में डूबी उन्हें ही अपने पति मानती हैं। उन्होंने कृष्ण भक्ति में सबको त्याग दिया। उनके हृदय में तो कृष्ण की मोहक मूर्ति विराजमान है। मीरों कहती है मैं तो गोपाल जी के श्री चरणों की शरण में आ गई हूँ, प्रभु गिरिधर मुझ पर कृपा करें। मुझे दर्शन दें। मीरा बाई अपने जीवनाधार सुंदर श्याम जी को अपने घर आने का आमंत्रण करती है। उनके विरह में पके प्राण की तरह पीली पड़ गई है। कृष्ण के बिना अपना सुध-बुध खो बैठी है। कृष्ण के बिना किसी दूसरे की आशा नहीं करती। मनुष्य मात्र को भी राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए कहती है कि सभी मनुष्य कुसंग छोड़ें और सत्संग में बैठकर कृष्ण का कीर्तन सुनें। वे काम- क्रोधादि छह रिपुओं को चित्त से निकाल दें और प्रभु कृष्ण प्रेम रंग-रस से सरोवर हो उठे। 

(ग) कवयित्री मीराँबाई का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो ।

उत्तर : मीराँ बाई के काव्य का मुख्य स्वर कृष्ण भक्ति है, वे कृष्ण की उपासिका थीं और अपने जीवन के संपूर्ण उतार-चढ़ावों में भी वे अपने गिरिधर गोपाल का गुणगान करती रहीं। उनकी भक्ति साधना ही उनकी काव्य साधना हैं। उनका प्रत्येक पद सच्चे प्रेम की पीर से परिपूर्ण है। भाव-विभोर होकर गाए गए तथा प्रेम एवं भक्ति से ओतप्रोत उनके गीत, आज भी तन्मय होकर गाए जाते है। कृष्ण भक्तिपरक लगभग दो सौ फुटकर पद ही विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये फुटकर पद ‘मीराँ बाई की पदावली’नाम मे प्रसिद्ध है। ये पद कवयित्री मीरा बाई के कृष्ण भक्तिमय हृदय के स्वतः उद्गार है। उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी की उपभाषा राजस्थानी में काव्य रचना की है, परंतु उसमें बज, खड़ी बोली, पंजाबी, गुजराती आदि के भी शब्द मिल जाते हैं। कृष्ण प्रेम-माधुरी, सहज अभिव्यक्ति और सांगीतिक लय के मिलने से कलवित्री मीरा बाई के पद त्रिवेणी संगम के समान पावन एवं महत्वपूर्ण बने पड़े हैं।

प्रश्न 6. सप्रसंग व्याख्या करो 

(क) “मैं तो चरण लगी……. चरण कमल बलिहारी । ‘

उत्तर : संदर्भ : प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त मीरा बाई द्वारा रचित ‘पद अय’ से उद्धृत है। 

प्रसंग : इस पद में श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी और उनकी अनन्य आराधिका मीरा बाई ने भगवान के नाम की महिमा का वर्णन किया है। 

व्याख्या : इस पद में श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी और उनकी अनन्य आराधिका मोरी बाई ने श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन किया है। मीरों बाई कृष्ण दर्शन की दीवानी थी। अपने प्रियतम कृष्ण भगवान के सिवा और कुछ सोच ही नहीं सकती। श्रीकृष्ण को अपना आराध्य ही नहीं पति भी मानती है। वे कहती हैं, मैं तो गोपाल जी के श्री चरणों की शरण में आ गई हूँ। जब मेरी प्रीति आपसे आरम्भ हुई तब तो किसी को भी पता नहीं चला और अब जब वह प्रीति प्रौढ़ हो गई, तब संसार का इस बात का पता चल गया है। प्रभु गिरिधर मुझ पर कृषा करें, मुझे दर्शन दें, शीघ्र ही मेरी सुध लें, मैं तो प्रभु जी के चरण कमलों में अपने को न्योछावर कर चुकी हूँ।

(ख) “म्हारे घर आवौ….राषो जी मेरे माण।” 

उत्तर : संदर्भ: प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त मीराँ बाई द्वारा रचित ‘पद- त्रय’ से उद्धृत है।

प्रसंग : इस पद में मीरों बाई कहती हैं मैं तो एकमात्र श्रीकृष्ण को प्राप्त करना चाहती हूँ किसी और को नहीं

व्याख्या कवयित्री मीरा बाई अपने जीवनाधार सुंदर श्याम को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कहती है कि हे स्वामी! तुम्हारे विरह में मेरे प्राण पक कर पीली पड़ गई है। तुम्हारे आए बिना मैं सुध-बुध खो बैठी हूँ। मेरा ध्यान तो तुम्हीं पर है। मुझे किसी दूसरे की आशा नहीं है। अत: तुम जल्दी आकार मुझसे मिलो और मेरे मान की रक्षा करो। मीराँ कहती है श्रीकृष्ण की और मेरी जन्म-जन्मांतर की प्रीति है। उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकती।

(ग) “राम नाम रस पीजै ….ताहि के रंग में भीजै ।।”

उत्तर: संदर्भ प्रस्तुत पद श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त मीरों बाई द्वारा रचित ‘एंट 8 त्रय’ से उद्धत है। 

प्रसंग : इस पद में मीरों बाई की भगवान के प्रति आत्मसमर्पण की भावना क चित्रण हुआ है।

व्याख्या: कवयित्री मीराँ बाई मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का

आहवान करते हुए कहती है कि सभी मनुष्य कुसंग छोड़े और सत्संग में बैठकर सदाश्रीकृष्ण का कीर्तन सुनें। काम, क्रोधादि छह रिपुओं को चित्त से निकाल दें और प्रभु कृष्ण प्रेम-रंग-रस में सरोवर हो उठें।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

                भाषा एवं व्याकरण ज्ञान 

1. निम्नलिखित शब्दों का तत्सम रूप लिखो 

किरपा, दरसन, आसा, चरचा, श्याम, धरम, किशन, हरख ।) 

उत्तर : किरपा―कृपा,      

दरसन―दर्शन, 

 आसा―आशा,    

चरचा―चर्चा,    

श्याम―शाम 

धरम―धर्म,      

किशन―कृष्ण,     

हरख―हर्ख । 

2. वाक्यों में प्रयोग करके निम्नलिखित शब्दजोड़ों के अर्थ का अंतर स्पष्ट करो : 

संसार―संचार,    

चरण―शरण,     

दिन―दीन, 

कुल―कूल,    

कली―कलि,     

प्रसाद―प्रासाद, 

अभिराम―अविराम,      

पवन―पावन ।

संसार (दुनिया) ― संसार में अनेक प्रकार के जीव है । 

संचार (फैलना) ― ज्ञानो का संचार करना जरूरी बात है। 

चरण (पद, पैर)― मीराबाई श्रीकृष्ण के चरण में लगी हुई थी । 

शरण (आश्रय, रक्षा) ― विपत्ति में लोग दूसरों की शरण लेते है ।

दिन (दिवस, रोज) ―15 आगष्ट के दिन भारतवर्ष स्वाधीन हुआ था ।

दीन (गरीब) ― दीन-दुखीयों को मदद करना चाहिए । 

कुल (जाति, वंश) ― कुल की मर्यादा रक्षा करना मनुष्य मात्र का कर्तब्य होना चाहिए । 

कूल (तट, किनारे) ― नदी के कूल में ही अनेक कल-कारखाना पनपे है ।

कली (फूल के पौधे) ― उपवन में अनेक कली खिलने लगे है ।

 कलि (एक युग का ‘नाम) ― सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि ये यार युगों का नाम है । 

प्रसाद (भोग, कृपा) भगवान का प्रसाद सही चित्त में ग्रहन करना पुण्य की बात है ।

प्रासाद (राजमहल, भवन) मीराबाई राजप्रासाद को छोड़कर द्वारकापूर पहुचती थी ।

अभिराम (सुंदर) ― असम की वासंतिक छोटा नयन अभिराम है । 

अविराम (लगातार) ― सुवह से शाम तक वारिष अविराम पड़ रही है ।

पवन (हवा) ― शीतल पवन से शरीर कँपा हुआ है । 

पावन (पवित्र) ― श्रीकृष्ण का चरण-कमल अत्यन्त पावन है ।

3.  निम्नलिखित शब्दों के लिंग परिवर्तन करो :

कवि, अधिकारिनणी, बालिका, दादा, पति, भगवान, भक्तिन । 

उत्तर : कवि ― कवयित्री,     

बालिका ―बालक,      

दादा ― दादी,    

पति ― पत्नी,    

भगवान ― भगवत, 

भक्तिन ― भक्ति ।

4. विलोमार्थक शब्द लिखो : 

पूर्ण, सजीव, प्राचीन, कोमल, अपना, विरोध, मिथ्या, कुसंग, सुंदर, अपमान, गुप्त, आनंद ।

उत्तर : पूर्ण ― अपूर्ण,   

सजीव ― निर्जीव

प्राचीन ― नवीन

कोमल ― कठिन

अपना ― पराया

विरोध ― अविरोध

मिथ्या ― सत्य

कुसंग ―सतसंग

सुंदर ― असुंदर

अपमान ― मान

गुप्त ― प्रकट

आनंद ― निरानंद

5. निम्नलिखित शब्दों के वचन  परिवर्तन करो: 

कविता, निधि, कवि, पौधा, कलम, औरत, साखी, बहू ।

उत्तर :  कविता ― कविताएँ 

निधि ― निधिया

कवि ― कविओं

पौधा ― पौधे

कलम ― कलमें

औरत ― औरतें

सखी ― सखियाँ

बहु ― बहुएँ

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