SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-7| साखी

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-7| साखी सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-7| साखी लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-7| साखी

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-7| साखी ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

पाठ 7

कबीरदास (1398-1518 )

1.तेरा साईं तुज्झ में, ज्यों पुहुपन में बास कस्तूरी का मिरग ज्यों, फिर-फिर ढूँढै घास ।।

भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं मृग की नाभि में कस्तूरी रहती है, लेकिन मृग उसकी सुगंध को पाने के लिए जंगल में इधर-उधर भटकता रहता है। वास्तव में यह उसके अज्ञानता के कारण होता है क्योंकि कस्तूरी और उसकी सुगंध तो उसके शरीर में विद्यमान रहती है, किंतु ज्ञान न होने के कारण वह उसे खोज नहीं पाता। ठीक इसी प्रकार ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में विद्यमान रहता है, किंतु अज्ञानी जीवन उसे पहचान नहीं पाता और संसार में इधर-उधर भटकता रहता है। जिस प्रकार फूलों में ही उसकी सुगंध रहती है, उसी प्रकार आत्मा के रूप में व्यक्ति के भीतर परमात्मा की स्थिति है। यदि जीव के सामने से अज्ञान का यह पर्दा हट जाए तो ईश्वर को कहीं ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी।

2. सत गुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार ।लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार ।

भावार्थ : कबीरदास जी कहते हैं कि सतगुरु की महिमा अनंत है। गुरु की कृपा से ही हम अज्ञानता को दूर कर अपने हृदय में ज्ञानरूपी दीपक प्रज्वलित कर पाए

हैं। उनके उपदेश से हमारे हृदय में व्यापक भक्ति का जन्म हुआ गुरु ईश्वर का ज्ञान कराता है। गुरु की कृपा अनेक हैं। उन्होंने ही ईश्वर का मार्ग दर्शन कराया। कबीरदास जी कहते हैं गुरु एवं ईश्वर दोनों एक है। केवल मनुष्य का मैं की भावना पर आधारित अहंकर ही उसे उनसे अलग किए रहता है। गुरु के द्वारा ही इस अहंकार को मिटा पाते हैं। मनुष्य उन पतंगों के समान है, जो माया के आकर्षण में डूब कर अपना सर्वनाश कर लेता है। इस विनाश से गुरु ही ज्ञान का प्रकाश देकर बचाता है। अतः गुरु की कृपा होने पर ही मनुष्य मायारूपी आग से बच सकता है। 

3.गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गड़ि-गढ़ि कादै अन्तर हाथ सहार दे, बाहर बाह्रै चोट ।।

भावार्थ: कबीरदास जी ने गुरु की महिमा को बताया है किस प्रकार गुरु अपने शिष्य को अज्ञानता के अंधेरे से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश में लाते हैं। ईश्वर का दर्शन तो गुरु ही कराते हैं। गुरु ही अपने दिव्य ज्ञान से शिष्य को पाप-पुण्य का फर्क समझाते हैं। उन्हें जीवन का अर्थ समझाते हैं। कबीरदास ने गुरु को कुम्हार बताया है और शिष्य को मिट्टी का घड़ा। कुम्हार जिस प्रकार साधारण मिट्टी को पीस पीस कर मिट्टी के अंदर से कंकड़-पत्थर छानकर निकाल फेंकता है फिर अपने निपुण हाथों से परम यत्न से मिट्टी का सुंदर घड़ा बनाता है, इससे मिट्टी के घड़े को चोट भी सहनी पड़ती है पर मिट्टी का घड़ा जब बन जाता है, तो वह परिपूर्ण हो जाता है। उसमें चिकनाहट आ जाती है क्योंकि उस घड़े में कुम्हार का स्नेह स्पर्श था। ठीक उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को परम स्नेह से ज्ञान का पाठ पढ़ाते हैं।

4. पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते संसार भर के लोग मर मिटे, लेकिन पंडित ज्ञानी नहीं हुआ कवि का कहना है कि यदि प्रेम का ढाई अक्षर भी कोई पढ़ ले तो वहीं सच्चा पडित कहलाता है। तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति मन को वश में करके दृढ़ चित्त से परमब्रह्म की आराधना करता है वही पंडित कहलाता है। उनका कहना है यह जीवन क्षणभंगुर है। अतः इस पलभर का जीवन सत्कर्मों से ईश्वर की आराधना में बीताना चाहिए। ईश्वर ज्ञान की प्राप्ति हेतु मन को नियंत्रित करना आवश्यक है।

5.माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।।

भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं- माला घुमाते-घुमाते युग बीत गया, मनों का गठबंधन नहीं हुआ। अर्थात भक्त और भगवान का मिलन नहीं हुआ। जब मनों का मिलन होगा अर्थात अंतरात्मा के साथ ईश्वर के मिलन पर मनों का फेर सार्थक होगा। यहाँ भी निर्गुण कवि बाहरी आचार पर ध्यान न देकर केवल मन से ईश्वर की आराधना करने के लिए कहा है। यदि माला घुमाने से मन उसमें ही आबद्ध रहे तो बेकार है मन को ईश्वर मुखी करनी चाहिए। भाव यह है- पाखंडी लोग दिखावे के लिए माला जपते हैं, पर उनका मन कहीं और रहता है। अंतरात्मा के साथ ईश्वर का मिलन तभी होगा, जब प्रभु भक्ति में ही अपने मन को स्थिर करेंगे।

6. जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान । मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।। 

भावार्थ : कबीरदास जी कहते हैं, जात-पात तो बाहरी आवरण है। सज्जन पुरुष की इज्जत ज्ञान के कारण होनी चाहिए न कि जाति के कारण। अर्थात् साधु की जाति नहीं पूछनी चाहिए। उसका ज्ञान कितना है यही जानना चाहिए। जिस प्रकार कीमत तलवार की लगाई जाती है न कि म्यान की। अर्थात् जाति म्यान के समान ऊपरी वस्तु है, जिसका कोई मूल्य नहीं। प्रधानता तो तलवार के समान ज्ञान की ही है। साधु संतों द्वारा प्रदत्त ज्ञान से सांसारिक माया से मुक्ति मिलती है। उनके ज्ञान से ही हमारे मन की अज्ञानता दूर हो सकती है।

7. बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय।। 

भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं, जब मैं बुरा आदमी ढूँढने निकला तो एक भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला जब मैं अपने दिल में खोजा तो पाया कि मुझ जैसा बुरा और कोई नहीं अर्थात दूसरों की बुराइयों को देखने से पहले अपने अंदर की बुराई अर्थात अहंकार को दूर करना चाहिए। अपनी त्रुटियों को दूर करना चाहिए। जब तक मन में अहंकार है, ईश्वर को पा नहीं सकते। अतः दूसरों की बुराई खोजने से पहले अपने अंदर का अहंकार दूर करना चाहिए। तभी संसार रूपी भंवर से मुक्ति मिलेगी।

8. जिन ढूंढ़ा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ । जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ।।

भावार्थ: मोतियों के इच्छुक को समुद्र के गहरे पानी में प्रवेश करना पड़ता है, जो समुद्र की गहराई में उतरने से डरता है, उसे मोतियों की प्राप्ति नहीं हो सकती। वह किनारे पर बैठा रहता है अर्थात जो पागल डूबने के डर से किनारे पर ही बैठा रहा उसे ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी। अर्थात कड़ी मेहनत करने से ही मनोवांछित फल मिलता है। पुरुषार्थी घोर विपत्तियों में ही विचलित नहीं होते। इस संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं सबने अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए कठोर परिश्रम किया है। तपस्या, आत्मत्याग करके अपनी आत्मा से परमात्मा का मिलन कराया। खोजन वाले को ईश्वर भी मिल जाता है। वास्तव में खोजने के पीछे हममें दृढ़ इच्छा शक्ति तथा कर्तव्य परायणता होना चाहिए।

9. जा घट प्रेम न संचरै, सा घट जान मसान। जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान ।।

भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं, जिस हृदय में प्रभु न हो वह हृदय श्मशान के समान होता है वहाँ भूत-प्रेतों का वास रहता है जिस प्रकार लोहार जब धौकनी चलाता है, तो उसकी खाल बिना प्राण के ही साँस लेता है। भाव यह है जिस घरों में अतिथि सज्जन या साधु पुरुष का सम्मान नहीं होता और जिन घरों के निवासी ईश्वर का नाम स्मरण नहीं करते वह घर तो वास्तव में श्मशान के समान है। ऐसे घरों में तो भूतों का ही वास रहता है। अभिप्राय यह है कि सच्चा गृहस्थ एक ओर अतिथियों का पूजन करता है, तो दूसरी ओर ईश्वर की आराधना में भी अपना मन लगाता है।

10. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।पल में परलय होएगा, बहुरि करेगो कब ।

भावार्थ : कबीरदास जी कहते हैं समय अमूल्य धन है। समय रहते सब कुछ करना चाहिए, जो एक बार चला जाता है वह वापस नहीं आता। इसलिए समय रहते समय का उपयोग करना चाहिए। इसलिए कवि कहते हैं कि कल जो काम करना है, उसे आज ही करो और जो आज करना है, उसे अभी करो। क्या पता पल में ही प्रलय हो सकता है। भाव यह है कि जो जन्म ईश्वर की देन हैं, उसे सांसारिक मोह माया में जकड़कर ईश्वर से विमुख नहीं होना चाहिए। इस संसार की स्थिति क्षणिक है और इस क्षणिक समय में ही राम नाम की महत्ता समझो। अर्थात् हमें जो शुभ अवसर प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करना चाहिए। अन्यथा यश के स्थान पर अपयश ही मिलेगा।

अभ्यासमाला

प्रश्न 1. सही विकल्प का चयन करो :

(क) महात्मा कबीरदास का जन्म हुआ था।

(अ) सन् 1398 में 

(आ) सन् 1380 में

(इ) सन् 1370 में

(ई) सन् 1390 में

उत्तर: सन् 1398 में ।

(ख) संत कबीरदास के गुरु कौन थे?

(अ) गोरखनाथ 

(इ) रामानुजाचार्य

(आ) स्वामी रामानंद

(ई) ज्ञानदेव

उत्तर: स्वामी रामानंद ।

(ग) कस्तूरी मृग वन-वन में क्या खोजता फिरता है? 

(अ) कोमल घास

(आ) शीतल जल-

(इ) कस्तूरी नामक सुगंध पदार्थ 

(ई) निर्मल जल

उत्तर : कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ । 

(घ) कबीरदास के अनुसार वह व्यक्ति पंडित है-

(अ) जो शास्त्रों का अध्ययन करता है।

(आ) जो बड़े-बड़े ग्रंथ लिखता है।

(इ) जो किताबें खरीदकर पुस्तकालय में रखता है।

(ई) जो प्रेम का ढाई आखर पढ़ता है।

उत्तर जो प्रेम का ढाई आखर पढ़ता है। 

(ङ) कवि के अनुसार हमें कल का काम कब करना चाहिए- 

(अ) आज 

(आ) कल 

(इ) परसों 

(ई) नरसों

उत्तर :आज ।

(च) कबीरदास के अनुसार साधु की पहचान क्या है?

उत्तर: ज्ञान। 

(छ) ‘सधुक्कड़ी’ भाषा में कौन कविता लिखते थे?

उत्तर सधुक्कड़ी भाषा में कबीरदास जी कविता लिखते थे।

(ज) सतगुरु की क्या महिमा है ?

उत्तर: सतगुरु की महिमा अनंत है।

प्रश्न 2. एक शब्द में उत्तर दो 

(क) श्रीमंत शंकर देव ने अपने किस ग्रंथ में कबीरदास जी का उल्लेख किया है?

 उत्तर : असम भूमि के श्रीमंत शंकरदेव ने अपने ग्रंथ ‘कीर्तन घोषा में कबीरदास जी का नाम उल्लेख किया है।

(ख) महात्मा कबीरदास का देहावसान कब हुआ था? 

उत्तर: सन् 1518 में मगहर स्थान में इनका देहावसान हुआ था। 

(ग) कवि के अनुसार प्रेमविहीन शरीर कैसा होता है? 

उत्तर: कवि के अनुसार प्रेमविहीन शरीर लोहार की खाल के समान हैं। बिना प्राण के ही साँस लेता है।

(घ) कबीरदास जी ने गुरु को क्या कहा है? 

उत्तर कबीरदास जी ने गुरु को कुम्हार कहा है। 

(ङ) महात्मा कबीरदास की रचनाएं किस नाम से प्रसिद्ध हुई ? 

उत्तर : महात्मा कबीरदास जी की रचनाएँ ‘बीजक’ नाम से प्रसिद्ध हुई।

(च) कबीर के अनुसार गुरु कुम्हार है तो शिष्य क्या है?

उत्तर : कबीर के अनुसार गुरु कुम्हार है तो शिष्य कुंभ है। 

प्रश्न 3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो 

(क) “गुरु कुम्हार सिष कुंभ है” यहाँ गुरु को कुम्हार क्यों कहा गया है?

उत्तर: जिस प्रकार कुम्हार परम स्नेह से मिट्टी को पीस पीस कर अपने निपुण – हाथों से सुंदर घड़ा बनाता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को परम स्नेह से ज्ञान का पाठ पढ़ाते हैं। इसीलिए गुरु को कुम्हार कहा गया है।

(ख) कबीरदास के पालक पिता-माता कौन थे ? 

उत्तर : कबीरदास के पालक पिता-माता नीरू और नीमा थे। 

(ग) ‘कबीर’ शब्द का अर्थ क्या है? 

उत्तर: ‘कबीर’ शब्द का अर्थ है- बड़ा, महान, श्रेष्ठ।

(घ) ‘साखी’ शब्द किस संस्कृत शब्द से विकसित है? 

उत्तर: ‘साखी’ शब्द मूल संस्कृत शब्द ‘साक्षी’ से विकसित है।

(ङ) साधु की कौन-सी बात नहीं पूछी जानी चाहिए? 

उत्तर : साधु की जाति के बारे में नहीं पूछना चाहिए।

(च) डूबने से डरने वाला व्यक्ति कहाँ बैठा रहता है? 

उत्तर : जो पागल डूबने से डरता है वह किनारे पर ही बैठा रहता है, उसे ईश्वर

की प्राप्त नहीं होती।

प्रश्न 4. अति संक्षिप्त उत्तर दो ( लगभग 25 शब्दों में) 

(क) कबीरदास जी की कविताओं की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।

उत्तर : हिंदी के जिन भक्त कवियों की वाणी आज भी प्रासंगिक है, उनमें संत कबीरदास जी अन्यतम हैं। उन्होंने आम जनता के बीच रहकर जनता की सरल-सुबोध भाषा में जनता के लिए उपयोगी काव्य की रचना की। उनकी कविताओं में भक्ति भाव के अलावा व्यावहारिक ज्ञान एवं मानवतावादी दृष्टि का समावेश हुआ है। उनकी कविताएँ अपनी समय में बड़ी लोकप्रिय थीं। उनकी काव्य प्रतिभा उनके गुरु रामानंद जी की कृपा से ही जाग्रत हुई। वस्तुतः कबीर संत कवियों में सर्वाधिक प्रतिभाशाली थे। वे एक जन्मजात कवि, उपदेशक और संत थे। साधु-संत लोग कबीर विरचित गीत – पद गाते हैं।

(ख) प्रेम (अथवा भक्ति) रहित व्यक्ति की तुलना किससे और क्यों की गई 

उत्तर : जिस हृदय में प्रेम न हो वह हृदय श्मशान के समान होता है। वहाँ भूत- है? प्रेतों का वास रहता है। अर्थात जिन घरों के निवासी ईश्वर को स्मरण नहीं करता वह घर तो वास्तव में श्मशान के समान है। अर्थात प्रेमविहीन शरीर लोहार की खाल

के समान है, बिना प्राण के ही साँस लेता हैं। 

(ग) कबीरदास जी के आराध्य कैसे थे ?

उत्तर : कबीरदास जी सचमुच बड़े संत, श्रेष्ठ भक्त और महान कवि थे। सतं कबीरदास जी स्वामी रामानंद के योग्य शिष्य थे। वे इस संसार के रोम-रोम में रमने वाले प्रत्येक अणु-परमाणु में बसने वाले निर्गुण निराकर ‘राम’ की आराधना करते थे। 

(घ) कबीरदास जी की काव्य भाषा किन गुणों से युक्त है ? 

उत्तर : भाषा पर कबीरदास जी का भरपूर अधिकार था। उनकी काव्य भाषा वस्तुतः तत्कालीन हिन्दुस्तानी है, जिसे विद्वानों ने ‘सुधक्कड़ी’, ‘पंचमेल’, ‘खिचड़ी’ आदि कहा है। जनता के कवि कबीरदास ने सरल, सहज बोध गम्य और स्वाभाविक रूप से आए अलंकारों से सजी भाषा का प्रयोग किया है। ज्ञान, भक्ति, आत्मा, परमात्मा, माया, प्रेम, वैराग्य आदि गंभीर विषय उनकी रचनाओं में अत्यंत सुबोध एवं स्पष्ट रूप में व्यक्त हुए हैं।

(ङ) ‘कस्तूरी का मिरग’ का प्रसंग कवि ने क्यों उठाया है? 

उत्तर : मृग की नाभि में कस्तूरी रहती है, लेकिन मृग उसकी सुगंध को पाने

के लिए जंगल में इधर-उधर भटकता रहता है। वास्तव में यह उसके अज्ञानता के कारण होता है, क्योंकि कस्तूरी और उसकी सुगंध तो उसके शरीर में विद्यमान रहती हैं, किंतु ज्ञान न होने के कारण वह उसे खोज नहीं पाता। 

(च) ‘तेरा साईं तुझ में, ज्यों पुहुपन में बास’ का आशय क्या है ? 

उत्तर : मनुष्य के हृदय में ही ईश्वर का वास है, पर ज्ञान न होने के कारण हम ईश्वर को इधर-उधर ढूँढ़ते हैं और सांसारिक मोह माया में फँसकर कर्म विमुख हो जाते हैं। जिस प्रकार फूलों में ही उसकी सुगंध रहती है, उसी प्रकार मनुष्य के हृदय में ही ईश्वर का वास है। यदि जीव के सामने से अज्ञान का यह पर्दा हट जाए तो ईश्वर को कहीं पर खोजने की आवश्यकता नहीं होगी। 

(छ) ‘सतगुरु’ की महिमा के बारे में कवि ने क्या कहा है?

उत्तर : गुरु सत्य के साक्ष्य प्रमाण के साथ शिष्य को इहलोक और परलोक के तत्वज्ञान की शिक्षा देते हैं। ‘गुरु’ का अर्थ होता है- अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला। गुरु ही माया रूपी घोर अंधकार से मुक्त कर हमें ईश्वर रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर सदृश होते हैं। यदि गुरु ने ज्ञान का प्रकाश नहीं दिया होता तो ईश्वर को पहचानना मुश्किल था। क्योंकि वे ही ईश्वर तक पहुँचाने का मार्ग निर्देशित करते हैं।

(ज) ‘अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट’ का तात्पर्य बताओ।  

उत्तर : जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी के घड़े को बनाते समय मिट्टी को चोट पहुँचाता

है पर जब घड़ा बन जाता है, तो उसमें चिकनाहट आ जाती है वह परिपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उस घड़े में कुम्हारा का स्नेह स्पर्श था। उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाते हैं। अपने दिव्य ज्ञान से शिष्य को पाप-पुण्य का फर्क समझाते हैं और उन्हें जीवन का अर्थ समझाते हैं। गुरु के परम स्नेह से ज्ञान का पाठ पढ़ाने पर शिष्य भी घड़े के समान परिपूर्ण हो जाता है। यदि गुरु ने ज्ञान नहीं दिया होता, तो हम कैसे पहचानते कि हमारे सामने ईश्वर साकार रूप में खड़े हैं।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

प्रश्न 5. संक्षेप में उत्तर दो ( लगभग 50 शब्दों में ) 

(क) बुराई खोजने के संदर्भ में कवि ने क्या कहा है ?

उत्तर : कबीरदास जी कहते हैं दूसरों की बुराई खोजने से पहले अपने अंदर की त्रुटियों को दूर करना चाहिए। दूसरों की बुराई तो दिखती है पर अपने अंदर की बुराई नहीं दिखती। प्रभु प्राप्ति में अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए कवि कहते हैं जब तक मन में अहंकार है, ईश्वर को पा नहीं सकेंगे क्योंकि अहंकार मन में ईश्वर का वास नहीं होता। अतः दूसरों की बुराई खोजने से पहले अपने अंदर का अहंकार दूर करना चाहिए तभी संसाररूपी भंवर से मुक्ति मिलेगी। 

(ख) कबीरदास जी ने किसलिए मन का मनका फेरने का उपदेश दिया है? 

उत्तर : कबीरदास जी कहते हैं माला जप करने से ही मनों का गठबंधन नहीं होता। अर्थात भक्त और भगवान का मिलन नहीं होता। अंतरात्मा के साथ आत्मा का मिलना, तभी मनों का फेर सार्थक होगा। भाव यह है अपवित्र मन में ईश्वर और अहंकार एक साथ नहीं रहते। यदि माला घुमाने से मन उसमें ही आबद्ध रहे तो बेकार है। मन को ईश्वर मुखी करना चाहिए। पाखण्डी लोग दिखावे के लिए माला जपते हैं। पर उनका मन कहीं और रहता है। यहाँ भी निर्गुण कवि ने बाहरी आचार पर ध्यान न देकर मन को वश में करने को कहा है। ईश्वर ज्ञान की प्राप्ति हेतु मन को नियंत्रित करना चाहिए।

(ग) गुरु शिष्य को किस प्रकार गढ़ते हैं? 

उत्तर : गुरु ही शिष्य को जीवन के तत्वज्ञान की शिक्षा देता है। मनुष्य उन पतंगों के समान है, जो माया के आकर्षण में डूबकर अपना सर्वनाश करता है। इस विनाश से गुरु ही ज्ञान का प्रकाश देकर बचाता है। गुरु अपने शिष्य को परम यत्न से संसार रूपी सागर से पार लगाते हैं। कुम्हार जिस प्रकार मिट्टी को पीस कर उसके अंदर से कंकड़-पत्थर छानकर अपने निपुण हाथों से परम यत्न से मिट्टी का सुंदर घड़ा बनाता है, उसी प्रकार गुरु शिष्य को परम स्नेह से सांसारिक मोह माया से निकालकर मन को वश में करना सिखाता है।

(घ) कोरे पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता पर कबीरदास जी ने किस प्रकार प्रकाश डाला है? 

उत्तर : कबीरदास जी कहते हैं पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते संसार भर के लोग मर मिटे, लेकिन पंडित ज्ञान नहीं हुआ जो व्यक्ति मन को वश में करने, लोभ, मोह और अहंकार को वश में करके दृढ़ चित्त से परब्रह्म की आराधना करता है, वही पंडित कहलाता है। अर्थात् प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ लेता है, वही पंडित कहलाता है। धर्म- ग्रंथ पढ़ने से ही पंडित नहीं हो जाता अर्थात् ईश्वर की महिमा को जो जान जाता है, वही असली पडित है। 

प्रश्न 6. सम्यक् उत्तर दो ( लगभग 100 शब्दों में) 

(क) संत कबीरदास की जीवन-गाथा पर प्रकाश डालो।  

उत्तर : कविताओं की तरह उनकी जीवन-गाथा भी अत्यंत रोचक है। कहा जाता है कि स्वामी रामानंद के आशीर्वाद के फलस्वरूप सन् 1398 में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उनका जन्मा हुआ था। लोक-लज्जा के कारण जन्म के तुरंत बाद माँ ने इस दिव्य बालक को लहरतारा नामक स्थान के एक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से गुजरते हुए नीरू और नीमा नामक मुसलमान जुलाहे दम्पति को वह बालक मिला। खुदा का आशीर्वाद समझकर उन्होंने उस दिव्य बालक को गोद में उठा लिया। उन्होंने बालक का नाम रखा कबीर और उसे पाल-पोसकर बड़ा किया।आगे चलकर कबीरदास जी सचमुच बड़े संत, श्रेष्ठ भक्त और महान कवि बने । 

(ख) भक्त कवि कबीरदास जी का साहित्यिक परिचय दो। 

उत्तर : कबीरदास को शिक्षा प्राप्ति का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था। उनकी काव्य प्रतिभा उनके गुरु रामानंद जी की कृपा से ही जाग्रत हुई। अतः यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि उन्होंने स्वयं अपनी रचनाओं का लिपिबद्ध नहीं किया। इसके उपरांत भी उनके द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों से कबीरदास की विलक्षण प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। वस्तुतः संत कवियों में सर्वाधिक प्रतिभाशाली थे। वे एक जन्मजात कवि, उपदेशक और संत थे। अपने मन की अनुभूतियों को उन्होंने स्वाभाविक रूप से अपने दोहों में व्यक्त किया। अनपढ़ होते हुए भी उन्होंने जो काव्य-सामग्री प्रस्तुत की, वह अत्यंत विस्मयकारी है परवर्ती समय में शिष्यों ने उनकी अमृतोपम वाणियों को लिखित रूप प्रदान किया। महात्मा कबीरदास की रचनाएँ बीजक नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- साखी, सबद और रमैनी।

प्रश्न 7. सप्रसंग व्याख्या करो 

(क) “जाति न पूछो साधु की….. पड़ा रहन दो प्यान ।।”  

उत्तर: संदर्भ: प्रस्तुत पंक्ति साखी से ली गई है। इसके रचयिता कबीरदास जी हैं। प्रसंग : कबीरदास का कहना है कि जात पात तो बाहरी आवरण है। साधु-संत में हमें उनका कितना ज्ञान है वही खोज करनी चाहिए।

व्याख्या: कबीरदास का कहना है कि जात-पात तो बाहरी आवरण है। सजन पुरुष की इज्जत ज्ञान के कारण होनी चाहिए न कि जाति के कारण। अर्थात् साधु की जाति नहीं पूछनी चाहिए। उनका ज्ञान कितना है यहीं जानना है। जिस प्रकार कीमत तलवार की लगाई जाती है न कि म्यान की। अर्थात् जाति म्यान के समान ऊपरी वस्तु है, जिसका कोई मूल्य नहीं। प्रधानता तो तलवार के समान ज्ञान की हो है। साधु-संतों द्वारा प्रदत्त ज्ञान से सांसारिक माया से मुक्ति मिलती है, उनके ज्ञान से ही हमारे मन की अज्ञानता दूर हो सकती है।

(ख) “जिन डा तिन पाइयाँ…. रहा किनारे बैठ।।”

उत्तर : संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति साखी से ली गई है। इसके रचयिता कबीरदास जी हैं। 

प्रसंग : कड़ी मेहनत करने से ही मनोवांछित फल मिलता है और जो पागल डूबने के डर से किनारे पर ही बैठा रहा, उसे ईश्वर की प्राप्ति कैसे होगी।

व्याख्या : मोतियों के इच्छुक को समुद्र के गहरे पानी में प्रवेश करना पड़ता है। जो समुद्र की गहराई में उतरने से डरता है उसे मोतियों की प्राप्ति नहीं हो सकती। वह किनारे पर बैठा रहता है। जिस प्रकार पुरुषार्थी घोर विपत्तियों में भी विचलित नहीं होते, वे अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए कठोर परिश्रम करते हैं। तपस्या, अध्ययवसाय, दृढ़ संकल्प, आत्मत्याग करके ही अपनी आत्मा से परमात्मा का मिलन कराया। बिना परिश्रम से बिना तपस्या से ईश्वर नहीं मिलते। खोजने वालों को भगवान भी मिल जाता है। वास्तव में खोजने के पीछे हममे दृढ़ इच्छा शक्ति तथा कर्तव्यपरायणता होनी चाहिए।

(ग) “जा घट प्रेम न संचरै….. साँस लेत बिनु प्रान।

उत्तर: संदर्भ प्रस्तुत पंक्ति सारखी से ली गई है। इसके रचयिता कबीरदास जी है। : 

प्रसंग : कबीरदास जी कहते हैं जिस हृदय में प्रेम न हो यह हृदय श्मशान के समान होता है।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि जिस हृदय में प्रेम न हो वह हृदय श्मशान के समान होता है। वहाँ भूत प्रेतों का वास रहता है, जिस प्रकार लोहार जब धौकनी चलाता है, तो उसकी खाल बिना प्राण के ही साँस लेती है। जिन घरों में अतिथि

सज्जन या साधु पुरुष का सम्मान नहीं होता और जिन घरों के निवासी ईश्वर को स्मरण नहीं करता, वह घर तो वास्तव में शमशाम के समान है। ऐसे घरों में भूतों का ही वास होता है सच्चा गृहस्थ एक और अतिथियों का पूजन करता है तो दूसरी ओर ईश्वर की आराधना में भी अपना मन लगाता है।

(घ) “काल करे सो आज कर बहुरि करेगो कब ।।” 

उत्तर : संदर्भ प्रस्तुत पंक्ति साखो से ली गई है। इसके रचयिता कबीरदास जी हैं। 

प्रसंग : कबीरदास जी कहते हैं समय जीवन है और समय को नष्ट करना जीवन को नष्ट करना है। समय अमूल्य धन है, समय रहते सब कुछ करना चाहिए। जो एक बार चला जाता है, वह वापस नहीं आता। इसलिए समय रहते समय का उपयोग करना चाहिए। इसलिए कवि कहते हैं कि कल जो काम करना है उसे आज ही करो और जो आज करना है उसे अभी करो। क्या पता कल प्रलय हो जाए। इस संसार की स्थिति क्षणिक है और इस क्षणिक समय में ही राम नाम की महत्ता को समझो। हमें जो शुभ अवसर प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करना चाहिए।

भाषा एवं व्याकरण ज्ञान

1. निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप बनाओ 

 मिरग, पुहुप, सिष, आखर, मसान, परलय, उपगार, तीरथ ।

उत्तर :   मूलशब्द                 तत्सम शब्द

           मिरग                    मृग     

           पुहुप                     पूष्प

           सिष                     शिष्य

           आखर                  अक्षर

           मसान                   श्मशान

           परलय                   प्रलय

           उपगार                   उपकार

           तीरथ                     तीर्थ

2. बाक्यों में प्रयोग करके निम्नलिखित जोड़ों के अर्थ का अंतर स्पष्ट करो :

मनका―मन का, करका―कर का, नलकी―नल की,

पीलिया―पी लिया, तुम्हारी―तुम हारे,  नदी―न दी मनका 

(माला के दाने)― हाथ में मनका लेकर फायदा नहीं उठा सकता अगर दिल साफ न हो ।

       मन का (अंतर) ― माला जपने से पहले मन का फेर मार लेनी चाहिए ।

       करका (बर्षा का पत्थर )― श्रावन की महिने में करका अधिक होती है ।’

       कर का (हाथ)― कर का मैली साफ करना आसान है। 

       नलकी (पानी खींचा जाने वाली यन्त्र)― नलकी की सहायता से जमीन में से पानी ऊपर खीचा जाता है।

       नल की (नल का)― नल की भीतरी भाग खोखला है।

       पीलिया (एक बीमार का नाम) रमेन पीलिया की दवा ले रहा है ।

       पी लिया (पीना कार्य)― उसने पानी पी लिया है । 

       तुम्हारे (तुम का)― तुम्हारे पास रुपया है क्या ? 

       तुम हारे (पराजित होना)― तुम हारे या जीते इसमें मेरा कोई मतलव नहीं ।

       नदी (नद, तटिनी)― नदी का पानी पीना नहीं चाहिए ।

न दी (न)― उसने मुझे खाने न दी ।

3. निम्नांकित शब्दों के लिंग निर्धारित करो : 

महिमा, चोट, लोचन, तलवार, ज्ञान, घट, साँस, प्रेम । 

उत्तर :  महिमा―स्त्रीलिंग ।    

चोट―स्त्रीलिंग ।

लोचन―पुलिंग ।     

तलवार―स्त्रीलिंग ।  

ज्ञान―पुलिंग ।   

घट―पुलिंग ।  

साँस―स्त्रीलिंग ।

प्रेम―पुलिंग ।

4. निम्नलिखित शब्दो समूहों के लिए एक एक शब्द लिखो ―

(क) मिट्टी के बर्तन बनानेवाला व्यक्ति

उत्तर :  कुम्हार ।

(ख) जो जल में डूबकी लगाता हो 

उत्तर :  पनडुब्बे । 

(ग) जो लोहे के औजार बनाता है 

उत्तर :  लूहार ।

 (घ) सोने के गहने बनाने वाला कारीगर । 

उत्तर :  सुनार । 

(ङ) विविध विषयों के गंभीर ज्ञान रखने वाला व्यक्ति ।

उत्तर :  पंडित ।

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