SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-12| मृत्तिका

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-12| मृत्तिका सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-12| मृत्तिका लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-12| मृत्तिका

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-12| मृत्तिका ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

पाठ 12

कवि परिचय: नरेश मेहता (1922-2000)

नरेश मेहता का जन्म सन् 1922 में मालवा के (मध्य प्रदेश)) शाजापुर कस्बे में हुआ था। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए करने के पश्चात उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो इलाहाबाद में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्य प्रारंभ किया। नरेश मेहता की ख्याति ‘दूसरा सप्तक’ के प्रमुख कवि के रूप में प्रारंभ हुई। नरेश मेहता को उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘वह पथ बंधु था के कारण विशेष प्रसिद्धि मिली। सन् 2000 में उनका निधन हुआ।

वनपाखी सुनो, बोलने दो चीड़ को तथा मेरा समर्पित एकांत नरेश मेहता के प्रसिद्ध काव्य-संग्रह हैं। संशय की एक रात उनका प्रसिद्ध खंडकाव्य है। उनकी साहित्य सेवाओं के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भावार्थ :

1. मैं तो मात्र मृत्तिका हूँ………मातृरूपा हो जाती हूँ। 

भावार्थ: मृतिका कविता सीधे सरल प्रतिबिंब के सहारे पुरुषार्थी मनुष्य और मिट्टी के संबंध पर प्रकाश डाला है। मृत्तिका केवल मिट्टी ही है पर जब पुरुषार्थी मनुष्य इस मिट्टी को अपने पैरों से रौंदकर हल के फाल से विदीर्ण कर मिट्टी को उपजाऊ बनाकर उसमें फसल उगवाता है। और जब यही फसल बड़ा होकर फलने-फूलने लगता है, तो चारों ओर हरियाली छा जाती है तब मिट्टी धन-धान्य से परिपूर्ण होकर मातृरूपा हो जाती है अर्थात कृषक के अथक परिश्रम के द्वारा मिट्टी उपजाऊ बनती है और फसल उगाने में समर्थ होता है अर्थात उद्यमशील पुरुष के हाथों आकर मिट्टी मातृरूपा बन जाती है।

2. जब तुम मुझे हाथों से …….. प्रजारूपा हो जाती हूँ।

भावार्थ : जब पुरुषार्थी मनुष्य अपने परिश्रम से मिट्टी को घड़े का रूप देता है, उन्हीं घड़ों में हमारी प्रिय पत्नी कुएँ से जल भरकर लाती है, उस समय मिट्टी अंतरंग प्रिया हो जाती है। अर्थात् जीवन में सरसता का संचार करने वाली हो जाती है। यही मिट्टी खिलौने में परिवर्तित होकर बच्चों के हाथ में पहुँचकर प्रजा रूप हो जाती है। अर्थात संतान जैसी बन जाती है।

3. पर जब भी तुम…….   ……. आराध्य हो जाती हूँ। 

भावार्थ : भाव यह है कि मिट्टी से ही भगवान की मूर्ति का निर्माण होता है। जब व्यक्ति का पुरुषार्थं हार जाता है, तब परब्रह्म को पुकारता है और मिट्टी की बनी प्रतिमा उसके लिए पूज्य बन जाती है। अर्थात मनुष्य अपने पुरुषार्थ पर घमंड करता है। जब वह पुरुषार्थ के बल पर सफलता नहीं प्राप्त कर सकता, तब उसका अहंकार पराजित हो जाता है। ऐसे समय में वह मिट्टी की प्रतिभा के माध्यम से चिन्मयी शक्ति की आराधना करता है।

4. विश्वास करो……..स्वरूप पाती मृत्तिका ।

भावार्थ : देवत्व कोई अलौकिक वस्तु नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का पुरुषार्थ ही है । पुरुषार्थ से ही मिट्टी अनेक रूपों में ढलती है। यदि मिट्टी पर प्रयत्न न किया जाए तो उसका कोई भी रूप नहीं बन सकता है। पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व इसलिए कहा गया है क्योंकि पुरुषार्थी मनुष्य ही मिट्टी को नए-नए रूपों में ढालता है। वह इस मिट्टी से सुंदर-सुंदर खिलौने एवं मूर्तियाँ बनाता है। मिट्टी स्वयं कोई आकार ग्रहण नहीं कर सकती। यह सब मनुष्य के श्रम से ही संभव होता है।

अभ्यासमाला

प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो वाक्यों में दो

(क) मूत्रिका’ शीर्षक कविता में ‘चिन्मयी शक्ति’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर: जब उद्योगी मनुष्य अहंभाव को त्याग कर परमब्रह्म को पुकारता है तब मिट्टी चिन्मयी शक्ति बनकर आराध्य देवी बन जाती है।

(ख) रौंदे और जोते जाने पर भी मिट्टी किस रूप में बदल जाती है? 

उत्तर : रौंदे और जोते जाने पर मिट्टी धन-धान्य बनकर मातृरूपा हो जाती है।

(ग) कवि नरेश मेहता जी के अनुसार सबसे बड़ा देवत्व क्या है?

उत्तर मनुष्य का पुरुषार्थ ही सबसे बड़ा देवत्व है।

(घ) नरेश मेहता की पठित कविता का नाम क्या है? 

उत्तर: कविता का नाम ‘मृत्तिका’

(ङ) मिट्टी के ‘मातृरूपा’ होने का क्या आशय है? 

उत्तर : मिट्टी के मातृरूपा होने का आशय है, किसान के अथक परिश्रम के द्वारा मिट्टी उपजाऊ बनती है और फसल उगवाने में समर्थ होती है। अर्थात उद्यमशील पुरुष के हाथों आकर मिट्टी मातृरूपा बन जाती है।

(च) जब मनुष्य उद्यमशील रहकर अपने अहंकार को पराजित करता है, तो मिट्टी उसके लिए क्या बन जाती है।

उत्तर: जब मनुष्य उद्यमशील रहकर अपने अहंकार को पराजित करता है, तब उसे ईश्वर का ध्यान आता है और यही मिट्टी ईश्वर की प्रतिमा बनकर उसकी आराध्य का रूप ले लेती है।

(छ) खाली जगह की पूर्ति करो

“जब तुम मुझे ——– रौदते हो”

उत्तर: ‘जब तुम मुझे पैरों से रौंदते हो’

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखो : 

(क) मृत्तिका’ कविता में पुरुषार्थी मनुष्य के हाथों आकर पाती मिट्टी के किन-किन स्वरूपों का उल्लेख किया गया है?

उत्तर : पुरुषार्थी मनुष्य के हाथों आकर धन-धान्य उगाकर मिट्टी मातृरूपा हो जाती है, जब उसके चाक पर चढ़ाया जाता है, तो वह घड़े का आकार ले लेती है और जल लाती प्रिया रूपा हो जाती है। यही मिट्टी खिलौने में परिवर्तित होकर बच्चों के हाथ में पहुँकर, प्रजारूपा हो जाती है। व्यक्ति जब अपने पुरुषार्थ से पराजित हो जाता है, तब उसे ईश्वर का ध्यान आता है और यही मिट्टी ईश्वर की प्रतिमा बनकर उसकी आराध्य का रूप ले लेती है। मनुष्य का पुरुषार्थ ही मिट्टी को दैवी शक्ति में बदल देती है।

(ख) मिट्टी के किस रूप को ‘प्रिय रूप’ माना है? क्यों ?

उत्तर : मिट्टी के घड़े और कलश को प्रियारूप माना है। जब पुरुषार्थी मनुष्य अपने परिश्रम से मिट्टी को पड़े का रूप देता है। इन्हीं घड़े में जल भरकर लाने वाली प्रिया अर्थात जीवन में सरसता का संचार करने वाली प्रिया जब जल भरकर लाती है, तब मिट्टी प्रियारूप बन जाती है।

(ग) मिट्टी प्रजारूपा कैसे हो जाती है?

उत्तर मृतिका केवल मिट्टी हो है पुरुषार्थी मनुष्य जब परिश्रम करके इसी मिट्टी को सुंदर-सुंदर खिलौने का रूप देता है, और मेले में जब बच्चे इन्हीं खिलौने को देखकर मचलते हैं तब मिट्टी खिलौने के रूप में शिशु हाथों में पहुँचकर प्रारूप बन जाती है।

(घ) पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व क्यों कहा गया है? 

उत्तर : पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व इसलिए कहा गया है, क्योंकि पुरुषार्थी मनुष्य ही मिट्टी को नए-नए रूपों में ढालता है. वह इस मिट्टी से सुंदर सुंदर खिलौने एवं मूर्तियाँ बनाता है। मिट्टी स्वयं कोई आकार ग्रहण नहीं कर सकती। यह सब मनुष्य के श्रम से ही संभव है। इसलिए पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व कहा गया है। 

(ङ) मिट्टी और मनुष्य में तुम किस भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण मानते हो और क्यों?

उत्तर : हम मिट्टी और मनुष्यों में मनुष्य की भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। इसका कारण यह है कि मिट्टी को विविध रूप प्रदान करने का काम मनुष्य ही करता है। उद्यमशील मनुष्य मिट्टी को अपने मन के अनुसार विविध रूप प्रदान करता है। यदि मिट्टी पर प्रयत्न न किया जाए तो उसमें कोई भी रूप नहीं बन सकता।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

 

प्रश्न 3. सप्रसंग व्याख्या करो :

(क) पर जब भी तुम 

अपने पुरुषार्थ– पराजित स्वत्व से मुझे पुकारते हो 

तब मैं अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ

उत्तर संदर्भ प्रस्तुत पंक्ति नरेश महेता द्वारा रचित मृतिका नामक पाठ से अवतरित है।

प्रसंग : जब व्यक्ति का पुरुषार्थ हार जाता है, तब वह परब्रह्म को पुकारता है। व्याख्या : भाव यह है कि मिट्टी से ही भगवान की मूर्ति का निर्माण होता है, जब व्यक्ति का पुरुषार्थ हार जाता है, तब परब्रह्म को पुकारता है और मिट्टी की बनी प्रतिमा उसके लिए पूज्य बन जाती है अर्थात् मनुष्य अपने पुरुषार्थ पर घमंड करता है, जब वह पुरुषार्थ के बल पर सफलता नहीं प्राप्त कर सकता तब उसका अहंकार पराजित हो जाता है। ऐसे समय में वह मिट्टी की प्रतिमा के माध्यम से चिन्मयी शक्ति की आराधना करता है।

(ख) यह सबसे बड़ा देवत्व है कि तुम पुरुषार्थं करते मनुष्य होऔर मैं स्वरूप पाती मृत्तिका । 

उत्तर: संदर्भ: प्रस्तुत पंक्ति नरेश मेहता द्वारा रचित मृत्तिका नामक पाठ से लिया। गया है।

प्रसंग : देवत्व कोई अलौकिक वस्तु नहीं है, बल्कि वह मनुष्य का पुरुषार्थ ही है। व्याख्या: पुरुषार्थ से ही मिट्टी अनेक रूपों में ढलती है। यदि मिट्टी पर प्रयत्न न किया जाए तो उसका कोई रूप नहीं बन सकता। पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व इसलिए कहा गया है क्योंकि पुरुषार्थी मनुष्य ही मिट्टी को नए नए रूपों में ढालता है। वह इस मिट्टी से सुंदर-सुंदर खिलौने एवं मूर्तियाँ बनाता है। मिट्टी स्वयं कोई आकार ग्रहण नहीं कर सकती। यह सब मनुष्य के श्रम से ही संभव होता है और यही उसका देवत्व है।

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