SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-1| नींव की ईंट

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-1| नींव की ईंट सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 आलाक भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT आलाक भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान आलाक भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-1| नींव की ईंट लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-1| नींव की ईंट

SEBA Class 10 Hindi (Elective) Solution| Chapter-1| नींव की ईंट ये उत्तर संबंधित विषयों के अनुभवी प्रोफेसरों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार किए जाते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को विषय की उचित समझ में मदद करना और उनके कौशल और अभिव्यक्ति की कला में सुधार करना है। यदि ये उत्तर उन उद्देश्यों को पूरा करते हैं जिनके साथ वे तैयार किए गए हैं, तो हम अपने प्रयास को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत मानेंगे। इन उत्तरों में और सुधार के लिए किसी भी सुझाव का हमेशा स्वागत है।

अभ्यासमाला

प्रश्न 1. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो 

(क) वृत्तासुर का नाश किससे किया गया था ?

उत्तर: दधीचि मुनि जिनको हड्डियों के दान ने ही वृत्तासुर का नाश किया गया था। 

(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म कहाँ हुआ था ? 

उत्तर रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 1902 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अंतर्गत बेनीपुर नामक गाँव में हुआ था।

(ग) बेनीपुरी जी का पूरा नाम क्या है?

उत्तर: बेनीपुरी जी का पूरा नाम रामवृक्ष बेनीपुरी।

(घ) बेनीपुरी जी को जेल की यात्राएं क्यों करनी पड़ी थी? 

उत्तर : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संक्रिय सेनानी के रूप में बेनीपुरी जी को 1930 ई. से 1942 ई. तक का समय जेल यात्रा में ही व्यतीत करना पड़ा।

(ङ) बेनीपुरी जी का स्वर्गवास कब हुआ था ? 

उत्तर : 1968 ई. में उनका स्वर्गवास हुआ था।

(च) चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत वस्तुतः किस पर टिकी होती है ? 

 उत्तर: चमकीली, सुंदर, सुघड़ इमारत नींव की ईंट पर टिकी होती है, जो कई फोट मिट्टी के नीचे अपने अस्तित्व को दबाकर सम्पूर्ण भवन की मजबूती का कारण नती है।

(छ) दुनिया का ध्यान सामान्यतः किस पर जाता है ?

उत्तर : दुनिया चकमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, बाह्य चमक-दमक के आकर्षण में उलझी दुनिया का ध्यान वास्तविकता की ओर नहीं जा पाता। 

(ज) नींव की ईंट को हिला देने का परिणाम क्या होगा ?

उत्तर : नींव की ईंट को हिला देने से कंगूरे सहित भवन आधारहीन होकर धराशाय हो जाएगा।

(झ) सुन्दर सृष्टि हमेशा ही क्या खोजती है?

उत्तर : सुन्दर सृष्टि हमेशा ही बलिदान खोजती है।

(ञ) लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश वस्तुतः किनकी शहादत से चमकते हैं? 

उत्तर लेखक के अनुसार गिरजाघरों के कलश वस्तुतः उन मौन मूक बलिदान से चमकते हैं, जो नींव की ईंट की तरह चुपचाप शहीद हो जाते हैं।

(ट) आज किसके लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है? 

उत्तर : आज कंगूरे की ईंट बनने के लिए अर्थात कुर्सी की सत्ता हथियाने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है। 

(ठ) पठित निबंध में ‘सुन्दर इमारत’ का आशय क्या हैं?

उत्तर :- नया सुन्दर समाज ।

प्रश्न 2. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में)  : 

(क) “सत्य कठोर होता है।” यहाँ सत्य को कठोर क्यों कहा गया है ?

उत्तर : लेखक सत्य को प्रत्यक्ष की चमकीली सुन्दरता से परे भद्दा एवं कड़वा बताया है, जिसे जानने का प्रयास बहुत कम लोग करते हैं। क्योंकि सत्य कठोर होता- है, उस पर चमक-दमक का कोई परदा नहीं होता।

(ख) मनुष्य सत्य से क्यों भागता है?

उत्तर : क्योंकि सत्य कठोर होता है, उस पर चमक-दमक का कोई परदा नहीं होता। कठोरता अपने जन्मकाल से ही भद्दी तथा कुरूप होती है। भद्दापन एवं कठोरता दोनों में गहरा सम्बन्ध है। इस कारण सत्य को कठोर एवं असुन्दर देखकर लोग उससे दूर भागते हैं।

(ग) नींव की ईंट की क्या भूमिका होती है ?

उत्तर लेखक ने नींव की ईंट एवं कंगूरे को प्रतीक बनाकर समाज के निर्माण में योगदान देने वाले गुमनाम बलिदानों एवं प्रसिद्ध व्यक्तित्वों के महत्व को तुलना की है। पक्की पक्की लाल ईंट चुपचाप नींव में दब जाती है तथा सुन्दर भवन खड़ा होता है, वह ईंट जो कई फीट मिट्टी के नीचे अपने अस्तित्व को दबाकर सम्पूर्ण भवन की मजबूती का कारण बनती है। कुरूपता, घुटन एवं गुमनाम बलिदान को यह इंट इसलिए अपनाती है ताकि उस भवन को मजबूती मिल सके, जिसका वह अंश हैं। 

(घ) कंगूरे की ईंट की भूमिका स्पष्ट करो। 

उत्तर : लेखक कहते हैं किसी भवन की सुन्दरता तथा उसके कंगूरे की सुन्दरता प्रत्येक व्यक्ति को आकर्षित करती है और उसकी प्रशंसा करते हैं। लेखक ने यहाँ कंगूरे को पदलोलुप एवं अवसरवादी लोगों का प्रतीक बताया है। लोग पद, यश, धन के पीछे दौड़ लगा रहा है। स्वतंत्र भारत की भव्य इमारत का कंगूरा बनकर चमकन के लिए हर कोई उत्सुक है, कंगूरे की चमक के समान हर व्यक्ति नाम और यश का भूखा है। सभी कंगूरे की ईंट बनना चाहते हैं। 

(ङ) शहादत का लाल सेहरा कौन-से लोग पहनते हैं और क्यों?

उत्तर : शहादत का लाल सेहरा वही लोग पहनते हैं, जो राष्ट्र या समाज के हित में गुमनाम रूप से बलिदान हो जाते हैं और उनके बलिदान पर राष्ट्र या समाज का भवन निर्मित होता है। गुमनामी के अन्धकार में अपना बलिदान करके राष्ट्रीय भवन निर्माण में अपने रक्त की मजबूती प्रदान करते हैं। इस बलिदान से ही नई सृष्टि होती है ये बलिदानी तथा उत्साही लोग पक्की ईंट की तरह तपे हुए और पक्के होते हैं।उनका बलिदान मौन होता है। 

(च) लेखक के अनुसार ईसाई धर्म को किन लोगों ने अमर बनाया और कैसे ?

उत्तर : लेखक के अनुसार ईसाई धर्म को अमर बनाया उन लोगों ने, जिन्होंने उस धर्म के प्रचार में अपने को अनाम उत्सर्ग कर दिया। उनमें से कितने जिंदा जलाए गए, कितने सूली पर चढ़ाए गए, कितने वन-वन की खाक छानते जंगली जानवरों के शिकार हुए, कितने उससे भी भयानक भूख-प्यास के शिकार हुए। उनके नाम शायद ही कहीं लिखे गए हो किंतु ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य प्रताप से फल-फूल रहा है। 

(छ) आज देश के नौजवानों के समक्ष चुनौती क्या है? 

उत्तर : आज देश के नौजवानों की आवश्यकता है, जो सच्चे हृदय से प्रचार से दूर रहकर और उत्साह के साथ देश को नया रूप प्रदान कर सके। किसी भवन का कंगूरा या कलश बनने की इच्छा से प्रेरित न होने वाले बलिदानी युवकों की इस देश को आवश्यकता है। चुपचाप बलिदान देने वाले वे युवक आज कहाँ है, जिन पर विकास की भव्य इमारत खड़ी हो सके ? देश की यह पुकार देश के हर युवक के लिए एक चुनौती है।

(ज) लेखक के अनुसार कौन-सी ईंट अधिक धन्य है?

उत्तर : लेखक के अनुसार धन्य है वह ईंट जो जमीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ गई और इमारत की पहली ईंट बनी। उसका त्याग उस कंगूरे की ईंट से सैकड़ों गुना महान है क्योंकि वह सुंदरता को नहीं कुरूपता को वरण करतो है। 

प्रश्न 3. संक्षिप्त उत्तर दो ( लगभग 50 शब्दों में )

(क) मनुष्य सुन्दर इमारत के कंगूरे को तो देखा करते हैं, पर उसकी नींव की ओर उसका ध्यान क्यों नहीं जाता ? 

उत्तर : मनुष्य सुन्दर इमारत के कंगूरे को तो देखा करते हैं। उसकी प्रशंसा करते हैं, जबकि भवन का कठोर सत्य उसकी वह नींव है, जिस पर भवन खड़ा होता है। दुनिया चकमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, आवरण के नीचे जो ठोस सत्य है उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। वह सत्य नींव की ईंट है, जो गुमनाम अंधेरे में पड़ी रहती है। भवन एवं कंगूरे का सम्पूर्ण अस्तित्व और सुन्दरता का आधार यही ईंट होती है। बहुत कम लोग हैं, जो सत्य अथवा यथार्थ को जानने का प्रयास करते हैं।

(ख) लेखक ने कंगूरे के गीत गाने के बजाय नींव के गीत गाने के लिए क्यों आह्वान किया है? 

उत्तर : लेखक यहाँ देश के नवयुवकों को कंगूरे के समरूप व्यक्तित्व की अपेक्षा नींव की ईंट बनने की प्रेरणा देते हैं। देश के नौजवानों से आह्वान किया है कि वे नींव की ईंट बनने की कामना लेकर आगे आएँ और भारतीय समाज के नव-निर्माण में चुपचाप अपने को खपा दें। स्वतंत्र भारत की भव्य इमारत का कंगूरा बनकर चमकने के लिए तो हर कोई उत्सुक है, पर किसी विशाल और सुन्दर भवन की वास्तविकता उसके कंगूरे से ज्ञात नहीं होती, वास्तविक सत्य का ज्ञान तो उसकी नींव में छिपी हुई उस ईंट से ही होती है, जिस पर विशाल भवन टिका हुआ है। आज देश को नींव की ईंट की आवश्यकता है।

(ग) सामान्यतः लोग कंगूरे की ईंट बनना तो पसन्द करते हैं, परंतु नींव की ईंट बनना क्यों नहीं चाहते ? 

उत्तर : नींव की ईंट का अर्थ है मौन बलिदान देना तथा कंगूरे की ईंट का अर्थ है यश देने वाले कार्य करना। यह मानव स्वभाव है कि वह चुपचाप मरने-खपने की बजाय यश चाहता है। इसलिए स्वतंत्रता के बाद लोग पद, यश, धन के पीछे होड़ा-

होड़ी कर रहे हैं, किंतु देश के नव-निर्माण के लिए चुपचाप कर्म नहीं करना चाहते। स्वतंत्र भारत की भव्य इमारत का कंगूरा बनकर चमकने के लिए हर कोई उत्सुक (है. पर नींव की ईंट बनकर भारत रूपी भव्य इमारत को मजबूत बनाने की इच्छा किसी. में नहीं है। कंगूरे की चमक के समान हर व्यक्ति नाम और यश का भूखा है। 

(घ) लेखक ईसाई धर्म को अमर बनाने का श्रेय किन्हें देना चाहता है और क्यों ? 

उत्तर : आज जो ईसाई धर्म पुण्य प्रताप से फल-फूल रहा है, वह किसी आम मनुष्य से नहीं हुआ। वह तो उन मूल बलिदानों से हुआ जिनका नाम ही शायद कहीं लिखा हो न उनकी कोई चर्चा करते है, पर ये मूल बलिदानी इस प्रचार के लिए कितने को जलकर मरना पड़ा, कितने को सूली पर चढ़ना पड़ा फिर भी ये ईसाई धर्म के प्रचार में चुपचाप शहीद हो गए। लेखक इन गुमनाम शहीदों को ही ईसाई धर्म को अमर बनाने का श्रेय देते हैं। और ये बलिदानी नींव की ईंट थे, जो आज गिरजाघर के कलश के रूप में चमकते हैं।

(ङ) हमारा देश किनके बलिदानों के कारण आजाद हुआ ? 

उत्तर : आज हमारा देश आजाद हुआ सिर्फ उनके बलिदानों के कारण नहीं, जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है बल्कि वे मौन-मूक बलिदानी जो रक्त से रंगा हुआ लाल सेहरा हँसते-हँसते पहन लेते हैं और वे चुपचाप मिट जाते हैं। उन अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के मूक बलिदानों के कारण देश को स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी, जो भारतवर्ष की स्वतंत्रतारूपी भव्य इमारत की नींव में ईंट बने। भले ही इतिहास में उन लोगों के नाम न चमक रहे हो, पर अंधकार में डूबे अनाम बलिदानी लोगों के कारण ही हमारा देश आजाद हुआ।

(च) दधीचि मुनि ने किसलिए और किस प्रकार अपना बलिदान किया था ?

उत्तर : दासता की बेड़ियों को काटने के लिए भारत माता को अपने अनगिनत सपूतों का बलिदान करना पड़ा। यहाँ पर लेखक ने अतीत में हुए भारत के कई परोपकारी महापुरुषों का पावन स्मरण किया है। भारत वर्ष का कोई कोना अथवा स्थल ऐसा नहीं है, जहाँ दधीचि जैसे महान तेजस्वी और बलिदानी न हुए हो। वृत्रासुर के आतंक से देवताओं को छुटकारा दिलाने के लिए महर्षि दधीचि ने अपनी हड्डियाँ देवराज इन्द्र को दे दी थी। इंद्र ने इन हड्डियों का वज्र बनाकर ही वृत्रासुर का संहार किया था। 

(छ) भारत के नव-निर्माण के बारे में लेखक ने क्या कहा है?

उत्तर : लेखक कहते हैं भारत के नव-निर्माण के लिए भी हमें नींव की ईंट की आवश्यकता है क्योंकि प्रत्येक निर्माण के लिए बलिदान आवश्यक होती है। इसके लिए ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो नाम और यश का लोभ त्याग कर देश • के, समाज के नव-निर्माण में स्वयं को चुपचाप मिटा सके। देश को ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो सच्चे हृदय से और उत्याह के साथ देश एवं समाज को नया रूप प्रदान कर सके। किसी भवन का कंगूरा या कलश बनने की इच्छा से प्रेरित न होने वाले बलिदानी युवकों की इस देश को आवश्यकता है। 

(ज) ‘नींव की ईंट’ शीर्षक निबन्ध का संदेश क्या है? 

उत्तर ‘नींव की ईंट’ बेनपुरी जी के रोचक एवं प्रेरक ललित निबंधों में अन्यतम है। नींव की ईंट का प्रतीकार्थ है- समाज का अनाम शहीद जो बिना किसी यश-लाभ के समाज के नव-निर्माण हेतु आत्म-बलिदान के लिए प्रस्तुत है। कंगूरे की ईंट का प्रतीकार्थ हैं- समाज का यश-लोभी सेवक जो प्रसिद्धि, प्रशंसा अथवा अन्य किसी स्वार्थवश समाज का काम करना चाहता है। लेखक कहते हैं भारत वर्ष के सात लाख गाँवों, हजारों शहरों और सैकड़ों कारखानों के नव-निर्माण हेतु नींव की ईंट बनने के लिए तैयार लोगों की जरूरत है। किसी भवन का कंगूरा या कलश बनने की इच्छा से प्रेरित न होने वाले बलिदानी युवकों की इस देश को आवश्यकता है।

प्रश्न 4. सम्यक् उत्तर दो ( लगभग 100 शब्दों में ) :

(क) ‘नींव की ईंट’ का प्रतीकार्थ स्पष्ट करो। 

उत्तर : नींव की ईंट’ का प्रतीकार्थ है- समाज का अनाम शहीद, जो बिना किसी यश-लोभ के समाज के नव-निर्माण हेतु आत्मबलिदान के लिए प्रस्तुत है। लेखक ने इस भावात्मक निबन्ध में नींव की ईंट उन लोगों को बताया है, जो हँसते-हँसते चुपचाप मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देते हैं। इन पंक्तियों में उन अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के मूक बलिदानों का स्मरण किया गया है, जिनके कारण देश को स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी। लेखक ने नींव की ईंट को प्रतीक बनाकर उन लोगों के महत्व पर प्रकाश डाला है, जो राष्ट्र या सामज के हित में गुमनाम रूप से बलिदान हो जाते हैं और उनके बलिदान पर राष्ट्र या समाज का भवन निर्मित होता है।

(ख) ‘कंगूरे की ईंट’ के प्रतीकार्य पर सम्यक् प्रकाश डालो। 

उत्तर: ‘कंगूरे की ईंट’ का प्रतीकार्य है- समाज का यश-लोभी सेवक, जो प्रसिद्धि, प्रशंसा अथवा अन्य किसी स्वार्थवश समाज का काम करना चाहता है। लेखक ने यहाँ कंगूरे को पदलोलुप एवं अवसरवादी लोगों का प्रतीक बताया है। कोई त्याग करके देश के लिए बलिदान होना नहीं चाहते। हर व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी को पराजित करके आगे निकल जाना चाहता है। स्वतंत्र भारत की भव्य इमारत का कंगूरा बनकर चमकने के लिए हर कोई उत्सुक हैं। हर व्यक्ति नाम और यश का भूखा है। त्याग की भावना उसके अंदर से सुप्त होती जा रही है। 

(ग) हाँ, शहादत और मौन मूक! समाज की आधारशिला यही होती है- का आशय बताओ।

স্পষ্ট কর।) उत्तर : मौन बलिदान से ही समाज का निर्माण होता है। जिस वास्तविक बलिदान पर समाज का विशाल भवन टिका हुआ है, वह बलिदान मूक ही होता है। जिन्होंने राष्ट्र और समाज कल्याण के लिए चुपचाप अपना बलिदान कर दिया है। बलिदान करते समय उन लोगों के मन में यह इच्छा भी नहीं थी कि उन्हें सम्मान मिलेगा। जिस प्रकार नींव की ईंट के बिना कोई भवन खड़ा नहीं हो सकता। उसी प्रकार मौन बलिदान के बिना किसी समाज रूपी भवन का निर्माण नहीं हो सकता। और ये मौन बलिदान करने वाले ही समाज की आधारशिला है। अर्थात् उनके हृदयों में नव-निर्माण का उत्साह है और जिनके हृदय बलिदान की भावना से भरे हुए हैं, वे लोग मानव समाज के भवन का निर्माण करने के लिए स्वयं को समर्पित कर देते हैं।

प्रश्न 5. सप्रसंग व्याख्या करो : 

( क ) ” हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं, इसलिए सच से भी भागते हैं।”

उत्तर: संदर्भ प्रस्तुत गद्यांश श्री रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘नींव की ईंट’ निबंध में अवतरित है।

प्रसंग लेखक ने यहां गुमनामी के अंधकार में डूबे हुए उन शहीदों के प्रति समाज का ध्यान आकृष्ट कराया है, जो समाज के वास्तविक निर्माता है। 

व्याख्या : लेखक सत्य को प्रत्यक्ष की चमकीली सुन्दरता से परे भद्दा एवं कड़वा बताया है, जिसे जानने का प्रयास बहुत कम लोग करते हैं, क्योंकि सत्य कठोर होता है, उस पर चमक-दमक का कोई परदा नहीं होता। कठोरता अपने जन्मकाल से ही भद्दी तथा कुरूप होती है। भद्दापन एवं कठोरता दोनों में गहरा सम्बन्ध है। इस कारण सत्य को कठोर एवं असुन्दर देखकर लोग उससे दूर भागते हैं। सुन्दर और विशाल भवनों की प्रशंसा की जाती है, जबकि भवन का कठोर सत्य उसकी वह नींव है, जिस पर भवन खड़ा होता है। किसी विशाल और सुंदर भवन की वास्तविकता उसके कंगूरे से ज्ञात नहीं होती है। वास्तविक सत्य का ज्ञान तो उसकी नींव में छिपी हुई उस ईंट से ही होती है, जिस पर वह विशाल भवन टिका होता है।

(ख) सुन्दर सृष्टि सुन्दर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का।”

उत्तर: संदर्भ प्रस्तुत गद्यावतरण श्री रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘नींव की ईंट’ नामक निबंध से लिया गया है। 

प्रसंग : इस भावनात्मक निबंध में ‘नींव की ईंट’ शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है, जिन्होंने राष्ट्र और समाज कल्याण के लिए चुपचाप अपना बलिदान कर दिया है।

व्याख्या : नींव के भीतर दबकर नींव की ईंट अपना अस्तित्व इसलिए मिटा देती है ताकि उसके ऊपर एक सुन्दर इमारत बन सके। इसी प्रकार कुछ व्यक्ति समाज या राष्ट्ररूपी भवन का निर्माण करने के लिए अपने को बलिदान कर देते हैं और इस बलिदान से ही नई सृष्टि होती है। वस्तुतः सुन्दर सृष्टि बलिदान चाहती है। बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का, वे बलिदानी तथा उत्साही लोग पक्की ईंट की तरह तपे और पक्के (दृढ़) होते हैं। वे लोग बलिदान के रक्त से रंगा लाल सेहरा हँसते-हँसते. पहन लेते हैं और वे चुपचाप मिट जाते हैं, तभी संसार को एक सुन्दर सृष्टि देखने को मिलेगी। और बलिदान करते समय उन लोगों के मन में यह इच्छा भी नहीं होती कि उन्हें सम्मान मिले।

(ग) “अफसोस, कंगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है, नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है।

उत्तर: संदर्भ प्रस्तुत गद्यावतरण श्री रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘नींव की ईंट’ निबन्ध से लिया गया है।

प्रसंग लेखक ने यहाँ कंगूरे को पदलोलुप एवं अवसरवादी लोगों का प्रतीक बताते हुए नवयुवकों को कंगूरा नहीं नींव की ईंट बनने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या : लेखक कहते हैं आज हम नए भारत के निर्माण में जुटे हैं। इस नव- निर्माण के लिए देश को नींव की ईंट की आश्यकता है क्योंकि प्रत्येक निर्माण के लिए बलिदान की आवश्यकता है। अफसोस कि आज देश में सब व्यक्ति लोभ के वशीभूत होकर कार्य करने के इच्छुक दिखाई पड़ते हैं। कोई त्याग करके देश के लिए बलिदान होना नहीं चाहता। हर कोई यश, धन तथा पद चाहता है। स्वतंत्र भारत की भव्य इमारत। का कंगूरा बनकर चमकने के लिए तो हर कोई उत्सुक है, पर नींव की ईंट बनकर भारत भव्य इमारत को मजबूत बनाने की इच्छा किसी में नहीं है। हर व्यक्ति नाम और यश का भूरा है। त्याग की भावना उसके अन्दर से लुप्त होती जा रही है।

Sl. No.Contents
Chapter 1नींव की ईंट
Chapter 2छोटा जादूगर
Chapter 3नीलकंठ
Chapter 4भोलाराम का जीव
Chapter 5सड़क की बात
Chapter 6चिट्ठियों की अनूठी दुनिया
Chapter 7साखी
Chapter 8पद-त्रय
Chapter 9जो बीत गयी
Chapter 10कलम और तलवार
Chapter 11कायर मत बन
Chapter 12मृत्तिका

 भाषा एवं व्याकरण ज्ञान 

प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों में से अरबी-फारसी के शब्दों का चयन करो

इमारत, नींव, दुनिया, शिवम, जमीन, कंगूरा, मुनहसिर, अस्तित्व, शहादत, कलश, आवरण, रोशनी, बलिदान, शासक, आजाद, अफसोस, शोहरत ।

उत्तर : अरबी : दुनिया, मुनहसिर, आवरण, रोशनी,शासक ।

 फारसी  : इमारत, जमीन, शहादत, आजाद, अफसोस,  शोहरत ।

 (वाकी संस्कृत से आए हिन्दी शब्द)

प्रश्न 2. निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग करके वाक्य बनाओ 

चमकीली, कठोरता, बेतहाशा, भयानक, गिरजाघर, इतिहास ।

(i) चमकीली : आकाश के चमकीली तारों को देखकर बच्चा स्थिर हो गये।

(ii) कठोरता : कठोरता उन्नति का प्रतिशब्द है।

(iii) बेतहाशा : कोई काम करने से सोच समझकर

करना चाहिए नहीं तो बेतहाशा हो जायेगा।

(iv) भयानक : जंगल में भयानक जनबर होती है

(v) गिरजाघर : गिरजाघर में प्रार्थना चल रहे हैं ।

(vi) इतिहास : इतिहास से ही नये समाज बनाने का प्रेरणा मिलती हैं। 

प्रश्न 3. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करो

(क) नहीं तो, हम इमारत की गीत नींव की गीत से प्रारंभ करते ।

उत्तर : नहीं तो, हम इमारत के गीत नींव के गीत से प्रारंभ करते ।

(ख) ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य प्रताप से फल-फुल रहे हैं 

उत्तर : ईसाई धर्म उनके पुण्य प्रताप से फल-फुल रहा हैं।

(ग) सादियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हम पहला कदम बढ़ाए हैं।

उत्तर : सादियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हमने पहला कदम बढ़ाए हैं।

(घ) हमारे शरीर पर कई अंग होते हैं।

उत्तर : हमारे शरीर में कई अंग होते हैं ।

(ङ) हम निम्नलिखित रूपनगर के निवासी प्रार्थना करते हैं।

उत्तर : हमें निम्नलिखित रूपनगर के निवासी प्रार्थना करते हैं ।

(च) सव ताजमहल की सौन्दर्यता पर मोहित होते हैं।

उत्तर : सव ताजमहल की सौन्दर्य पर मोहित होते हैं।

(छ) गत रविवार को वह मुंबई जाएगा।

उत्तर : गत रविवार को वह मुंबई गये ।

(ज) आप कृपया हमारे घर आने की कृपा करें। 

उत्तर : आप कृपया हमारे घर आए।

(झ) हमें अभी बहुत बातें सीखना है ।

उत्तर : हमें अभी बहुत बातों को सीखना हैं । 

(ञ) मुझे यह निबंध पढ़कर आनंद का आभास हुआ। 

उत्तर : मैंने यह निबंध पढ़कर आनन्द का आभास पाया।

प्रश्न 4. निम्नलिखित लोकोक्तियों का भाव-पल्लवन करो :

(क) अधजल गगरी छलकत जाए।

उत्तर : इसका अर्थ यह है कि बह घड़ा हमेशा छलकती रहा है जिसमे जल पुरी तरह भरा नहीं होता। यदि घड़ा पुरी तरह भरा होता तो पानी इधर उधर छलकने का डर नहीं होता। जो घड़ा खाली रहता है, उससे जल के छलकनेका डर रहता है, पानी छलकता रहता है।

इसी प्रकार जिस व्यक्ति में गंभीरता और सम्पन्नता रहती है वह बोलता कम है, उचित समय पर सही काम कर देता है। वास्तविकता यह है कि जो काम करता है वह दम्भ नही करता है, जो बरसता है वे गरजता नही, जो नहीं जानता है वे दिखाने का प्रयत्न करता है, किन्तु जो अधाभरा है वह छलक छलकर अपने को व्याप्त करने को कौशिश करता है। इसलिए कहा जाता है-अधजल गगरी छलकत जाए।

(ख) होनहार बिरबान के होत चिकने पात । 

उत्तर: जो बड़ा होकर प्रसिद्ध बनता है बचपन से भी उनका परिचय मिलता है। जैसे शिवाजी के बचपन से ही वीरता का प्रमाण हमको मिले थे। सतंत्र राज्य स्थापना को कल्पना वह बचपन से ही करते थे और आखिर एक दिन सफल भी हुए।

(ग) अब पछताए क्या होत जब चिडिय़ा चुग गई खेत।

उत्तर : इससे यह कहने की कोशिश करता है कि समय का काम समय पर नहीं करने से क्या नुकसान होता है यह बात सोचकर पछताने से कोई लाभ नही होगा। करने वाला काम समय मे ही करना चाहिए। विद्यार्थी समय पर नहीं पढ़ता, गाड़ी पकड़ने वाले समय पर स्टेसन नहीं पहुंचता तो पछताना जरुर होगा। अतः जो लोग समय का मुल्य को नहीं जानता है वह जीवन में उन्नति नहीं कर सकते।

(घ) जाको राखे साइयॉ मार सके न कोय ।

उत्तर: इससे यह कहा जाता है जिसको भगवान सहायता करते है उसको किसी ने भी मार नहीं सकते। प्रत्येक जीवों को भगवान सहायता करते है, सहारा देती है। जीवित रहने के शक्ति देते है। लेकिन इसके लिए हमे भगवान के नाम लेना चाहिए। हमे भगवान के प्रति विश्वासी होना चाहिए। हमको भी भगवान जीने के शक्ति देते है। इसको कहते हैं जाको राखे साइयाँ मार सके न कोई।

प्रश्न 5. निम्नलिखित शब्दों के दो-दो अर्थ बताओ :

अंबर, उत्तर, काल, नव, पत्र, मित्र, वर्ण, हार, कल, कनक ।

उत्तर: अंबर: आकाश , व्योम । 

उत्तर : दिशा, जवाब।

काल: समय, नियति।

नव : नया , नूतन ।

पत्र : चिठ्ठी , खत ।

मित्र : दोस्त , बंधु ।

वर्ण : अक्षर , श्रेणी ।

हार : पराजय , पराभब ।

कल : ध्वनि , वीर्य ।

कनक : स्वर्ण , सोना ।

प्रश्न 6. निम्नलिखित शब्दों-जोड़े के अर्थ का अंतर बताओ :

अगम :जहाँ गमन नहीं किया जाता है (अगम्य)।

दुर्गम : जहाँ गमन करना मुश्किल है।

अपराध :दोष।

पाप :अधर्म ।

अस्त्र : हथियार

शस्त्र :निक्षेप करनेवाली हथियार

आधि : मानसिक व्याथा ।

व्याधि: बीमार ।

दूख : क्लेश ।

खेद:थकावट

स्त्री: औरत

पत्नी : अर्धांगिनी । 

आज्ञा : आदेश । 

अनुमति : स्वीकृति ।

अहंकार : अभिमान।

गर्व: समर्थवान अंहभाव

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