SEBA Class 10 Hindi (MIL) Solution| Chapter-9| न्याय

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution| Chapter-9| न्याय सूची में प्रत्येक अध्याय का उत्तर प्रदान किया गया है ताकि आप आसानी से विभिन्न अध्याय एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 अंबर भाग-2 में खुल सकें और एक की आवश्यकता का चयन कर सकें। इसके अलावा आप एनसीईआरटी (CBSE) पुस्तक दिशानिर्देशों के अनुसार विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा इस खंड में NCERT पुस्तक ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। ये समाधान NCERT हिंदी (MIL) समाधान का हिस्सा हैं। यहां हमने कक्षा 10 NCERT अंबर भाग -2 पाठ्य पुस्तक समाधान अंबर भाग -2 के SEBA Class 10 Hindi (MIL) Solution| Chapter-9| न्याय लिए दिए हैं आप यहां इनका अभ्यास कर सकते हैं।

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पाठ – 9

लेखक-परिचय विष्णु प्रभाकर

हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के विशिष्ट साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में हुआ था। उनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थे और उनकी माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं, जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का विरोध किया था। विष्णु प्रभाकर की पत्नी का नाम सुशीला था।

विष्णु प्रभाकर की प्रारंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई। उन्होंने अंग्रेजी में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की और हिंदी में प्रभाकर व हिंदी भूषण की उपाधि के साथ ही संस्कृत में प्रज्ञा की उपाधि प्राप्त की थी। विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गांधी के दर्शन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा था। वे अपने दौर के लेखकों में प्रेमचंद, यशपाल, जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान रही। विष्णु प्रभाकर की प्रमुख कृतियाँ हैं-

लेखक-संबंधी प्रश्न एवं उत्तर

1. विष्णु प्रभाकर जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?

उत्तरः विष्णु प्रभाकर जी का जन्म 21 जून, 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में हुआ। 

2. विष्णु प्रभाकर जी की कृतियों के मुख्य भाव क्या है ? 

उत्तर: विष्णु प्रभाकर जी की कृतियों के मुख्य भाव देशप्रेम तथा सामाजिक विकास है।

3. विष्णु प्रभाकर जी की किन्हीं दो कृतियों के नाम लिखिए। 

उत्तरः विष्णु प्रभाकर जी की दो प्रमुख कृतियाँ है-‘प्रकाश और परछाई’, ‘क्या वह दोषी था।

4.विष्णु प्रभाकर मूलतः किस विधा के साहित्यकार थे ?

उत्तरः विष्णु प्रभाकर ने नाटक, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, व्यंग्य आदि लिखे हैं। वे मूलतः एकांकीकार के रूप में अधिक प्रख्यात हैं।

5. विष्णु प्रभाकर जी का निधन कब हुआ ? 

उत्तरः विष्णु प्रभाकर जी का निधन 11 अप्रैल, 2009 को हुआ।

सारांश

‘न्याय’ शीर्षक एकांकी गौतम बुद्ध के बचपन की एक सत्य घटना पर आधारित बहुचर्चित कथा है। इस एकांकी में राजकुमार सिद्धार्थ के प्रेम, करुणा और अहिंसा की भावना की झलक मिलती है। राजकुमार सिद्धार्थ और उनके चचेरे भाई देवदत्त के बीच घायल हंस को लेकर विवाद हो जाता है और दोनों अपने-अपने तर्क पर अडिग रहते हैं। दोनों एक-दूसरे के विरोधी है। एकांकी में सिद्धार्थ का व्यक्तित्व प्रभावी है, क्योंकि उनके हृदय में दया और प्रेम कूट-कूटकर भरे हुए हैं। सत्य और अहिंसा के प्रतीक होने के कारण अंततः न्याय उन्हीं के पक्ष में होता है। एकांकी का सार इस प्रकार है-

एक उपवन में संध्या के समय राजकुमार सिद्धार्थ टहल रहे थे। प्राकृतिक दृश्य अत्यंत मनमोहक थे और राजकुमार सिद्धार्थ एक ऊँचे स्थान पर बैठकर अपने सखा से प्रकृति के सौंदर्य के बारे में बातें कर रहे थे। उसी क्षण एक घायल हंस छटपटाता हुआ उनके पास आ गिरता है। राजकुमार सिद्धार्थ उस घायल हंस को अपनी गोद में उठा लेते हैं और उसके घावों पर मरहम-पट्टी करते हैं। इसी बीच उनका चचेरा भाई देवदत्त वहाँ आता है और कहता है कि वह हंस उसका है, क्योंकि उसने उड़ते हंस को अपनी तीर से मारा है। देवदत्त घायल हंस के लिए तरह-तरह के तर्क देता है परंतु राजकुमार सिद्धार्थ उस हंस को देने से इनकार कर देते हैं। दोनों राजकुमारों में हंस को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। दोनों चाहते हैं कि उनके विवाद का निर्णय राज दरबार में हो। दोनों राज दरबार गए। राज दरबार का निर्णय राजकुमार सिद्धार्थ के पक्ष में हुआ और हंस उन्हीं को दिया गया। इस प्रकार एकांकी में अहिंसा की जीत होती है और हिंसा की हार। यह एकांकी हमें दया, करुणा, प्रेम और अहिंसा का संदेश देता है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर(बोध एवं विचार)

1. सही विकल्प का चयन कीजिए: 

(क) ‘न्याय’ पाठ किस प्रकार की साहित्यिक विधा है ?

(i) कहानी               (ii) उपन्यास

(iii) नाटक               (iv) एकांकी

उत्तर: (iv) एकांकी

(ख) देवदत्त ने हंस को किस हथियार से घायल किया था ?

(i) बंदूक               (ii) तलवार

(iii) तीर                (iv) तोप

उत्तर: (iii) तीर

(ग) सिद्धार्थ कहाँ के राजकुमार थे ?

(i) वैशाली              (ii) मगध

(ii) हस्तिनापुर          (iv) कपिलवस्तु

उत्तर: (iv) कपिलवस्तु

2.पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए:

(क) हंस को तीर से किसने घायल किया ? 

उत्तर: हंस को तीर से देवदत्त ने घायल किया।

(ख) घायल हंस किसके पास आ गिरा ?

उत्तर: घायल हंस सिद्धार्थ के पास आ गिरा।

(ग) सिद्धार्थ कौन थे ? 

उत्तर: सिद्धार्थ कपिलवस्तु के राजकुमार थे।

(घ) देवदत्त कौन था ?

उत्तर: देवदत्त सिद्धार्थ का चचेरा भाई था।

(ङ) सिद्धार्थ के पिता का नाम क्या था ? 

उत्तरः सिद्धार्थ के पिता का नाम शुद्धोधन था।

(च) ‘पक्षी का शिकार खेलना मनुष्य का धर्म है’- यह किसका कथन है ? 

उत्तर: ‘पक्षी का शिकार खेलना मनुष्य का धर्म है’- यह कथन सिद्धार्थ के सखा का है।

(छ) ‘क्षत्रिय अपना शिकार नहीं छोड़ सकता।’ यह किसका कथन है ? 

उत्तर: ‘क्षत्रिय अपना शिकार नहीं छोड़ सकता।’ यह कथन देवदत्त का है।

3. संक्षिप्त उत्तर दीजिए:

(क) राजकुमार सिद्धार्थ और उनके सखा के बीच क्या-क्या बातें हो रही थीं ? 

उत्तर: राजकुमार सिद्धार्थ और उनके सखा बगीचे में टहलते हुए आपस में बातें करते हैं कि मौसम कितना सुहावना है, कितनी शांति है चारों ओर संध्या होने के कारण पक्षी अपने घोंसले में लौट रहे हैं, वे अपने बच्चों से मिलने को कितने आतुर हैं और गायें अपने बछड़ों को प्यार करने के लिए कितना उतावली हो रही हैं। ये सारी बातें दोनों सखा के बीच हो रही थीं।

(ख) सिद्धार्थ ने घायल हंस के साथ कैसा व्यवहार किया ? 

उत्तर: सिद्धार्थ घायल हंस के साथ दया व प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हुए उसे अपनी गोद में उठाकर उसे सम्भालते हैं तथा उसके शरीर से तीर निकालकर उसके शरीर पर हाथ फेरते हैं। इसके पश्चात देवदत्त से उसकी रक्षा करते हुए उसके घाव की मरहम-पट्टी करते हैं। इस प्रकार सिद्धार्थ घायल हंस के ऊपर प्रेम, दया व स्नेह की अविरल धारा प्रवाहित करते हैं।

(ग) हंस पर अपना अधिकार जताने के लिए देवदत्त ने क्या तर्क दिया ? 

उत्तर: हंस पर अपना अधिकार जताने के लिए देवदत्त ने यह तर्क दिया कि यह हंस उसका है, क्योंकि उसने उसका आखेट किया है और क्षत्रिय अपना शिकार नहीं छोड़ सकता।

(घ) राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस पर अपना अधिकार किस आधार पर जताया था ?

 उत्तर: राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस पर अपना अधिकार जताते हुए कहा कि मैं एक क्षत्रिय हूँ और क्षत्रिय अपने शरणागत को नहीं छोड़ सकता। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। अतः हंस पर मेरा अधिकार है।

(ङ) घायल हंस को लेकर विवाद बढ़ने पर सिद्धार्थ के सखा ने क्या सुझाव दिया ?

उत्तर: घायल हंस को लेकर विवाद बढ़ने पर सिद्धार्थ के सखा ने सुझाव देते हुए कहा कि आप दोनों ही राजकुमार हैं और ऐसे में आप दोनों के बीच के विवाद को सुलझाने के लिए महाराज के पास जाना चाहिए।

4. सम्यक् उत्तर दीजिए:

(क) राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के विवाद का निर्णय मंत्री ने किस प्रकार किया ?

उत्तर: मंत्री घायल हंस को एक आसन पर बैठा देते हैं और दोनों राजकुमारों से उसे अपने पास बारी-बारी से बुलाने के लिए कहते हैं। सर्वप्रथम राजकुमार देवदत्त उसे आगे बढ़कर पुकारते हैं किन्तु हंस उसे देखकर काँपता है, फड़फड़ाता है। वह उसके पास आना नहीं चाहता। अब राजकुमार सिद्धार्थ की बारी आती है। और वह हंस के पास जाकर उसे प्यार से पुकारते हैं। सिद्धार्थ के कंठ से स्नेहपूरित शब्द सुनकर हंस उड़कर उनकी गोद में आ चिपकता है। अंततः मंत्री कहते हैं कि घायल हंस ने स्वयं इस विवाद का निर्णय कर दिया कि वह राजकुमार सिद्धार्थ को ही मिले। इस प्रकार मंत्री राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच के विवाद का निर्णय करते हैं।

(ख) राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त दोनों के चरित्र में जमीन आसमान का अंतर दिखाई पड़ता है। सिद्धार्थ के चरित्र में दया, स्नेह, प्रेम भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है तो वहीं दूसरी ओर देवदत्त का चरित्र सिद्धार्थ के गुण के विपरीत है। देवदत्त के चरित्र में दया के स्थान पर कठोरता, स्नेह व प्रेम के स्थान पर हिंसा, क्रूर जैसे भाव परिलक्षित होते हैं। उदाहरणस्वरूप देखा जाए तो जब घायल हंस सिद्धार्थ के पास आता है तो वह उसके प्राणों की रक्षा करने हेतु अपने चचेरे भाई देवदत्त से लड़ जाता है और वह कहता है कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। सिद्धार्थ के इस कथन से उसके दयालु, परोपकारी होने का भाव परिलक्षित होता है, तो वहीं दूसरी ओर देवदत्त सुन्दर व कोमल हंस को अपने बाणों से घायल कर देता है। यह उसके कठोर, हिंसक आदि होने की प्रवृत्ति को परिलक्षित करता है।

(ग) अगर आप राजकुमार सिद्धार्थ की जगह होते तो क्या करते ?

 उत्तर: अगर मैं राजकुमार सिद्धार्थ की जगह होता तो उस घायल हंस को बचाने के साथ-साथ उस मूक प्राणी को घायल करने के अपराध में देवदत्त को सजा दिलावाते। इसके अतिरिक्त राज्य में ऐसी न्यायिक व्यवस्था बनाने पर जोर देते जिससे आगे और निर्दोष पक्षी पर या किसी अन्य जंतु पर अत्याचार व अन्याय न हो।

(घ) मंत्री द्वारा विवाद का निर्णय होने के बाद देवदत्त की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: मंत्री द्वारा विवाद का निर्णय होने के बाद घायल हंस राजकुमार सिद्धार्थ को सौंप दिया जाता है। सभा हर्ष और उल्लास से जय-जयकार करती है। राजकुमार सिद्धार्थ प्रेम से को छाती से लगाते हैं। देवदत्त गर्दन झुका कर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। महाराज और मंत्री हर्ष से मुस्कुराते हैं। राजकुमार सिद्धार्थ जाते हैं और हंस उनकी गोद में ऐसे दुबका है, जैसे बच्चा माँ की गोद में दुबक जाता है। इस प्रकार दया, परोपकारिता की जीत और हिंसा, अत्याचार जैसे दुर्गुणों की हार होती है, जिसे देवदत्त गर्दन झुकाकर स्वीकार करता है।

(ङ) मंत्री द्वारा विवाद का निर्णय होने के बाद सभा में क्या प्रतिक्रिया हुई ? 

उत्तरः मंत्री द्वारा विवाद का निर्णय होने के बाद सभा में हर्ष और उल्लास के कारण तालियों की गड़गड़ाहट और चारों ओर महाराज की जय-जयकार होती है। राजकुमार हंस को छाती से लगाते हैं। देवदत्त सिर झुकाये खड़े रहते हैं। महाराज और मंत्री हर्ष से मुस्कुराते हैं। राजकुमार हंस को गोद में लेकर जाते हैं और हंस उनकी गोद में ऐसे दुबका है, जैसे बच्चा माँ की गोद में दुबक जाता है।

(च) मंत्री द्वारा किए गए निर्णय को क्या आप न्यायसंगत मानते हैं ? 

उत्तर: मंत्री द्वारा किस गए निर्णय को हम न्यायसंगत मानते हैं क्योंकि सभी को अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है, चाहे वह जीव-जन्तु हो या मनुष्य। सभी को प्रकृति ने समान अधिकार प्रदान किये हैं। अगर हम किसी के प्राणों की रक्षा नहीं कर सकते तो उसे मारने का भी अधिकार हमें नहीं है। ऐसे में मंत्री द्वारा किया गया निर्णय पूर्णतः न्यायसंगत है। घायल हंस को अपने जीवन का फैसला करने का अधिकार उसका स्वयं का है कि वह कहाँ, किसके साथ रहना चाहता है।

(छ) ‘न्याय’ शीर्षक एकांकी की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। 

उत्तर: राजकुमार सिद्धार्थ अपने सखा के साथ बगीचे में टहल रहे होते हैं, तभी अचानक उनके समक्ष घायल हंस नीचे गिरता है। उस हंस को देवदत्त ने अपने तीर से घायल कर दिया था। राजकुमार सिद्धार्थ उस हंस को अपनी गोद में उठा लेते हैं और उसके घाव पर मरहम-पट्टी करते हैं। इसी बीच देवदत्त का वहाँ आगमन होता है और वह घायल हंस पर अपना अधिकार जताता है, परन्तु राजकुमार सिद्धार्थ घायल हंस को उसे देने से मना कर देते हैं। दोनों राजकुमारों में हंस को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। दोनों चाहते हैं कि उनके विवाद का निर्णय राजदरबार में हो। दोनों राजकुमार राजदरबार में जाते हैं। अंततः राज दरबार का निर्णय राजकुमार सिद्धार्थ के पक्ष में होता है और हंस उन्हें दे दिया जाता है। इस प्रकार एकांकी में करुणा और प्रेम की विजय होती है।

5.सप्रसंग व्याख्या कीजिए:

(क) क्षत्रिय अपना आखेट नहीं छोड़ सकता। परंतु क्षत्रिय शरणागत को भी तो धोखा नहीं दे सकता।

उत्तरः प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘अंबर भाग-2’ के अंतर्गत ‘न्याय’ नामक शीर्षक एकांकी से लिया गया है। प्रस्तुत एकांकी के एकांकीकार ‘विष्णु प्रभाकर’ जी हैं। हिन्दी एकांकी के विकास में ‘विष्णु प्रभाकर’ का योगदान अतुलनीय है। प्रभाकर जी ने नाटक, एकांकी, उपन्यास, यात्रा संस्मरण आदि कई विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है, जिसमें सबसे अधिक उन्हें एकांकी लेखन के क्षेत्र में सफलता प्राप्त हुई है। वे हैं। उनके कुछ प्रमुख एकांकी-संग्रह इस प्रकार हैं- ‘बारह एकांकी’, ‘प्रकाश और परछाई’, ‘इंसान’, ‘क्या वह दोषी था’ आदि। मूलत: एकांकीकार संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से एकांकीकार यह समझाते हैं कि जो क्षत्रिय होते हैं वे अपना शिकार नहीं छोड़ते हैं, तो वहीं दूसरी ओर क्षत्रिय की शरण में जो आता है उसे भी वह धोखा नहीं दे सकता है। व्याख्या: प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से एकांकीकार ने क्षत्रिय धर्म को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत एकांकी में देवदत्त द्वारा घायल किया गया। हंस उड़ता हुआ सिद्धार्थ के समक्ष जा गिरता है। सिद्धार्थ उसे अपनी गोद में उस घायल हंस को उठा लेते हैं और कहते हैं कि इस अबोध प्राणी को किसने मारा। तभी उनके पास देवदत्त घायल हंस को ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँचते हैं और सिद्धार्थ से पूछते हैं कि तुमने मेरा शिकार देखा है? वह इसी ओर उड़ता हुआ आया है। तभी देवदत्त की नजर सिद्धार्थ की गोद में घायल हंस पर पड़ता है। उस हंस को देख देवदत्त का ते हैं मेरा हंस तुम्हारे पास है, लाओ इसे मुझे दे दो। किन्तु सिद्धार्थ पूरी तरह से मना कर देते हैं और कहते हैं कि यह तुम्हारा है इसका क्या प्रमाण है ? देवदत्त कहते हैं मैंने इसे मारा है इसीलिए यह मेरा है। इस प्रकार घायल हंस को लेकर दोनों में विवाद बढ़ जाता है और देवदत्त क्रोध में आकर कहते हैं कि मैं क्षत्रिय हूँ तथा क्षत्रिय अपना शिकार नहीं छोड़ सकता। देवदत्त के तर्क को काटते हुए सिद्धार्थ कहते हैं मैं भी क्षत्रिय हूँ और क्षत्रिय भी अपने शरणागत को नहीं छोड़ सकता। इस तरह विवाद बढ़ता चला जाता है और दोनों विवाद को सुलझाने राजमहल पहुँचते हैं।

प्रस्तुत पंक्तियों में क्षत्रिय धर्म को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

(ख) बचानेवाला मारनेवाला से बड़ा होता है ।

उत्तरः प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘ अंबर भाग-2’ के अंतर्गत ‘न्याय’ नामक शीर्षक एकांकी से लिया गया है। प्रस्तुत एकांकी के एकांकीकार ‘विष्णु प्रभाकर’ जी । हिन्दी एकांकी के विकास में ‘विष्णु प्रभाकर’ का योगदान अतुलनीय है। प्रभाकर जी ने नाटक, एकांकी, उपन्यास, यात्रा संस्मरण आदि कई विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है, जिसमें सबसे अधिक उन्हें एकांकी लेखन के क्षेत्र में सफलता प्राप्त हुई है। वे मूलतः एकांकीकार हैं। उनके कुछ प्रमुख एकांकी-संग्रह इस प्रकार हैं- ‘बारह एकांकी’, ‘प्रकाश और परछाई’, ‘इंसान’, ‘क्या वह दोषी था’ आदि।

 संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति में सिद्धार्थ देवदत्त के प्रश्न का जवाब देते हुए कहते हैं कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। व्याख्या : प्रस्तुत पंक्ति में सिद्धार्थ राजकुमार देवदत्त के प्रश्न का जवाब देते हुए उक्त पंक्ति कहते हैं। देवदत्त बाग में उड़ रहे हंसों के झुण्ड में से एक हंस के ऊपर तीर से प्रहार करते हैं। देवदत्त के तीर से घायल हंस उड़ता हुआ सिद्धार्थ के पास जा गिरता है। सिद्धार्थ उसे अपनी गोद में उठा लेते हैं, तभी उस ओर उस घायल हंस की खोज करते हुए देवदत्त वहाँ आ पहुँचते हैं। देवदत्त सिद्धार्थ से उस घायल हंस के विषय में पूछते हैं और तभी देवदत्त की नजर सिद्धार्थ की गोद में बैठे घायल हंस पर पड़ती है। देवदत्त कहते हैं यह हंस मेरा है इसे मुझे दे दो। सिद्धार्थ कहते हैं- नहीं यह तुम्हारा नहीं है और तुम्हारे पास इसका क्या प्रमाण है कि यह तुम्हारा है। देवदत्त क्रोधित हो जाते हैं और दोनों में विवाद बढ़ जाता है। विवाद का निपटारा करने के लिए देवदत्त और सिद्धार्थ राजा के पास पहुँचते हैं। देवदत्त राजा से कहते हैं इस हंस को मैंने मारा है और इसे मेरा तीर लगा है इसीलिए मुझे यह आप दिला दें। महाराज सिद्धार्थ से पूछते हैं कि क्या देवदत्त की बात सत्य है। उत्तर में सिद्धार्थ हाँ कहते हैं और साथ ही यह तर्क देते हैं कि निश्चित ही देवदत्त ने इसे मारा हैं, परन्तु मैंने उसे बचाया है। बचानेवाला मारनेवाला से बड़ा होता है।

अंबर भाग-2

अध्याय संख्यापाठ
पद्य खंड
पाठ 1पद-युग्म
पाठ 2वन-मार्ग में
पाठ 3किरणों का खेल
पाठ 4तोड़ती पत्थर
पाठ 5यह दंतुरित मुसकान
गद्य खंड
पाठ 6आत्म-निर्भरता
पाठ 7नमक का दारोगा
पाठ 8अफसर
पाठ 9न्याय
पाठ 10तीर्थ-यात्रा
पाठ 11वन भ्रमण
पाठ 12इंटरनेट के खट्टे-मीठे अनुभव
पद्य खंड
पाठ 13बरगीत
पाठ 14कदम मिलाकर चलना होगा
गद्य खंड
पाठ 15अमीर खुसरू की भारत भक्ति
पाठ 16अरुणिमा सिन्हा : साहस की मिसाल
वैचित्र्यमय असम
तिवा
देउरी
नेपाली भाषी गोर्खा
बोड़ो
मटक
मोरान
मिसिंग
मणिपुरी
राभा
सोनोवाल कछारी
हाजंग
नाथ योगी
आदिवासी

भाषा एवं व्याकरण

1. भाव या अर्थ की दृष्टि से निम्नलिखित वाक्यों के भेद बताइए :

(क) वे मुझे नहीं मारतीं ।

उत्तरः वे मुझे नहीं मारतीं। (निषेधवाचक वाक्य)

(ख) तुम दौड़कर राजवैद्य से मरहम ले आओ। 

उत्तर: तुम दौड़कर राजवैद्य से मरहम ले आओ। (आज्ञावाचक वाक्य)

(ग) सिद्धार्थ, क्या तुमने मेरा हंस देखा है ? 

उत्तर: सिद्धार्थ, क्या तुमने मेरा हंस देखा है ? (प्रश्नवाचक वाक्य)

(घ) देखो मित्र! कैसा सुहावना समय है।

उत्तरः देखो मित्र ! कैसा सुहावना समय है। (विस्मयवाचक वाक्य)

(ङ) कुमार मुझे क्षमा करें।

उत्तरः कुमार मुझे क्षमा करें। (विधिवाचक वाक्य)

(च) महाराज की जय हो।

उत्तर: महाराज की जय हो (इच्छावाचक वाक्य)

(छ) वह आ गया होगा।

उत्तरः वह आ गया होगा। (संदेहवाचक वाक्य)

2. निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए :

(क) आकाश में बादल के छाते ही वर्षा होने लगी। (संयुक्त वाक्य में ) 

उत्तरः आकाश में बादल छाए और वर्षा होने लगी।

(ख) जो मेहनत करता है वह सफल होता है। (सरल वाक्य में)

उत्तरः मेहनत करने वाला सफल होता है।

(ग) मैंने एक लम्बा साँप देखा। (मिश्र वाक्य में)

उत्तर: मैंने एक साँप देखा, जो लंबा था।

(घ) देवदत्त ने हंस को तीर मारकर नीचे गिराया। (संयुक्त वाक्य में) 

उत्तरः देवदत्त ने हंस को तीर मारा और उसे नीचे गिराया।

(ङ) सिद्धार्थ ने घायल हंस को देखा और गोद में उठा लिया। (सरल वाक्य में)

उत्तर: सिद्धार्थ ने घायल हंस को देखकर गोद में उठा लिया।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्य में दीजिए

1. राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच विवाद किसको लेकर हुआ ? 

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच विवाद घायल हंस को लेकर हुआ। 

2. राजकुमार सिद्धार्थ और उनके मित्र कहाँ बैठे हुए थे ?

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ और उनके मित्र उद्यान में एक वेदी पर बैठे हुए थे।

3. राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच उत्पन्न विवाद को सुलझाने हेतु दोनों किसके पास गए? 

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच उत्पन्न विवाद को सुलझाने हेतु दोनों कपिलवस्तु के महाराज शुद्धोधन के पास गए।

4. ‘बताओ यह क्या मारने के लिए है ?’- यह कथन किसका है ? 

उत्तरः ‘बताओ यह क्या मारने के लिए है ?’ यह कथन राजकुमार सिद्धार्थ का है। 

5. प्रस्तुत पाठ के आधार पर बताइए कि मारने वाला बड़ा होता है कि बचाने वाला ?

उत्तरः प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।

6. राजकुमार सिद्धार्थ की माता का नाम क्या था ?

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ की माता का नाम महामाया था।

7. राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच के विवाद का समाधान किसने किया ? विवाद का समाधान मंत्री ने किया।

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ और देवदत्त के बीच के

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1. राजकुमार सिद्धार्थ और उनके सखा के बीच प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार हुआ है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः राजकुमार सिद्धार्थ और उनके सखा उद्यान में एक वेदी पर बैठे हैं और दोनों में प्रकृति की सुन्दरता को लेकर बातें हो रही हैं। सिद्धार्थ कहते हैं देखो मित्र कैसा सुहावना समय है। कैसी शांति है। पक्षी लौट रहे हैं। वे अपने बच्चों से मिलने को आतुर है और गाय अपने बछड़ों को प्यार करने के लिए उतावली हो रही है। सिद्धार्थ की बातें सुन मित्र कहता है हाँ कुमार। सुनी बछड़े कैसे स्नेह से पुकार रहे हैं। भला कुमार, ये कैसे जानते हैं कि यह समय उनकी माताओं के घर लौटने का है। सिद्धार्थ अपने सखा के प्रश्न का समाधान करने का प्रयास उदाहरण देकर करते हैं। वे कहते हैं जिस प्रकार हमें सोने के वक्त स्वयं नींद आ जाती है, वैसे ही इन बछड़ों को भी अपनी माताओं के आने का समय स्वयं ही पता चल जाता है। ये सारी प्राकृतिक चीजें कितनी रहस्यमयी है।

2. सिद्धार्थ के व्यक्तित्व में दया, परोपकारिता जैसा सद्गुण कूट-कूट कर भरा हुआ है, पाठ के आधार पर बताइए। 

उत्तरः देवदत्त के द्वारा घायल हंस जब राजकुमार सिद्धार्थ के पास आ गिरता है, तो सिद्धार्थ उसे अपनी गोद में उठा लेते हैं और कहते हैं कि किस क्रूर ने इसकी यह दशा की है। देखो तो इसकी आँखें कितनी भोली हैं, इसके स्पर्श में कितना स्नेह है। वे अपने सखा से कहते हैं मित्र। कोई भी व्यक्ति जिसके पास हृदय है, इन निर्दोष पक्षियों को मारना पसंद नहीं करेगा। लेकिन हाँ तुम दौड़कर राजवैद्य से मरहम तो ले आओ। तभी देवदत्त वहाँ पहुँचते हैं और कहते है यह हंस मेरा है, इसका मैंने आखेट किया है। इसीलिए इसे मुझे लौटा दो। सिद्धार्थ उस हंस को देने से साफ मना कर देते हैं और दोनों में बहुत विवाद होता है। किन्तु सिद्धार्थ उसे वह हंस वापस नहीं लौटाते और कहते हैं तुमने इसे मारा है और मैंने इसे बचाया है। मारनेवाले से बचानेवाला बड़ा होता है। इससे सिद्धार्थ के व्यक्तित्व में दया, परोपकारिता के गुण परिलक्षित होते है ।

3. प्रस्तुत पाठ में निहित संदेश को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: वर्तमान युग में जिस प्रकार मानवीय सद्गुणों का ह्रास हो रहा है, उसे पुनः व्यवस्थित करने में यह पाठ पूर्णतः सक्षम है। इस पाठ से यही संदेश देने का प्रयास किया गया है कि हमें सदैव दूसरों से प्रेम व सद्भाव रखना चाहिए । दूसरों के प्रति हृदय में प्रेम, दया, स्नेह, अपनापन आदि भाव होना अत्यंत आवश्यक है। तभी समाज में सभी को समता का अधिकार प्राप्त हो सकेगा और हमारा जीवन खुशहाल होगा।

4. मंत्री ने विवाद का निर्णय किस प्रकार किया ? 

उत्तर: मंत्री दोनों राजकुमारों से पूछते हैं कि हंस किसका है ? देवदत्त उत्तर देते हुए कहता है जी हाँ, हंस मेरा है। मैंने उसे तीर मारकर गिराया है। वहीं दूसरी ओर सिद्धार्थ से पूछने पर कहते हैं कि जी हाँ, यह मेरा है क्योंकि मैंने उसे बचाया है। तब मंत्री सिद्धार्थ को हंस को एक आसन पर बैठा देने के लिए कहते हैं और बारी-बारी से एक-एक कर दोनों राजकुमारों से उसे अपने पास बुलाने को कहते हैं। सर्वप्रथम देवदत्त को उसे अपने पास आने के लिए कहते हैं। पक्षी डरकर और चीखता है। उसके बाद सिद्धार्थ स्नेहपूर्वक उसे पुकारते हैं। और हंस सिद्धार्थ के शब्द सुनकर उड़कर उसकी गोद में आ चिपकता है। अन्ततः इस प्रकार हंस सिद्धार्थ को मिलता है और मंत्री बड़ी चतुराई से विवाद का निर्णय कर देते हैं।

5. प्रस्तुत पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तरः सायंकाल का समय है। उद्यान में कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ प्रसन्न मन से एक वेदी पर बैठे हैं, साथ ही एक सखा भी है। वे दोनों आपस में बातें कर रहे हैं। देखो मित्र कैसा सुहावना समय है। कैसी शांति है। पक्षी लौट रहे हैं। वे अपने बच्चों से मिलने को आतुर हैं और गायें अपने बछड़ों को प्यार करने के लिए उतावली हो रही हैं। तभी मित्र कहता है भला कुमार ये कैसे जानते हैं। कि यह समय उनकी माताओं के घर लौटने का है। सिद्धार्थ कहते हैं जिस प्रकार हमें सोने के वक्त नींद स्वयं ही आ जाती है, ठीक उसी प्रकार इन बछड़ों को संध्या होते ही स्वयं ही ज्ञात हो जाता है कि उनकी माताओं के आने का समय है। तभी उनके समक्ष एक घायल हंस उड़ता हुआ आ गिरता है। देवदत्त उस हंस को तीर से घायल करते हैं। राजकुमार सिद्धार्थ उस हंस को अपनी गोद में उठा लेते हैं और उसके घाव की मरहम-पट्टी करते हैं। इसी बीच देवदत्त वहाँ आकर हंस पर अपना अधिकार जताता है, परंतु राजकुमार सिद्धार्थ घायल हंस को उसे देने से मना कर देते हैं। दोनों राजकुमारों में हंस को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। दोनों चाहते हैं कि उनके विवाद का निर्णय राजदरबार में हो। दोनों राज दरबार में जाते हैं। अंततः राज दरबार का निर्णय राजकुमार सिद्धार्थ के पक्ष में होता है और हंस उन्हें दे दिया जाता इस प्रकार करुणा और प्रेम की विजय को बड़े प्रभावशाली ढंग से एकांकी में प्रस्तुत किया गया है।

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