SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution|वैचित्र्यमय असम| आहोम

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SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (ENG. MEDIUM)

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution|वैचित्र्यमय असम| आहोम

वैचित्र्यमय असम आहोम

सारांश

आहोम असम की एक मुख्य जनगोष्ठी है। आहोम लोग मूलत: ताई जाति से संबंधित हैं। असम में आने के बाद से ही उन्हें आहोम नाम से संबोधित किया गया। इन लोगों का मूल निवास चीन देश के दक्षिण-पश्चिम अंचल, वर्तमान यूनान के मूंगमाउ राज्य में था। इनके पूर्वज 13वीं शताब्दी में चुकाफा राजा के नेतृत्व में पाटकाई पर्वत पार कर पूर्वी असम या तत्कालीन सौमार में आए और राज्य की स्थापना की। बाद में धीरे-धीरे पश्चिम की तरफ ‘मनाह’ तक राज्य का विस्तार कर प्राय: 600 वर्षों तक राज्य का शासन किया। आहोम लोगों की मूल भाषा ताई या शान थी, परंतु वक्त बीतने के साथ-साथ उन्होंने अपनी भाषा की जगह असमीया भाषा को स्वीकार किया। यद्यपि प्राचीन पूजा-पाठ, रीति-नीति संबंधी कई कार्य उनके पंडित पुरोहित ताई भाषा में ही करते आ रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार असम में आहोम लोगों की संख्या प्राय: 25 लाख है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर

1. आहोम लोग पहले किस जाति के थे ? 

उत्तरः आहोम लोग पहले ताई जाति के थे।

2. आहोम लोगों का मूल निवास स्थान कहाँ था ? 

उत्तरः आहोम लोगों का मूल निवास स्थान चीन देश के दक्षिण-पश्चिम अंचल, वर्तमान यूनान के मूंगमाठ राज्य में था।

3. आहोम लोगों ने कितने सालों तक असम पर शासन किया ? 

उत्तरः आहोम लोगों ने 600 सालों तक असम पर शासन किया।

4. आहोम लोगों की मूल भाषा क्या थी ?

उत्तरः आहोम लोगों की मूल भाषा ताई या शान थी।

5। आहोम लोगों के कुछ उत्सवों के नाम लिखो।

उत्तरः आहोम लोगों के कुछ प्रमुख उत्सव है-मे-दाम-मे-फी, उमफा, साइफा, रिकखम, जासिंगफा, लाईलौगखाम आदि।

6. संक्षेप में टिप्पणी लिखो :

(क) लाचित बरफुकन

उत्तर: असम के इतिहास में देशप्रेमी, वीर के तौर पर प्रसिद्ध लाचित बरफुकन का जन्म 1612 में हुआ था। उनके पिता का नाम मोमाई तामुली बरबरुवा था। वे चार भाई थे, जिनमें वे सबसे छोटे थे। उनके पिता राजा स्वर्गदेव के राजदरबार में कार्य करते थे इसीलिए पिता के साथ उन्हें राज कार्य का निरीक्षण कर बहुत कुछ सीखने का मौका मिला था। कम समय में अपनी दक्षता के बलबूते पर लाचित को राजशाही में नियुक्त किया गया था। तब लाचित दिखौमुख में दुश्मन की सेना से लड़े थे और अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया था। जिसके परिणामस्वरूप आहोम राजा चक्रधर सिंह ने लाचित को सेनापति बनाया था और बरफुकन के पद पर नियुक्त किया था। इसके कुछ दिनों पश्चात् 20 अगस्त, 1667 को आहोम-मुगल के बीच युद्ध की शुरुआत हुई। मुगलों के साथ हुए, इस युद्ध में जीत हासिल हुई और इस जीत से असमीया सेना का आत्मविश्वास बढ़ गया। सेनापति के तौर पर लाचित बरफुकन की भी सराहना की गई। असमीया सेना के हाथों हुई मुगलों की पराजय की खबर से सम्राट औरंगजेब को शर्म और अपमान महसूस हुआ और उसने बदला लेने का निश्चय किया। उसने राम सिंह को एक विशाल सेना के साथ असम पर फिर आक्रमण करने के लिए भेजा। इसी बीच उन्होंने पूरे राज्य में यह निर्देश जारी किया कि अगर कोई अपने दायित्व का ठीक से पालन नहीं करेगा तो पता चलते ही उसका सिर कलम कर दिया जाएगा। लाचित ने अमीनगाँव के पास एक दुर्ग बनाने का दायित्व अपने मामा को सौंपा था, किन्तु मामा की लापरवाही की वजह से दुर्ग के निर्माण का काम अधूरा रहने पर लाचित क्रोधित हो उठे और तलवार निकालकर एक ही झटके में मामा का सिर काटकर बोले ‘देश से बढ़कर मामा बड़ा नहीं होता’। इसी दौरान मुगलों ने मार्च 1671 में आक्रमण कर दिया और आहोम एवं मुगलों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में आहोम सैनिकों ने लाचित बरफुकन के नेतृत्व में मुगल सेना को पराजित किया, जिसे शराईघाट युद्ध के नाम से जाना जाता है। बीमारी की गम्भीर हालत में भी युद्ध करने की वजह से युद्ध के कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में लाचित बरफुकन की मृत्यु हो गई। लाचित बरफुकन जब तक जीवित रहे, उन्होंने निःस्वार्थ भाव से देश और समाज की सेवा की।

(ख) सती जयमती

उत्तरः सती जयमती कुंवरी के समय असम में चारों ओर राजनीतिक अराजकता फैली हुई थी। मंत्री लालूक सोला का उस समय अत्यंत बोलबाला था। उसने दूसरे उपयुक्त राजकुमारों के रहते सरू गोहाईं को सन् 1679 में असम का राजा बना दिया। उसका नाम आहोम के लोगों ने सुलिकफा और हिन्दू लोगों ने रत्नध्वज सिंह रखा था। लालूक सोला को राजा बनने की लालसा उत्पन्न हो गई थी जिसके चलते उसने राजा स्वर्गदेव सुदेफा तथा आतन बूढ़ागोहाईं को परिवार सहित मार डाला। उसने अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए लड़ा राजा को रिश्ते की डोर में बांधा। उसने अपनी पाँच वर्ष की पुत्री का विवाह 14 साल के राजा के साथ कर दिया। उसने राज परिवार के राजकुमारों को अंग-भंग कर उनके राजा बनने की योग्यता को समाप्त कर दिया। किन्तु उन राजकुमारों में से एक राजकुमार लांगी गदापानी बच गया। गदापानी पकड़ में नहीं आ रहा था इसीलिए लालूक सोला ने गदापानी को पकड़ने हेतु उसकी पत्नी जयमती कुंवरी को पकड़ लिया और उससे गदापानी के विषय में पूछताछ की गई। किन्तु जयमती ने अपना मुँह नहीं खोला। लालूक ने जल्लाद को आदेश दिया कि जयमती को जेरेंगा के इलाके में निर्जन स्थान पर रखकर किसी भी तरह से जयमती के मुँह से गदापानी की खबर निकाले। जल्लाद ने अनेक तरीके से समझाकर, डराकर, फुसलाकर, उकसाकर गदापानी के ठिकाने के बारे में जयमती से पूछने की कोशिश की और जब कुछ पता नहीं चला तो जल्लाद कुंवरी को दंडित करने लगा। जयमती सभी दंड को सहते हुए 14 दिनों के बाद सन् 1679 में देह का त्याग कर दिया। इस प्रकार जयमती कुंवरी ने देश, समाज और पति की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी।

(ग) टॅगाई महन

उत्तर: पंडित टेंगाई महन का जन्म सन् 1715 में चराईदेउ के महंग माइसेऊ परिवार के तकन्वरी के घर में हुआ था। आहोम शासन के अंत समय में बुद्धिजीवियों को संकटों का सामना करना पड़ा था। इसकी वजह से आहोम दरबार में आहोम भाषा के स्थान पर असमीया भाषा का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था और आहोम भाषा धीरे-धीरे उपेक्षित होने लगी थी। ऐसे में बुद्धिजीवियों को आहोम भाषा को लेकर चिंता होने लगी कि कहीं आहोम भाषा पूरी तरह से लुप्त न हो जाए। इसी कारण भविष्य की पीढ़ी आहोम भाषा सीख सके इसके लिए उन्होंने आहोम शब्दकोश रचने का काम हाथों में लिया। सन् 1795 में गौरी नाथ सिंह के शासन के अंतिम हिस्से में उन्होंने ‘बड़काकत हू मूंग पूथी’ नामक इस शब्दकोश की रचना की। इसमें प्रत्येक आहोम शब्द के सामने सम्भावित असमीया अर्थ दिए गए हैं। सन् 1912 में कोच बिहार के कैलाश चंद्र सेन नामक एक बाबू से हेमचंद्र गोस्वामी ने टेंगाई महन के लिखे बड़काकत हू मूंग ग्रंथ का उद्धार किया और इतिहास एवं पुरातत्व विभाग को सौंप दिया। सन् 1932 में नंदनाथ फुकन ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए सम्पादन का कार्य शुरू किया। महन के ग्रंथ का संपादित रूप असम इतिहास और पुरातत्व विभाग द्वारा 1964 में प्रकाशित आहोम लेक्सिकन का एक भाग टेंगाई महन को असम का प्रथम शब्दकोश प्रणेता माना जाता है। आहोम भाषा की पुस्तकों का अनुवाद करने के लिए अंग्रेजी अधिकारी भी उनको विदेश ले गए थे। इस महान शब्दकोशकार का देहांत सन् 1823 में डिब्रुगढ़ जिले के खुवांग में हुआ।

(घ) पंडित प्रवर डंबरूधर देऊधाई फुकन

उत्तर: पंडित प्रवर डंबरूधर देऊधाई फुकन का जन्म अक्टूबर, 1912 में एक शुभ क्षण में चराईदेऊ महकमा के अन्तर्गत खालैघोगूरा मौजा के अन्तर्गत आखैया देऊधाई गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम गंगाराम फुकन और माता का नाम •सादई फुकन था। डंबरूधर देऊधाई फुकन ने एम. वी. स्कूल की पढ़ाई करने के बाद आगे की पढ़ाई न करते हुए ताई भाषा-संस्कृति का अध्ययन करना शुरू किया। घर में रहकर खेतीबारी करते हुए ताई भाषा का अध्ययन करते समय असम इतिहास और पुरातत्त्व विभाग के प्रमुख डॉ. सूर्यकुमार भूइयाँ सन् 1931 में भाषा के विशेषज्ञ के तौर पर उनको आहोम इतिहास का अनुवाद करने के लिए गुवाहाटी लेकर गए। 4 वर्ष तक कार्य करने के पश्चात् अवकाश लेकर 1935 में वे घर लौट आये। 1964 में ताई भाषा संस्कृति के उद्धार के लिए उन्होंने लकड़ी, बाँस से एक विद्यालय का निर्माण करवाया। यही बाद में केन्द्रीय ताई अकादमी, पाटसाको बना। उन्होंने सन् 1981 में दिल्ली में आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय ताई शिक्षा सम्मेलन में भाग लेकर 19 देशों के ताई पंडितों के साथ आहोम भाषा के संबंध में विचार-विमर्श किया था। सन् 1984 में बैंकाक में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय ताई शिक्षा सम्मेलन में आमंत्रित होकर एक महीने तक थाईलैंड के सियांगमाई शहर में रहकर ताई भाषा-संस्कृति की साधना की। इसी प्रकार विभिन्न देशों में भ्रमण कर तथा असम के एक कोने से दूसरे कोने तक ताई भाषा-संस्कृति का विकास करते हुए उनका देहांत 15 फरवरी, 1993 को हुआ। ताई भाषा-संस्कृति के विकास में उनका योगदान अतुलनीय है।

(ङ) पद्मनाथ गोहाईं बरुवा

उत्तर: पद्मनाथ गोहाईं बरुवा का जन्म 24 अक्टूबर, 1871 को उत्तर लखीमपुर के नकारिगाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम घिणाराम और माता का नाम लक्ष्मी देवी था। उन्होंने उत्तर लखीमपुर से छात्रवृत्ति परीक्षा में उत्तीर्ण होकर शिवसागर हाईस्कूल में दाखिला लिया। किन्तु बाद में कोहिमा हाईस्कूल से सन् 1890 में एंट्स परीक्षा उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा हेतु वे कोलकाता गये और में वहाँ से कानून की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने सर्वप्रथम कोहिमा मध्य अंग्रेजी विद्यालय में प्राधानाचार्य के पद पर कार्य किया। बाद में तेजपुर नॉर्मल स्कूल में आकर वहीं पर स्थायी रूप से रहने लगे। उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास आदि कई विधाओं में लेखनी चलाकर अपना अहम् योगदान दिया। उनके द्वारा रचित काव्य संकलनों में जुरणि, लीला, फूलर चानेकी आदि शामिल हैं तथा इतिहास प्रसिद्ध नाटकों में जयमती, गदाधर, साधना, लाचित बरफुकन आदि एवं प्रहसन नाटकों में गाँवबूढ़ा, टेटोन तामुली, भूत ने भ्रम आदि प्रख्यात हैं। उपन्यासों में भानुमती व लाहरी तथा आत्मजीवनी में मोर सॉवरणी आदि प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा उन्होंने भूगोल दर्पण, नीतिशिक्षा, शिक्षा विधान समेत कई पुस्तकों की रचना की। वे असम के शिवसागर जिले में हुए असम साहित्य सभा के प्रथम अधिवेशन 1917 के अध्यक्ष भी रहे। ऐसे महान साहित्यकार की मृत्यु 7 अप्रैल, 1946 को हुई।

(च) कृष्णकांत संदिकै

उत्तर: कृष्णकांत संदिकै का जन्म सन् 1898 में जोरहाट जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम राधाकांत संदिकै तथा माता का नाम नारायणी संदिकै था। उन्होंने सन् 1913 में जोरहाट सरकारी हाईस्कूल से प्रथम विभाग में एंट्स परीक्षा पास कर कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया। वहाँ से उन्होंने आई.ए. की परीक्षा प्रथम विभाग में उत्तीर्ण कर उच्च शिक्षा हेतु कोलकाता गए। वहाँ से उन्होंने बी.ए., एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की। उसके पश्चात् विलायत शिक्षा प्राप्त करने हेतु गये। कृष्णकांत संदिकै संस्कृत भाषा के पंडित थे। उन्होंने श्रीहर्ष रचित नैषध चरित का अंग्रेजी अनुवाद तथा टीका संबंधी पुस्तक ‘निषध चरित’ (1934), सोमदेव द्वारा रचित यशगान संबंधी पुस्तक ‘यशस्तिलक एंड इंडियन कल्चर’ (1949) का अनुवाद किया। सन् 1951 में उन्होंने भारतीय प्राच्यविद्या सम्मिलन के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता की। सन् 1953 को वाटलेयर में आयोजित आंतः विश्वविद्यालय समिति के अध्यक्ष भी रहे। उनकी रुचि असमीया भाषा साहित्य में भी पर्याप्त थी, इसीलिए वे समय-समय पर बाँही, मिलन, आवाहन, चेतना आदि पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। ‘कृष्णकांत संदिकैर रचना संभार’ में उनकी सभी रचनाएँ संगृहीत हैं। भारत सरकार ने उन्हें सन् 1955 में पद्मश्री तथा सन् 1967 में पद्मभूषण उपाधि से विभूषित किया था। इस प्रकार उन्होंने में जीवन भर असमीया और आहोम साहित्य समाज के विकास के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Question Answer

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वैचित्र्यमय असम

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर

1. ताई लोगों का असम आगमन कब और कैसे हुआ ? 

उत्तरः ताई लोगों का असम आगमन 13वीं शताब्दी में चुकाफा राजा के नेतृत्व में पाटकाई पर्वत पार कर पूर्वी असम यानी तत्कालीन सौमार में हुआ और में उन्होंने अपने राज्य की स्थापना की।

2. ताई लोग असम में आकर किस नाम से जाने जाने लगे ? 

उत्तर: ताई लोग असम में आने के बाद आहोम कहलाने लगे।

3. वर्तमान समय में ताई भाषा-भाषी कहाँ-कहाँ रहते हैं ? 

उत्तर: वर्तमान समय में ताई भाषा-भाषी असम से लेकर म्यांमार, दक्षिण चीन, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया एवं वियतनाम में रहते हैं। 

4। असम में ताई जनगोष्ठियाँ क्या-क्या हैं ? 

उत्तर: असम में आहोम के अलावा और पाँच ताई जनगोष्ठियाँ हैं, वे हैं-खामती, फाके, खामयांग, आइतन और तुकंग।

5. वर्तमान असम में आहोम लोगों की जनसंख्या कितनी है ?

उत्तरः वर्तमान असम में आहोम लोगों की जनसंख्या लगभग 25 लाख है।

6. असम में आहोम लोग कहाँ-कहाँ रह रहे हैं?

उत्तर: असम में आहोम लोग मुख्य तौर पर चराईदेव, शिवसागर, डिब्रुगढ़, जोरहाट, गोलाघाट, लखीमपुर, धेमाजी और तिनसुकिया जिले में रह रहे हैं। इसके अलावा गुवाहाटी शहर सहित अन्य शहरों में भी आहोम लोग रहते हैं।

7. आहोम लोग अपने पूर्वजों की पूजा किस प्रकार करते हैं? 

उत्तरः आहोम लोग अपने पूर्वजों की अवस्थिति पर विश्वास करते हैं और पूर्वजों की पूजा-आराधना करना अपना धर्म मानते हैं। वे मृत माता-पिता सहित 14 पुरखों की डाम के रूप में नियमित पूजा करते हैं।

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