SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution|ठेंगाल कछारी

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SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (ENG. MEDIUM)

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution|ठेंगाल कछारी

ठेंगाल कछारी

सारांश

‘ठेंगाल कछारी’ असम की प्राचीन जाति ‘कछारी’ की एक इकाई है। ठेंगाल •कछारी प्राचीन काल में युद्ध में दिखाए पराक्रम के लिए जाने जाते थे। कछारी जाति में का इतिहास महाभारत काल से संबंधित है। प्राचीन काल में कछारियों को ‘किरात’ नाम से जाना जाता था। महाभारत काल में असम सहित पूरे उत्तर भारत में किरातों का बोलबाला था। विद्वानों के मुताबिक ‘किरातीय लोग आम तौर पर बड़ी नदी या पहाड़ के समीप रहने के कारण संस्कृत भाषा में इन्हें ‘कक्षवाट’ कहा जाता था। ‘कक्षवाट’ शब्द के ‘कक्ष’ के साथ ‘अरि’ प्रत्यय जुड़कर ‘कछारी’ शब्द की उत्पत्ति हुई है। असम के ब्रह्मपुत्र घाटी में रहने वाले मंगोलीय समुदाय के किरात या कछारी लोग स्वयं को ‘बोड़ो’ मानते हैं। मंगोलीय समुदाय के इन बोड़ो लोगों को भारत के अन्य हिंदू लोग समय-समय पर किरात, म्लेच्छ, कछारी आदि नामों से संबोधित करते आ रहे हैं, किंतु वास्तविक रूप में ‘कछारी’ ही उनका प्रचलित नाम है।

ठेंगाल कछारी स्वयं को भीमपुत्र घटोत्कच का वंशज मानते हैं। हिडिम्बा राक्षसी नामक एक कन्या के साथ पांडव वीर भीम का वैवाहिक संबंध हो जाने के कारण घटोत्कच का जन्म हुआ था। हिडिम्बा के नाम के अनुसार कछारी राज्य का नाम हिडिम्बा राज्य और राजधानी का नाम ‘हिडिम्बापुर’ पड़ा था। वहाँ के राजाओं ने भी स्वयं का परिचय हिडिम्बापति के रूप में दिया था। आपसी संघर्ष और हार-जीत के बीच हिडिम्बा कछारी गुट के योद्धा धनुर्धर जंग बहादुर और चक्रध्वज ने कुछ ने कछारी परिवारों को साथ लेकर दैयांग घाटी की काछमारी मैदान में एक राज्य की स्थापना की और जंग बहादुर उस राज्य के राजा बने। इस राजा के सैनिकों को ठेंगा (पतलून) (Pantloons) पहनकर युद्ध करने का आदेश दिया जाता था। युद्ध के दौरान पहने गए ‘ठेंगा’ शांति के दौरान भी पहनकर इधर-उधर घूमने-फिरने के • कारण अन्य लोग उनकी प्रजा तथा जंग बहादुर को ‘ठेंगाल कछारी’ कहते थे। अतः यह कहा जा सकता है कि ठेंगाल कछारी मूलतः कछारी ही हैं। इतिहासकार के अनुसार ठेंगाल कछारियों का निवास स्थान सदिया, दैयांग-धनसिरि घाटी तथा नगांव तक फैला था। कालांतर में ये लोग जोरहाट, गोलाघाट, कार्बी आंग्लंग, शिवसागर, डिब्रूगढ़ आदि जिलों तक विस्तारित हुए। ठेंगाल कछारी लोगों में कुछ ‘ठेंगाल’ उपाधि लिखते हैं, उनमें कई लोग ‘कछारी’ की उपाधि भी लिखते हैं। उँगाल कछारियों को आहोम राजा द्वारा पदभार मिला था, जैसे-सइकिया, हजारिका, बरा, नेओग, बरुवा, राजखोवा, दास, बर सइकिया, बरबरुवा, हाती बरुवा, घौरा बरुवा, भराली, चांगमाई आदि। ये उपाधियाँ अब भी प्रचलित हैं।

प्राचीनकाल में ठेंगाल-कछारियों की समाज व्यवस्था ‘किरातीय’ प्रणाली से संचालित होती थी। 15वीं सदी में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने नव वैष्णव धर्म की स्थापना की और एकशरण नाम धर्म को सामाजिक आदर्श बनाया। उनके इस आदर्श से अनुप्राणित होकर असम के ठेंगाल-कछारी लोग अपनी समाज-संरचना के स्वरूप को बदला और हर गाँव में नामघर की स्थापना की गई। धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में असम में स्थापित नामघरों की भूमिका तब से अब तक अहम बनी हुई है। ठेंगाल कछारी समुदाय के लोगों का आर्थिक जीवन कृषि पर आधारित है। इनकी मुख्य खेती ‘धान’ है। इसके अलावा वे अपने घर पर बैल, भैंस, कबूतर, मुर्गा, बत्तख, बकरी, मछली आदि का पालन करते हैं। ये लोग प्राचीन काल से ही सामूहिक जीवन अपनाते आ रहे हैं। पर्व-उत्सव, हंसी-खुशी, दुःख-दर्द, विपद-आपद में एकजुट होकर खड़े रहते हैं। ठेंगाल कछारियों में प्राचीन प्रथा ‘हारिया मता’ या ‘हाउरि’ आज भी प्रचलित है। इसके बावजूद वे असम के जातीय उत्सव बिहू को भी अति आदरपूर्वक मनाते हैं। ऊपरी असम में बसनेवाले ठेंगाल कछारियों की भाषा असमीया है। ठेंगाल समुदाय साहित्य में समृद्ध है। उनके लोकविश्वास तथा आख्यानों ने भाषा-साहित्य को समृद्ध और संपन्न बनाए रखा है। ‘तेजीमला’, ‘पानशै’, ‘कांछनमाती’, ‘फूलरा-चतला’, लितिकाई, लखाई तरा आदि लोक कहानियाँ उनलोगों के बीच अभी भी प्रचलित हैं। इसके अलावा मुहावरे, कहावतें, लोककथाएँ, बिहुगीत, हुँचरि गीत, लोरियाँ, इनाम, आइनाम, विवाह आदि के मांगलिक गीत, पारंपरिक गीत-नृत्य इस समाज में बहुल रूप से प्रचलित हैं। ठेंगाल कछारी रुदाय के लोग असम की एक अति प्राचीन जनगोष्ठी है। सामाजिक रीति-नीति, धार्मिक परंपरा, विचार-धारा में थोड़ा अंतर होने के बावजूद बृहत्तर असमीया जाति की गठन प्रक्रिया में इनकी अहम भूमिका रही है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर

1. मंगोलीय किरातों की शारीरिक विशेषताएँ क्या है ?

उत्तरः मंगोलीय किरातों की शारीरिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-रंग गोरा और भूरा, बाल काला, शरीर रोम कम, मुखमंडल चौड़ा, नाक चिपटी तथा नेत्र छोटे या टेढ़े होते हैं।

2. मंगोलीय किरातों को संस्कृत भाषा में क्या कहकर संबोधित किया जाता था ?

उत्तरः मंगोलीय किरातों को संस्कृति भाषा में ‘कक्षवाट’ कहकर संबोधित किया जाता था।

3. कछारी नाम की उत्पत्ति कैसे हुई थी ?

उत्तरः मंगोलीय या किरातीय समुदाय के लोग सामान्य रूप से नदी या पहाड़ के निकटवर्ती क्षेत्रों में रहने के कारण संस्कृत में इन्हें ‘कक्षवाट’ कहा जाता था। ‘कक्षवाट’ शब्द के ‘कक्ष’ के साथ ‘अरि’ प्रत्यय जुड़कर कछारी नाम की उत्पत्ति हुई है।

4. डॉ. भुवन मोहन दास ने मंगोलीय लोगों को कितने भागों में विभाजित किया है ?

उत्तर: डॉ. भुवन मोहन दास ने मंगोलीय लोगों को छह भागों में विभाजित किया है 

  1. खासी, 
  2. बोड़ो (गारो, राभा, मेस, तिवा, डिमासा, ठेंगाल, सोनोवाल, झारूवा आदि बोड़ो समुदाय में शामिल हैं), 
  3.  लुसाई कुफी, 
  4. नागा, 
  5.  अरुणाचल की जनजाति और 
  6.  अन्य (अन्य जातियों में मिसिंग, देउरी, हाजंग आदि शामिल हैं)।

5. ठेंगाल कछारी लोग किस प्राचीन समुदाय से आये हुए थे ? 

उत्तर: ठेंगाल कछारी लोग मंगोलीय या किरातीय समुदाय से आए हुए हैं।

6. ठेंगाल कछारियों के मौजूदा अवस्थान के बारे में उल्लेख कीजिए।

उत्तर इतिहास के अनुसार ऊपरी असम के सदिया से दैमांग-धनसिरि घाटी तथा नगाँव तक ठेंगाल कछारियों के वंशज का अवस्थान था। कालांतर में असम के विभिन्न क्षेत्रों जैसे ब्रह्मपुत्र के उत्तरी एवं दक्षिणी किनारों पर विभाजित हो गए। दक्षिणी किनारे पर मौजूदा जोरहाट जिले के 37 नं. राष्ट्रीय राजमार्ग से नागा पहाड़ तक तिताबर को केंद्र बनाकर विस्तृत क्षेत्र ठेंगाल कछारियों से भरा पड़ा है। गोलाघाट, कार्बी आंग्लंग, शिवसागर, डिब्रूगढ़ और लखीमपुर, धेमाजी जिलों में ठेंगाल कछारियों की घनी आबादी वाले अनेक गाँव हैं। वर्तमान में इस समुदाय के लोग कम-अधिक संख्या में पूरे असम में रह रहे हैं।

7. टिप्पणी लिखिए :

(क) लौहपुरुष गिरिधर ठेंगाल

उत्तरः असम की प्राचीन व समृद्ध जनगोष्ठी ठेंगाल कछारी के जिन व्यक्तियों ने असम के आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है, उनमें गिरि ठेंगाल जी अन्यतम थे। इनका जन्म 12 जनवरी, 1921 को जोरहाट जिले के तिताबर अनुमंडल के अंतर्गत ठेंगाल मौजा के उलुतली गाँव में हुआ था। गरीब किसान परिवार में जन्मे गिरिधर ठेंगाल बचपन से ही पढ़ने में तेज थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा समीप के बजालबारी प्राथमिक विद्यालय और तिताबर मध्य अंग्रेजी विद्यालय में पाई। फिर जोरहाट सरकारी हाई स्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण होकर जोरहाट के जगन्नाथ बरुवा कॉलेज से आई.ए. और बी.ए. की परीक्षा उत्तीण की। इन्होंने गौहाटी विश्वविद्यालय से बी.एल. की डिग्री हासिल की थी।

एक अध्यापक के रूप में अपने कर्म-जीवन की शुरुआत करने वाले गिरिधर ठेंगाल की रुचि सामाजिक कार्यों में अधिक थी। उन्होंने जोरहाट कोर्ट में भी वकालत की। लेकिन इन दोनों क्षेत्रों को छोड़कर वे राजनीतिक जीवन में सक्रिय हुए और सन् 1978 में तिताबर विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी चुने गए। सामाजिक, शैक्षिक विकास में उनकी गहरी रुचि के कारण उन्होंने तिताबर नन्दनाथ सइकिया कॉलेज और जालुकनिबाड़ा हाईस्कूल की स्थापना भी की। जोरहाट से बरहोला तक प्रथम सर्वबृहद् लंबे ‘न-आली’ को पक्का करने का काम उन्हीं की पहल पर संपन्न हुआ था। असम की उन्नत्ति में इनका अवदान सरानहीय रहा है।

(ख) कमल कछारी

उत्तर: कमल कछारी असम के एक प्रख्यात कवि, गीतकार, चित्रकार तथा लेखक थे। इनका जन्म सन् 1939 में जोरहाट जिले के तिताबर अनुमंडल के अंतर्गत ठेंगाल मौजा के मरधलि कछारी गाँव में हुआ था। एक किसान परिवार में जन्मे कमल कछारी ने अपना कर्म-जीवन फर्मासिस्ट के रूप में शुरू किया। वे असम के प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखते रहे। असमीया समाचार पत्र जैसे असम वाणी, अग्रदूत, प्रतिदिन, सादिन, नीलाचल, प्रतिध्वनि आदि के अलावा अन्य संचार माध्यमों में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। कमल कछारी ने गीत, कविता, नाटक आदि लिखने के अलावा बैनर, फेस्टून, आवरण पृष्ठ के निर्माण में भी अपनी कुशलता दिखाई थी।

असमीया साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान की स्वीकृति स्वरूप उन्हें विष्णु प्रसाद राभा पुरस्कार, साहित्यिक पेंशन प्रदान किया गया था। वे शिवसागर जिला साहित्य सभा के अध्यक्ष भी थे। कवि कमल कछारी की मृत्यु सन् 2013 में हुई।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर

1. प्राचीन काल में कछारियों को क्या कहा जाता था ? 

उत्तर: प्राचीन काल में कछारियों को ‘किरात’ नाम से जाना जाता था।

2. ठेंगाल जनगोष्ठी के लोग अपने-आप को किसका वंशज मानते हैं ? 

उत्तरः ठेंगाल जनगोष्ठी के लोग अपने आप को भीम के पुत्र घटोत्कच का वंशज मानते हैं।

3. प्राचीन काल में कछारियों के राज्य और राजधानी के नाम क्या थे ? 

उत्तर: प्राचीन काल में कछारियों के राज्य का नाम हिडिम्बा राज्य और उसकी राजधानी का नाम हिडिम्बापुर था।

4. ठेंगाल कछारी जनगोष्ठी के लोग असमीया पारंपरिक बिहु के अलावा अन्य कौन-कौन से बिहु मनाते हैं ?

उत्तर: ठेंगाल कछारी जनगोष्ठी के लोग रंगाली भोगाली बिहु, भोगाली बिहु और कंगाली बिहु के अतिरिक्त तरासिरा बिहु या बालि-हुँचरि, बोका बिहु, नरासिंगा बिहु मनाते हैं।

5. ठेंगाल कछारियों के बीच विवाह संबंधी कैसी प्रथा है ? 

उत्तर: ठेंगाल कछारियों के बीच चार प्रकार के विवाह का प्रचलन है। जैसे- (क) भाग जाने या भगाकर ले जाने वाला विवाह, (ख) आबियै विवाह, (ग) बर विवाह, (घ) पुष्पिता विवाह ।

6. ठेंगाल कछारी जनगोष्ठी की महिलाएँ कौन-कौन-से पारंपरिक अलंकार पहनती हैं ?

उत्तरः ठेंगाल कछारी जनगोष्ठी की महिलाएँ पुराने जमाने से ही सोने-चाँदी के अलंकार पहनती आ रही हैं। इन अलंकारों में जोन-बिरि, डुगडुगी, मादलि, बिरि, बेना, पोवालमणि, धुरीया, केरू, चूड़ी, कनफूल, नकफूल, अंगूठी आदि प्रमुख हैं।

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