SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution|गारो

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SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (ENG. MEDIUM)

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution|गारो

गारो

सारांश

‘गारो’ असम की एक प्राचीन जनजाति है। इस समुदाय के कुछ लोग स्वयं को मंगोल मानते हैं। गारो लोग भाषाई दृष्टि से इंडो-चीन के अंतर्गत तिब्बत-बर्मी बोड़ो भाषा परिवार से संबंधित हैं। गारो समुदाय के लोग पश्चिम बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर के प्राय: सभी राज्यों में फैले हुए हैं। इसके अलावा बांग्लादेश के कई इलाकों में भी गारो समुदाय के लोग रहते हैं। गारो समुदाय के कई उप समुदाय भी हैं, जैसे आमबेंग, मातसी, मातार्बेग, गारागानसी, दुवाल, रुगा और मेगाम आदि ।

किंवदंतियों के अनुसार गारो लोगों के पूर्वज तिब्बत के थरुवा नामक स्थान पर रहते थे। एक बार वहाँ अकाल पड़ने के कारण जापफा, जालीमफा, चुकफा, बंगिफा और बिजिंफा आदि की अगुवाई में उस स्थान को छोड़कर हिमालय पहाड़ पारकर सीधे कोचबिहार आ गए और वहाँ काफी लंबे समय तक रहे। लेकिन वहाँ से असम • आने के समय उन्हें धुबड़ी और बिजनी जैसे छोटे-छोटे राज्यों के राजाओं के साथ युद्ध करना पड़ा। अंत में राजा आब्रासेन ने हाब्राघाट में अपनी राजधानी बनाई और आस-पास के इलाके को अपने राज्य में मिला लिया। दूसरी ओर, कुछ एक-दूसरे से नाराज होकर अलग-अलग स्थानों की ओर चले गए। एक समूह गारो पहाड़ तो दूसरा समूह बांग्लादेश जाकर रहने लगा।

जहाँ तक धार्मिक आस्था की बात है तो गारो लोगों के पूर्वज पूजा-पाठ करते थे। पूजा करने वालों को गारो लोग ‘संसारेक’ कहते हैं। इनके देवी-देवता थे चालजंग, गवेरा, खालखामे, आसिमा, डिंगसिमा, सुसिमे आदि। देवी-देवताओं की पूजा में पालतू पशुओं की बलि दी जाती थी, लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गारो लोगों ने ईसाई धर्म अपनाना शुरू किया और पूजा-पाठ भी परंपरा खत्म होने लगी। कालांतर में गारो लोगों का मुख्य उत्सव ‘ उवानगालाओ’ भी विलुप्त हो गया।

सामाजिक रूप से गारो परिवार का गठन माँ से शुरू होता है। गारो लोग स्वभाव से गुस्सैल और उग्र होते हैं। यही कारण है कि पड़ोसी राजा उन पर शासन नहीं कर पाए। यहाँ तक कि अंग्रेजों ने दमन नीति के बदले मिशनरियों की पा से धर्म प्रचार का सहारा लिया। जगह-जगह पर गिरजाघर, विद्यालय आदि की स्थापना कर मिशनरियों को मिशन संचालित करने दिया गया। गारो लोग रंग-बिरंगी पोशाक पहनते थे। वे घुटनों तक ही कपड़े पहनते थे। वर्तमान में कुछ गारो लोग भी आधुनिक कपड़े पहनने लगे हैं। गारो जनसमुदाय के लोग मांसाहारी हैं। वे मुर्गा, सूअर और गौ का मांस खाते हैं। सूखी मछली और खार गारो लोगों का प्रिय भोजन है।

गारो जनजाति का प्राचीन परंपरा, लोकाचार, परिवार गठन, विवाह आदि का विशेष महत्व है। बृहत्तर असमीया समाज गठन में गारो लोगों की भूमिका भी प्रशंसनीय रही है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर

1. गारो लोगों की उप-जनगोष्ठियाँ कौन-कौन-सी हैं? 

उत्तर: गारो लोगों की उप-जनगोष्ठियाँ हैं- आमबॅग, मातसी, माताबेंग, गारागानसी, दुवाल, रुगा और मेगाम

2. गारो बहुल इलाके कौन-कौन से है ?

उत्तर: गारो जनगोष्ठी के लोग पश्चिम बंगाल से पूर्वोत्तर के प्राय: सभी राज्यों में फैले होने के अलावा बांग्लादेश के कई इलाकों में रहते हैं।

3. गारो समुदाय में पूजा करने वाले व्यक्ति को क्या कहा जाता है ? 

उत्तर: गारो समुदाय में पूजा करनेवाले व्यक्ति को ‘संसारेक’ कहा जाता है।

4. प्रारंभ में गारो लोगों का धर्म क्या था और बाद में कौन-सा धर्म अपना लिया ? 

उत्तरः प्रारंभ में गारो लोग पूजा-अर्चना करते थे। अतः वे हिंदू धर्मावलंबी थे। बाद में उन लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया।

5. गारो लोगों के प्रधान वाद्य यंत्र क्या-क्या हैं ?

उत्तर: गारो लोगों के प्रधान वाद्य यंत्र हैं- ढोल, गगना, भैंस की सींग से निर्मित बाँस की पाइप लगी बाँसुरी आदि ।

6.संक्षिप्त टीका लिखो :

(क) रामखे ओवाथे मोमीन

उत्तर: गारो समाज में रामखे ओवाथ्रे मोमीन का स्थान सर्वोपरि था। वे गारो समाज के मार्गदर्शक माने जाते हैं। रामखे गारो समाज के प्रथम साहित्यकार, गीतकार व शिक्षाविद थे, जिन्होंने समाज के सामूहिक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इनका जन्म सन् 1834 में मेघालय राज्य के उत्तर गारो पहाड़ पर स्थित ‘माटछक ग्रे’ नामक एक पहाड़ी गाँव में हुआ था। इन्होंने 8 फरवरी, 1863 को डॉ. माइल्स ब्रनसन से ईसाई ग्रहण किया था। रामखे ओवाथ्रे मोमीन ने ईसाई मिशनरियों के प्रभारी के रूप में भी काम किया था। इन्होंने चालीस गारो सदस्यों को लेकर सबसे पहले एक ईसाई मिशनरी के रूप एक गिरजाघर की स्थापना की थी। इसके बाद डामरा में मिशन की स्थापना की और एक स्कूल भी खोला। रामखे सिर्फ एक शिक्षक ही नहीं बल्कि एक लेखक भी थे। सन् 1990 में उनकी हस्त लिखित कला और संस्कृति को मेघालय सरकार ने प्रकाशित किया। पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय लेखकों में रामखे अन्यतम थे।

(ख) रेवरेंड गिलबर्थ के मराक

उत्तर: रेवरेंड गिलबर्थ के मराक का जन्म सन् 1925 में पश्चिम खासी पहाड़ और दक्षिण कामरूप जिले की सीमा पर अवस्थित रांग्सापाड़ा गाँव में हुआ था। उन्होंने सन् 1960 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। रेवरेंड गिलबर्थ ईसाई धर्म के प्रचारक के साथ-साथ शिक्षा के विकास के लिए भी काफी काम किए। गिलबर्थ के मराक स्विट्जरलैंड के जीनिवा के वर्ल्ड काउंसिल ऑफ क्रिश्चियन एजुकेशन के मुख्यालय में भारत के सलाहकार थे। उन्हें वर्ल्ड काउंसिल फॉर चर्च का सदस्य भी बनाया गया था। इन्होंने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया। इनकी कार्यक्षमता को देखते हुए ईसाई संगठनों ने उन्हें ‘रेवरेंड’ (अर्थात् श्रद्धेय) की उपाधि से सम्मानित किया था। इसलिए वे रेवरेंड गिलबर्थ के मराक नाम से विख्यात हुए। इन्होंने सन् 1972 में पवित्र बाईबल का गारो भाषा में अनुवाद किया था। इनकी मृत्यु सन् 2007 में मेघालय राज्य के तुरा शहर में हुई।

(ग) सोनाराम रंगरकग्रे सांगमा

उत्तरः सोनाराम रंगरकग्रे सांगमा का जन्म सन् 1867 में उत्तर-पूर्व गारो पहाड़ और ग्वालापाड़ा जिले की सीमा पर अवस्थित नासिरंगदिक नामक गाँव में हुआ। निशानग्राम में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने तुरा मिशन स्कूल में छठी तक की पढ़ाई की। उन दिनों गारो पहाड़ पर छठी कक्षा से ऊपर अर्थात् उच्च प्राथमिक विद्यालय कहीं नहीं था। अतः सोनाराम की शिक्षा छठी कक्षा के बाद समाप्त हो गई।

सोनाराम रंगरकग्रे सांगमा एक साहसी, आत्मविश्वासी, परोपकारी और सबसे स्नेह-प्रेम रखनेवाले व्यक्ति थे। सोनाराम ने हमेशा अत्याचार और उत्पीड़ का विरोध किया और उन्हें जड़ से मिटाने की कोशिश की। उन्होंने गारो लोगों के हित में अंग्रेजों की नीतियों का खुलकर विरोध किया था। 21 अगस्त, 1916 को उनका निधन हो गया।

(घ) हावर्ड डेनिसन मोमीन

उत्तर: हावर्ड डेनिसन मोमीन को ‘आधुनिक गारो साहित्य का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने सबसे पहले ‘Achik Ku-rang’ (गारो लोगों की आवाज) नामक गारो भाषा की एक पत्रिका का प्रकाशन किया था। इनका जन्म 20 फरवरी, 1913 को मेघालय के तुरा शहर में हुआ था। इनके पिता जबांग डी मराक पढ़ाई के लिए अमेरिका जानेवाले गारो समाज के प्रथम व्यक्ति थे। जबांग डी मराक ने हावर्ड विश्वविद्यालय के ‘डेनिसन स्कूल’ में शिक्षा हासिल की थी। उसी की स्मृति में उन्होंने अपने बड़े पुत्र का नाम हावर्ड डेनिसन डब्ल्यू मोमीन रखा। हावर्ड डेनिसन डब्ल्यू मोमीन ने कोलकाता में पढ़ाई के समय अपना नाम बदलकर ‘ हावर्ड डेनिसन मोमीन’ रख लिया। हावर्ड डेनिसन मोमीन अंग्रेजी में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करनेवाले गारो समाज के प्रथम व्यक्ति थे। सन् 1940 में वे गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए थे। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं- ‘Nangko Gisik Ragen’ (गारो बातचीत), ‘Do Ma Skini Git’ (चातकी चिड़िया का गीत), ‘Me. Chik Aro Ta-Maku’ (महिला और तंबाकू), ‘Bilsi Gital’ (नववर्ष), ‘Sengwat’ (जुगनू) आदि।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर

1. गारो समाज के लोग मुख्यतः किस भाषा-परिवार के अंतर्गत आते हैं ?

उत्तर: गारो समाज के लोग मुख्यतः इंडो-चीन के तिब्बत-बर्मी बोड़ो भाषा-परिवार से आते हैं।

2. गारो लोगों के पूर्वजों का संबंध किस स्थान से था और किस कारण वे वहाँ से आए ?

उत्तर: गारो लोगों के पूर्वज तिब्बत के थरुवा नामक स्थान पर रहते थे। एक बार भयंकर अकाल पड़ने के कारण वे वहाँ से आए।

3. ‘उवानगालाओ’ क्या है ?

उत्तरः उवानगालाओ गारो लोगों का प्राचीन पर्व है, जो कालांतर में विलुप्त हो गया।

4. गारो महिलाएँ क्या-क्या पहनती हैं ?

उत्तर: गारो महिलाएँ परंपरागत पोशाक दागाबांदा, दागशारी, चुनी आदि पहनती हैं।

5. गारो समाज मातृप्रधान है या पितृ प्रधान ? 

उत्तर: गारो समाज मातृप्रधान है। माँ से ही गारो परिवार का गठन होता है।

6. प्राचीन काल में गारो युवाओं का शिक्षा केंद्र क्या था ? 

उत्तरः प्राचीन काल में गारो युवाओं का शिक्षा केंद्र था-नकपांथे या डेकाचांग। यहाँ गाँव के सभी युवक एकत्र होकर हस्तकला, वाद्ययंत्र, खेल-कूद आदि सीखते थे।

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