SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution| Chapter-7|खाने खिलाने का राष्ट्रीय शौक

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution| Chapter-7|खाने खिलाने का राष्ट्रीय शौकThe answer of each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapter NCERT Solutions Class 9 Ambhar Bhag-1 and select needs one. Also you can read NCERT book online in this sections Solutions by Expert Teachers as per NCERT (CBSE) Book guidelines. These solutions are part of NCERT Hindi (MIL) Solutions. Here we have given Class 9 NCERT Ambhar Bhag-1 Text book Solutions for Ambhar Bhag-1 You can practice these here.SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution| Chapter-7|खाने खिलाने का राष्ट्रीय शौक

SEBA CLASS 9 QUESTION ANSWER (ENG. MEDIUM)

SEBA Class 9 Hindi (MIL) Solution| Chapter-7|खाने खिलाने का राष्ट्रीय शौक

लेखक परिचय

गोपाल चतुर्वेदी आधुनिक हिंदी साहित्य के नए व्यंग्य लेखकों में अग्रणी हैं। इनका जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में सन् 1942 में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा भोपाल और ग्वालियर में हुई। उन्होंने इलाहाबाद में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर वे केन्द्रीय सरकार की नौकरी करने लगे। 1965 से 1993 तक आप भारतीय रेल के उच्च वित्तीय विभाग में कार्यरत रहे। भारत सरकार के अनेक उच्च पदों पर कार्य करने के बाद चतुर्वेदी जी राज्य व्यापार निगम के निदेशक के पद से सन् 1998 में सेवा निवृत्त हुए।

चतुर्वेदी जी छात्र जीवन से ही कविताएँ लिखने लगे थे। आगे चलकर वे व्यंग्य लेखन करने लगे। 1980 के बाद के व्यंग्यकारों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। चतुर्वेदी जी के व्यंग्य सरिता, इंडिया टुडे, नवभारत टाइम्स और साहित्य अमृत जैसे महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। उनके कई व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनके नाम हैं- ‘अफसर की मौत’, ‘दुम की वापसी’, ‘खंभों के खेल’, ‘फाइल पढ़ि-पढ़ि’, ‘आजाद भारत में कालू’, ‘दाँत में फँसी कुरसी’, ‘गंगा से गटर तक’, ‘भारत और भैंस’ आदि। उसके अतिरिक्त चतुर्वेदी जी की दो काव्य-पुस्तकें– ‘कुछ तो हो’, ‘धूप की तलाश’ भी प्रकाशित हो चुकी हैं।

चतुर्वेदी जी की भाषा-शैली सरल, सहज और मुहावरेदार होती है। वाक्यों में शब्दों का चयन भावानुकूल होता है तथा बीच-बीच में उर्दू-फारसी शब्दों का प्रयोग उनकी रचनाओं को बेहद धारदार बनाती है। उत्कृष्ट साहित्य सेवा के लिए चतुर्वेदी जी को कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इनमें हिंदी अकादमी, नई दिल्ली तथा रेल विभाग के साहित्य पुरस्कार शामिल हैं।

सारांश

‘खाने-खिलाने का राष्ट्रीय शौक’ नामक निबंध में उधार लेकर दावतें करने की मानसिकता पर प्रहार किया गया है। निबंध का सार इस प्रकार है

लेखक के पुत्र जन्मोत्सव का अवसर: भारत में खाने-खिलाने का बेहद शौक है। लेखक ने जन्म, मृत्यु, शादी, सालगिरह आदि की कई दावतें खाईं। आज उनके घर पुत्र जन्मा है। चारों ओर से दबाव पड़ने लगा कि वे भी दावत करें। लेखक ने कोशिश करके सबके आग्रह को टाला, परंतु उनकी पत्नी दावत करने पर तुल गई। लेखक ने उसे भी टालना चाहा। कभी उसकी नई साड़ी के नाम पर तो कभी उसकी साँवली सहेली के नाम पर। परंतु वह जिद पर अड़ी रही। लेखक ने आर्थिक मजबूरी का रोना रोया। पत्नी बोली-“घर पर पहला कुलदीपक जन्मा है। अतः उधार लेकर भी दावत तो करनी पड़ेगी। लेखक सोच में पड़ गए, अगर पहले कुलदीपक के जन्मोत्सव का कर्ज चुकाने से पहले दूसरा दीपक रौशन हो गया, तो क्या जीवन भर कर्ज चुकाते रहना पड़ेगा ?”

सेठ हीरामल की सहायता लेने का विचारः लेखक ने शहर के धन्ना सेठ हीरामल की दानवीरता के बारे में सुन रखा था। उन्होंने हाल ही में एक पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। वहाँ हर हफ्ते मुफ्त भोजन भी कराते थे। लेखक ने सोचा कि जैसे क्रिकेट मैच या कविता सम्मेलन को प्रायोजित किया जाता है, क्यों न मैं भी अपने बेटे का जन्मोत्सव स्पॉन्सर करवाऊँ। लेखक ने भोजन का प्रायोजक सेठ हीरामल को चुना। लेखक इस संबंध में एक हॉर्डिंग भी लगाने को तैयार है। अब समस्या यह है कि सेठ हीरामल को यह आइडिया कैसे बेचा जाए। सेठ जी तो सदा व्यस्त रहते हैं। कभी पूजा में, कभी मिटिंग में तो कभी स्वामी के दरबार में। लेखक ने उनसे मिलने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन उनके निजी सहायकों ने उन्हें निराश किया। लेखक ने टेलीफोन डायरेक्ट्री से उनकी कंपनी के महाप्रबंधक का नंबर लिया। परंतु पता चला कि वे दो-चार साल पहले ही मर चुके हैं। लेखक ने एक तरकीब सोची कि क्यों न सेठ जी से मंदिर के पुजारी के सहारे मिला जाए।

मंदिर के पुजारी से भेंट: लेखक शहर से दूर स्थित मंदिर में जा पहुँचा। उन्होंने देखा कि पुजारी एक नवयुवक है। उन्होंने पुजारी से परिचय बढ़ाया। उन्हें पता चला कि वह पुजारी वास्तव में प्रबंधक की नौकरी के लालच में सेठ के पास आया था। परंतु सेठ जी ने उसे पुजारी बना दिया। उसे सुविधा के नाम पर एक कोठरी और साइकिल मिली है तथा तनख्वाह के नाम पर भगवान का चढ़ावा। लेखक ने उसके साथ हमदर्दी जताई। उन्होंने पुजारी को सेठ से मिलने की अपने प्लान के बारे में भी बताया। पुजारी ने कहा कि कल सेठ यहाँ भगवान को घूस देने आएँगे। आप यहाँ आ जाइएगा। लेकिन सेठ जी महाकंजूस हैं और वे केवल आला अफसरों तथा नेताओं से मिलते हैं। लेखक ने सोचा कि मैं उनसे नेता बनके मिलूँगा।

मंदिर में सेठ से भेंट: लेखक अगले दिन नेता जैसा खादी का कुर्ता पहनकर मंदिर में पहुँचे। देखा कि सेठ जी मंदिर के चबूतरे पर रखी गद्देदार कुर्सी पर बैठे थे। उनके सामने भूखी भीड़ दो पंक्ति में खाना खा रही है। सेठ जी ने लेखक को भी खाना खाने का निमंत्रण दिया। लेखक के इनकार करते हुए बताया कि वे उनसे मिलने आए हैं। सेठ ने उनका परिचय पूछा। लेखक ने अपने-आप को मुहल्ले का नेता बताया। सेठ ने कुछ सोचकर कहा-‘सेवा बताइए।’ लेखक ने अपने बेटे के जन्मदिन को प्रायोजित करने का प्लान बताया। सेठ ने कहा- ‘मैं चंदा, सहायता या उधार सब कुछ देने को तैयार हूँ, परंतु मुझे यह बताएँ कि मुझे इससे क्या लाभ होगा। लेखक ने बताया कि वे सेठ जी की आरती उतारेंगे, उनके गुण गाएँगे। सेठ ने उनके प्रस्ताव को बेरुखी से इनकार कर दिया। बोले-‘ एक बच्चा ही तो पैदा हुआ है, कोई क्रिकेट का खेल होता तो स्पॉन्सर करने की सोच सकता था मैं।’ लेखक गिड़गिड़ाकर बोला कि इस नाम से ही मुझे कुछ हजार का चंदा दे दें या अपने मुफ्त भोजन में हमारे मेहमानों को खाने का अवसर दे दें। किंतु सेठ जी ने उन्हें मुहल्ला छाप लीडर कहकर बात करने से इनकार कर दिया।

भोजन संस्कृति का रहस्य : लेखक को अपने घर पर भोजन स्पॉन्सर करवाने में भले असफलता मिली, किंतु इस रहस्य का पता चल गया कि इस देश में पैसे वाले या तो धर्म के नाम पर पैसा देते हैं या कुर्सीधारी लोगों को खुश करने के लिए। उनका हलवा या तो भूखे-नंगों के लिए या असली नंगों के लिए अर्थात् समृद्ध अफसरों के लिए होता है। मध्यवर्ग तो चक्की की इन दो पार्टों के बीच में पिसता है, उसे अपनी झूठी हैसियत दिखाने के लिए दावतें करनी पड़ती हैं। लेखक को संतोष मिला कि जब पूरा देश उधार लेकर कारों, जहाजों और ऊँची इमारतों के सुख रहा है तो इस उधार की संस्कृति को अपना कर देश से क्यों न जुड़ें।

उधार की संस्कृति पर व्यंग्य: लेखक व्यंग्य करते हैं कि अब तो दार्शनिकों की तरह उधार की संस्कृति को पूरी तरह अपना ली गई है। जब साँस ही उधार की है, जीवन उधार का है, तो उत्सव समारोह भी उधार से क्यों न चले। लेखक हवाला कांड पर शोर मचानेवालों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं- देश में चल रहे ‘फ्री’ आयोजनों पर बेकार हो-हल्ला मचाया जा रहा है। पचास-साठ करोड़ रुपये के घोटाले से फर्क ही क्या पड़ता है। उन रुपये से हर देश के आदमी के हिस्से चवन्नी भी नहीं आती। यह चवन्नी जैसी छोटी मानसिकता वाले लोग घोटाले पर भी शोर मचाते हैं। आज तो उधार लेना राष्ट्रीय संस्कृति बन चुकी है। देश के हर नागरिक पर लगभग पंद्रह-बीस हजार का कर्ज है। अभी भी हमें उधार मिल रहा है। बाजार में उधार मिलने की बढ़ती साख हमारी इज्जत की निशानी है। अभी यह उधार कैसे बढ़ेगा? खाने-खिलाने का हमारे राष्ट्रीय शौक इसमें वृद्धि ही करेगा। जहाँ तक घोटाले की बात है, यह केवल चवन्नी की बात है। आज चवन्नी में पानी का गिलास भी नहीं आता। उससे शोर मचाने की क्या जरूरत ? दरअसल, यह छोटी मानसिकता वाले लोग न खुद ही बड़ी बात सोचते हैं और न किसी को सोचने देते हैं।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर बोध एवं विचार

1. सही विकल्प का चयन कीजिए:

(क) ‘खाने-खिलाने का राष्ट्रीय शौक’ किस प्रकार की रचना

  1.  कहानी
  2. रेखाचित्र
  3. संस्मरण)
  4. व्यंग्यात्मक लेख

उत्तर: (d) व्यंग्यात्मक लेख

(ख) पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार किसके द्वारा हुआ है ?

  1.  लेखक
  2. सेठ हीरामल
  3. मंदिर के पुजारी
  4. वित्त मंत्री

उत्तर: (b) सेठ हीरामल

(ग) लेखक को श्याम लाल जी का फोन नंबर कहाँ से प्राप्त हुआ ?

  1. सेठ हीरालाल से
  2. टेलीफोन बुथ से
  3. मंदिर के पुजारी से
  4. टेलीफोन डायरेक्टरी से

उत्तर: (d) टेलीफोन डायरेक्टरी से

(घ) ‘तुरंत दान महाकल्याण’ की नसीहत लेखक को किसने दी ?

  1. सेठ हीरामल ने
  2. लेखक के दोस्तों ने
  3. मंदिर के पुजारी ने
  4. लेखक के घरवालों ने

उत्तर : (d) लेखक के घरवालों ने

2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए:

(क) ‘खाना खिलाना’ किसका प्रिय शौक है ? 

उत्तर: ‘खाना खिलाना’ हिंदुस्तानियों का प्रिय शौक है।

(ख) लेखक किस बात पर अपने दोस्तों से कन्नी काट जाता है ?

उत्तर: लेखक के पुत्र के जन्म पर जब उनके दोस्त उनसे खिलाने की पार्टी देने को कहते तो लेखक कन्नी काट जाते।

(ग) लेखक किस कार्यक्रम को सेठ हीरामल जी से स्पॉन्सर कराना चाहता 

उत्तर: लेखक अपने पुत्र जन्म समारोह कार्यक्रम को सेठ हीरामल जी से स्पॉन्सर कराना चाहते हैं।

(घ) लेखक अपने अनूठे और मौलिक आइडिया को किसे बेचना चाहता है?

उत्तर: लेखक अपने अनूठे और मौलिक आइडिया को सेठ हीरामल जी को बेचना चाहता है ?

(ङ) लेखक अपने पुत्र के जन्मोत्सव कार्यक्रम की ‘होर्डिंग’ पर क्या लिखना चाहता है ?

उत्तर: ‘सेठ हीरामल जी के सौजन्य से लिखवाना चाहता है।

(च) सेठ हीरामल किन लोगों से अच्छी तरह बातचीत करते हैं ?

उत्तर:  सेठ हीरामल आला अफसर तथा नेता से अच्छी तरह बात करता है

(छ) लेखक को सेठ हीरामल से बात करने के लिए किसका स्वाँग भरना पड़ा ?

उत्तर: लेखक को सेठ हीरामल से बात करने के लिए नेता का स्वाँग भरना पड़ा।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए:

क) हमारे समाज में किन-किन अवसरों पर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है ?

उत्तर: हमारे समाज में बच्चे के जन्म, बड़े-बुजुर्गों की मृत्यु, शादी-विवाह, जन्मदिन तथा अन्य त्योहारों पर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य धार्मिक-उत्सव, पार्टी गठबंधन, नौकरी मिलने तथा मुकदमा या चुनाव जीतने पर भी ऐसे आयोजन किए जाते हैं।

(ख) लेखक की पत्नी ने क्या सुझाव दिया ?

उत्तर: लेखक के यहाँ जब पहले पुत्र का जन्म हुआ तो उसके परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों ने भोज की पार्टी माँगी। लेखक ने अपनी पत्नी से मशविरा लिया तो उसने सुझाव दिया कि घर का पहला कुल- दीपक है। जन्मोत्सव तो मनाना ही पड़ेगा, उधार लेना पड़े तो ले लो।

(ग) लेखक के अनुसार बड़े लोग कहाँ-कहाँ पाए जाते हैं ?

 उत्तर: लेखक के अनुसार बड़े लोग पूजा में, बोर्ड की मीटिंग में अथवा किसी स्वामी के दरबार में पाए जाते हैं।

(घ) लेखक ने सेठ हीरामल के सामने क्या प्रस्ताव रखा ?

उत्तर: लेखक ने सेठ हीरामल के सामने अपने पुत्र के जन्मोत्सव की पार्टी का ‘स्पॉन्सर’ बनाने का प्रस्ताव रखा।

(ङ) लेखक अपनी किस युक्ति को ‘थ्री-इन-वन’ कहता है और क्यों ?

उत्तर: लेखक ने अपने पुत्र के जन्म समारोह को सेठ हीरामल जी से स्पॉन्सर कराना चाहता है। वे भोजस्थल पर ‘सेठ हीरामल के सौजन्य से’ की होर्डिंग लगाने को भी तैयार हैं। इस युक्ति को लेखक ‘थ्री-इन-वन’ कहता है क्योंकि इस एक कार्यक्रम से लेखक के तीन उद्देश्य पूरे हो जाएँगे। इससे उनकी पत्नी का अरमान, सेठ जी का दान और लेखक का कल्याण पूरा हो जाएगा।

(च) सेठ हीरामल किन शर्तों पर लेखक की मदद करना चाहते हैं ? 

उत्तर: सेठ हीरामल का सिद्धांत ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ का है। अर्थात् सेठ हीरामल लेखक की मदद इस शर्त पर करना चाहते हैं जो उनके लिए कार्य करे।

(छ) लेखक ने ‘हलुआ संस्कृति’ किसे कहा है ?

उत्तर: लेखक ने मुफ्त में खाना खिलाकर अपनी लोकप्रियता बटोरने को ‘हलुआ संस्कृति’ कहा है। यह संस्कृति एकदम से कंगाल अथवा समृद्ध लोगों को लाभ दिलाती है। कोई ऐसे ही मुफ्त में खाना नहीं खिलाता। वे दिल खोलकर खिलाते हैं लेकिन अपना काम निकालने अथवा नाम कमाने के लिए। लेखक भी इस प्रकार की संस्कृति अपनाना चाहते थे लेकिन असफल रहे।

(ज) लेखक को पुजारी के साथ हमदर्दी क्यों जतानी पड़ी ? 

उत्तर: किसी से उसके मन की बात निकालने या रहस्योद्घाटन करने के लिए “उसकी दुखती रगों को दबाना पड़ता है। लेखक सेठ हीरामल से मिलकर अपना काम निकालना चाहते थे और पुजारी सेठ जी के स्वभाव एवं उसकी गतिविधियों से पूरा वाकिफ थे। लेखक को सेठ हीरामल की पूरी जानकारी केवल पुजारी ही दे सकता था। इसलिए लेखक को पुजारी के साथ हमदर्दी जतानी पड़ी।

(झ) पुजारी ने सेठ हीरामल की किन-किन चारित्रिक विशेषताओं का बखान किया ?

उत्तर: पुजारी ने सेठ हीरामल की चारित्रिक विशेषताएँ बताते हुए कहा कि

  1. सेठ हीरामल केवल नाम का ही हीरा है।
  2. वह सबसे बड़ा कंजूस आदमी है।
  3. उसके पास अथाह हीरे हैं।
  4. सेठ हीरामल सिर्फ बड़े अफसरों अथवा नेताओं से ही बात करता है।
  5. उसका सिद्धांत ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ का है। 
  6. अर्थात् हीरामल अपने नाम के लिए मुफ्त का भोज देता है।

(ञ) लेखक ने चवन्नी मानसिकता का नमूना किसे कहा है और क्यों ? 

उत्तर:  उधार लेकर मौज करना हिंदुस्तानियों की आदत बन गई है। हमारी साँस और जिंदगी दोनों उधार से चलती है। यदि उधार लेकर बच्चे का जन्मोत्सव मनाया जाए तो उसमें हो-हल्ला मचाने की आवश्यकता नहीं है। इतने बड़े देश में पचास-साठ करोड़ के छोटे-मोटे घोटाले से देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। औसतन प्रति व्यक्ति चवन्नी-अठन्नी भी नहीं पड़ती। ऐसी मानसिकता को लेखक चवन्नी मानसिकता का नमूना कहा है।

GROUP-A पद्य खंड

Sl. NO.पाठ के नामLink
पाठ 1पदClick Here
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पाठ 3ब्रज की संध्याClick Here
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गद्य खंड

पाठ 6पंच परमेश्वरClick Here
पाठ 7खाने खिलाने का
राष्ट्रीय शौक
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GROUP-B: पद्य खंड

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गद्य खंड

पाठ 15वे भूले नहीं जा सकतेClick Here
पाठ 16पिपलांत्री : एक आदर्श गाँवClick Here

वैचित्र्यमय असम

4. निम्नलिखित प्रश्नों के सम्यक् उत्तर दीजिए :

(क) लेखक ने सेठ हीरामल से मिलने के लिए क्या-क्या प्रयास किए ? उनके प्रयास असफल कैसे हो गए ?

उत्तर: लेखक ने सेठ हीरामल से मिलने के लिए छह-सात बार दूरभाष पर पकड़ने का प्रयास किया लेकिन हर बार उनके निजी सहायकों ने लेखक को उनसे मिलने से रोक दिया। फिर लेखक ने टेलीफोन डायरेक्टरी से हीरामल जी की कंपनी के महाप्रबंधक श्यामलाल जी का नंबर डायल किया तो श्मशान से उत्तर आया। इस पर भी लेखक ने हिम्मत नहीं हारी और हीरामल जी के । मंदिर के पुजारी से हीरामल जी से मिलने का उपाय खोजा और लेखक पुजारी से सेठ जी की आदतें जानकर नेता बनकर उनसे मिले।

(ख) ‘उनका हलुआ-हमाम सिर्फ खालिस और असली नंगों के लिए है।’ – इस कथन में ‘असली नंगे’ किसे कहा गया है और क्यों ? 

उत्तर: सेठ या नेता किसी को मुफ्त में यों ही नहीं खिलाते। वे या तो नाम के लिए खिलाते हैं अथवा काम निकालने के लिए। इस तरह की इफरात या मुफ्त का खाना समाज के असली नंगों के लिए ही होता है। ये असली नंगे समाज के वैसे लोगों के लिए होता है जो वास्तव में गरीब या कंगाल होते हैं। दूसरी ओर इस प्रकार की मुफ्त सुविधाओं का लाभ बड़े-बड़े अफसरों अथवा सुविधा संपन्न लोगों के लिए भी होता है। समाज के तीसरे वर्ग अर्थात् मध्यमवर्ग के लिए इन सुविधाओं का कोई लाभ नहीं मिलता।

(ग) ‘इस पाठ में एक ओर मध्यमवर्गीय मानसिकता को उभारा गया है, तो दूसरी ओर आज की भ्रष्ट राजनीति पर करारी चोट की गई है। इस बात से क्या आप सहमत हैं? यदि हाँ तो अपना विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर: प्रायः हर समाज तीन वर्गों में बँटा होता है- उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग। उच्च वर्ग समाज का सबसे सुविधा संपन्न पूँजीपति वर्ग होता है तो सुविधा-विहीन भूखा, नंगा, कंगाल समाज का तीसरा वर्ग होता है। मध्यम वर्ग बीच का वर्ग है, जिसे अधिक सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं। सेठ-साहुकार की मुफ्त में खिलाने की योजना मध्यम वर्ग वालों के लिए नहीं। है। मध्यम वर्ग अपनी हैसियत के मुताबिक खाने-खिलाने का शौक रखते हैं। इस कार्य में उन्हें कर्ज में भी डूबना पड़ता है। मध्यम वर्ग उधार लेकर समारोह करेंगे तो देश से जुड़ेंगे। मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ।

(घ) आज की उधार की राष्ट्रनीति से क्या तात्पर्य है ? उधार लेकर समारोह करने को उचित ठहराने के लिए लेखक क्या-क्या तर्क देता है ?

उत्तर: उधार लेकर उत्सव समारोह करना भी एक प्रकार की देशभक्ति है। आज समाज का मध्यम (बीच का) वर्ग आर्थिक तंगी से गुजर रहा है। वह भूखे नंगों जैसा मुफ्त का हलुआ-पूड़ी नहीं खा सकता। मध्यम वर्ग उत्सव समारोह करने में भी सक्षम नहीं है इसलिए वह उधार लेकर ऐसे आयोजन करता है। लेखक की नजर में उधार लेकर समारोह करने से हम देश और समाज से जुड़ेंगे। बहुत-से देशवासी उधार लेकर गगनचुंबी महलों में रहते हैं। वे बड़े शान से चमचमाती कारों और हवाई जहाजों में घूमते हैं। लोगों की साँस और जिंदगी उधार की है। यदि हम भी ऐसा करते हैं तो गलत क्या है।

(ङ) ‘हम उधार लेकर समारोह करेंगे तो देश से जुड़ेंगे।’ लेखक ऐसा सोचकर खुश क्यों होता है ? 

उत्तर: लेखक ऐसा सोचकर खुश इसलिए होता है आज देश का हर वर्ग उधार लेकर काम चला रहा है। उनमें उधार लेने की होड़ मची है। देशवासी उधार लेकर ऊँचे-ऊँचे महलों में रह रहे हैं और चमचमाती कारों में घूम रहे हैं तथा हवाई जाहजों में सफर कर रहे हैं। उधार लेना हमारी संस्कृति बन गई है। प्रत्येक भारतीय पर पन्द्रह-बीस हजार का कर्ज चढ़ गया है फिर भी सीना तानकर घूम रहे हैं। हम

5. आशय स्पष्ट कीजिए

(क) इसमें ऐसे-ऐसे नंबर होते हैं, जो हवाला की मशहूर डायरी-सा सिर्फ सच का संकेत भर देते हैं।

उत्तर: ये पंक्तियाँ ‘खाने-खिलाने का राष्ट्रीय शौक’ नामक व्यंग्य लेख की हैं। इसके लेखक गोपाल चतुर्वेदी हैं। इसमें लेखक द्वारा टेलीफोन डायरेक्टरी की विशेषताएँ बताई गई है।

इन पंक्तियों का आशय यह है कि सेठ हीरामल से मिलने में असफल होने के बाद लेखक ने टेलीफोन डायरेक्टरी का सहारा लिया। इसमें ऐसे-ऐसे नंबर होते हैं जिससे सिर्फ लोगों के नामों की जानकारी होती है। हवाला कांड में जिस प्रकार एक डायरी में डी.के., पी.के., एल. के. जैसे संकेत लिखे हुए थे ठीक उसी प्रकार टेलीफोन डायरेक्टरी में लोगों के नाम के संकेत होते हैं।

(ख) हमारा खाना खिलाना विवशता का एक ऐसा दुश्चक्र है, जो सिर्फ उधार से चलता है।

उत्तर: ये पंक्तियाँ ‘ खाने-खिलाने का राष्ट्रीय शौक’ नामक पाठ की हैं। इसके लेखक गोपाल चतुर्वेदी हैं। इसमें लेखक ने यह बताया है कि मध्यम वर्ग के लोगों की यह औकात नहीं होती कि वे अपने पैसे से समारोह करें। वे खाने-खिलाने का समारोह उधार लेकर करते हैं।

आशय यह है कि मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होती, जिससे वे खाने-खिलाने का समारोह आयोजित कर सकें। इस कार्य के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है। यदि वे जन्मदिन का समारोह नहीं आयोजित करेंगे तो समाज में उनकी बदनामी होगी। इसलिए वे विवश होकर उधार लेकर ऐसा आयोजन करते हैं।

(ग) हमारी बाजारू साख हमारी अमीरी का सबूत है।

उत्तर: यह पंक्ति ‘खाने-खिलाने का राष्ट्रीय शौक’ नामक व्यंग्य लेख की है। इसके लेखक गोपाल चतुर्वेदी हैं। इस पंक्ति का आशय यह है कि हम भारत के लोग कर्ज लेकर शान की जिंदगी बिता रहे हैं। उधार लेकर समारोह कर रहे हैं। कर्ज लेकर चमचमाती कारों में घूमते हैं। ऊँची इमारतों में रह रहे हैं। बनावटी साख हमारी अगीरी दर्शा रही है। लगता है कि हम कर्ज लेकर अमीर बन गए हैं।

(घ) पैसा पै♥से को खींचता है और हलुआ हलुए को ।

उत्तर: यह पंक्ति ‘खाने खिलाने का राष्ट्रीय शौक’ नामक व्यंग्य लेख से ली गई है। इसके लेखक गोपाल चतुर्वेदी हैं। इस पंक्ति का आशय यह है कि आज समाज में जिसके पास दौलत है, वही • दौलत कमा रहा है। जिसके पास खाने पीने के भरपूर साधन हैं, उसी के पास विलासिता की चीजें पहुंच रही हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अमीर और भी अमीर बनते जा रहे हैं और बाकी लोगों की स्थिति ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। सेठ हीरामल जैसे पूँजीपति लाख रुपये खर्च करके करोड़ों कमा रहे हैं और सुविधा संपन्न लोगों को ही सारी सुविधाएँ मिल रही हैं।

6. किसने, किससे और किस प्रसंग में कहा है ?

(क) घर का पहला कुल- दीपक है। कुछ तो करना ही पड़ेगा।

उत्तर: लेखक की पत्नी ने लेखक से उस समय कहा जब उनके पहले पुत्र के जन्म के अवसर पर उनके मित्र सामूहिक भोज खिलाने को कह रहे थे।

(ख) बेकारी भुगतने से तो पुजारी होना बेहतर है।

उत्तर: लेखक ने पुजारी से उस समय कहा जब लेखक पुजारी से सेठ हीरामल से मिलने की बात कर रहे थे।

(ग) हम आपको चौबे जन्म-समारोह का ‘स्पॉन्सर’ बनाएँगे ।

उत्तर: यह लेखक ने सेठ हीरामल से उस समय कहा जब लेखक सेठ हीरामल से मिलकर अपने पुत्र जन्म के समारोह को सेठ जी से प्रायोजित कराने की बात कर रहे थे।

(घ) हमारा फलसफ़ा ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ का है।

उत्तर: यह बात सेठ हीरामल ने लेखक से कही जब सेठ हीरामल लेखक की बातों को अनसुना करके जा रहे थे।

भाषा एवं व्याकरण

1. पाठ में आए इन मुहावरों का अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग कीजिए: कन्नी काटना, कमर कसना, सिक्का जमाना, धता बताना, स्वर्ग सिधारना, मुरीद बनाना, सीधे मुँह बात, बगुला भगत

उत्तर: कन्नी काटना (बचकर निकलना) सेठ जी रमेश को उधार देने से कन्नी काटने लगे।

कमर कसना: (पक्का इरादा करना) भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए कमर कस लिया है। सिक्का जमाना: (प्रभुत्व स्थापित करना) महेश बाबू ने राजनीति में अपना सिक्का जमा लिया है।

धता बताना: (टाल देना या टरका देना) लेखक ने सेठ जी से मिलने की कई बार कोशिश की पर हर बार उनके सहायकों ने लेखक को धता बता दिया।

स्वर्ग सिधारना : (मृत्यु को प्राप्त हो जाना) सेठ रामलाल स्वर्ग सिधार गए।

मुरीद बनाना: (प्रशंसक बनाना) धर्म गुरु गरीबों को ही अपना मुरीद बनाते सीधे मुँह बात करना: (अच्छी तरह बात करना) नेताजी आम लोगों से सीधे मुँह बात नहीं करते ।

बगुला भगतः (कपटी व्यक्ति) देवी लाल से बचकर रहना वह बगुला भगत बनकर लोगों से मिलता है ।

2. निम्नलिखित अरबी / फारसी शब्दों के कुछ विशेष अक्षरों के नीचे नुक्ता लगाकर लिखने का अभ्यास कीजिए 

कफन, फजल, परहेज, फकीर, नजाकत, दफ्तर, हुक्म, जागीर, कागज,

ख्वाहिश, जेलखाना, इंतजाम, नाजुक, इजलास, तारीख, खामोश, गजल

  • कफन……….कफ़न
  • फजल………..फ़ज़ल
  • परहेज………..परहेज़
  • फकीर………. फ़कीर
  • नजाकत………नज़ाकत
  • दफ्तर………..दफ़्तर
  • हुक्म…………हुक्म
  • जागीर……….जागीर
  • कागज………काग़ज़
  • ख्वाहिश…….ख़्वाहिश
  • जेलखाना.…..ज़ेलख़ाना
  • इंतजाम……. इंतज़ाम
  • नाजुक……….नाजुक
  • इजलास………इजलास
  • तारीख………तारीख़
  • खामोश……..ख़ामोश
  • गजल………ग़ज़ल

3. पाठ में आए दस यौगिक शब्दों को लिखिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए:

सालगिरह, दानवीरता, भोजस्थल, शुभचिंतक, दूरभाष, टेलीफोन, नवयुवक, आसपास, गद्देदार, भागदौड़, कुरसीधारी, देशसेवक,

उत्तर: सालगिरह : आज मदन जी की 70वीं सालगिरह है।

दानवीरता : लोग सेठ जी की दानवीरता से प्रसन्न हुए। ATUS

भोजस्थल : दिल्ली के भोजस्थल पर अनेक लोग उपस्थित हुए।

शुभचिंतक : आप हमारे शुभचिंतक है।

दूरभाष : वे दूरभाष पर बातें कर रहे हैं।

टेलीफोन : मेरे घर में दो-दो टेलीफोन है।

नवयुवक : उस नवयुवक का नाम मोहन है।

आसपास             : घर के आसपास सफाई रखनी चाहिए। गद्देदार : सेठ जी गद्देदार सोफे पर बैठ गए।

भागदौड़ : आज की भागदौड़ में मैं भोजन नहीं कर पाया।

कुरसीधारी : कुरसीधारी लोग ही सारी सुविधाओं का लाभ लेते हैं।

देशसेवक :आशुतोष जी सच्चे देशसेवक हैं।

गगनचुंबी . ‘आजकल शहर में गगनचुंबी इमारतों की भरमार है।

4. नीचे दिए गए समस्त पदों का विग्रह करते हुए समास के नाम भी लिखिए :

यथाशक्ति, शाम-सबेरे, प्राणघातक, सत्संग, भलेमानस, देववाणी

 यथाशक्ति : शक्ति के अनुसार (अव्ययीभाव समास)

शाम-सबेरे : शाम और सुबह दोनों (द्वन्द्व समास)

प्राणघातक : प्राण का घातक (तत्पुरुष समास)

सत्संग : सत् अर्थात् सच्चे लोगों की संगत (तत्पुरुष समास)

भलेमानस : भला है जो मानस (कर्मधारय) देववाणी: देवताओं की वाणी (तत्पुरुष समास)

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