Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-3 डायरी के पन्ने 

Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-3 डायरी के पन्ने  | एचएस द्वितीय वर्ष के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न हिंदी प्रश्न उत्तर आपके लिए नवीनतम NCERT/AHSEC संकेतकों के अनुसार नवीनतम प्रश्न और समाधान लाता है। छात्र इन आवश्यक अध्याय प्रश्नों को सक्रिय करके प्रत्येक अध्याय के संबंध में अपने सभी संदेहों को दूर करेंगे और हमारे विशेषज्ञों द्वारा प्रदान की गई विस्तृत व्याख्याओं को विस्तृत करेंगे ताकि आपको उच्च सहायता मिल सके। ये प्रश्न छात्रों को समय की कमी के कारण परीक्षा के लिए अच्छी तैयारी करने में मदद कर सकते हैं। Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-3 डायरी के पन्ने 

HS Second Year Hindi (MIL) वितान Chapter-3 डायरी के पन्ने 

वितान

→ लेखिका परिचय ७०

ऐन फ्रैंक का जन्म 12 जून, 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में हुआ था। सन् 1433 के मार्च महीने में फ्रैंकफर्ट के नगर निगम चुनावों में हिटलर की नाजी पार्टी के जीत के तुरंत बाद जब यहाँ यहूदी विरोधी प्रदर्शनों ने जोर पकड़ा, तब फ्रेंक परिवार ने अपने को असुरक्षित महसूस करते हुए धीरे-धीरे अपना बसेरा नीदरलैंड्स के एम्सटर्डम शहर में स्थानांतरित कर लिया 14 अगस्त, 1944 को किसी की दी हुई जानकारी के आधार पर गेस्टापो ने इस गोपनीय निवास पर छापा मारा, सभी लोग नाजियों के हत्थे चढ़ गए और उन्हें यहूदियों के लिए बने यातनागृहों में भेज दिया। और यहाँ सन् 1945 में फरवरी या मार्च महीने में उनकी मृत्यु हुई।

रचनाएँ: फेंक की डायरी दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी गई किताबों में से एक है। यह मूलत: डच भाषा में है। सन् 1952 में इस कृति को ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ नाम से अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित किया गया।

साराशं

एन फ्रैंक ने अपनी किट्टी नामक गुड़िया को संबोधित करते हुए अपनी बातें कहीं है। बुधवार, 8 जुलाई 1942

लेखिका गुड़िया को संबोधित करते हुए कहती है कि वे जीवित तो हैं, पर जैसे उनको दुनिया उलट-पुलट हो गई हैं। लेखिका किट्टी को बताती है, कि एक रविवार जब वह धूप में अलसायी पढ़ रही थी तभी मार्गोट आकर बताती उसके ए.एस.एस से बुलाए जाने का नोटिस मिला है। उनकी माँ मिस्टर वान दान से मिलने गई थी जो उनके पति के | बिजनेस पार्टनर हैं। माँ वहाँ यह पूछने जाती है, कब वे लोग गुप्त मकान में जाएंगे। वहाँ जाने वाले लोगों में कुल सात लोग है। लेखिका की बहन मार्गोट और वह अपना सामान

बेले में भरनी शुरू कर दी। मिस्टर वान दान भी अपनी पत्नी को लाने चले गये। मिएप अपने साथ सामान से भरा हुआ एक थैला भी लाई सारी चीजें उनके लिए अजनबी होती चली जा रही थी। मिएप लेखिका के पिता के कंपनी में सन् 1933 से काम रही थी, अत: उनसे मिएप और उनके पति की मित्रता थी। लेखिका जानती थी कि वह रात उनके अपने बिस्तर में आखिरी रात है। अगली सुबह ही उन्हें गुप्त स्थान के निकलना था। उन्होंने अपने बदन पर कपड़ों की कई तहें जमाए हुए थे क्योंकि साजो-सामान लेकर निकलना उन्हें संदेहास्पद बना देता। उन लोगों को पैदल जाना पड़ा क्योंकि यहूदियों को किसी सवारी पर चलना मना था। मार्गोट मिएप की निगरानी में अज्ञात जगह के लिए रवाना हो गई।

| गुरुवार 9 जुलाई 1942

लेखिका उनकी माँ और पिता कंधों पर बड़े-बड़े थैले और शॉपिंग बैग लिये बरसात में | भीगते आगे बढ़ रहे थे। यहुदि होने के कारण उन्हें सवारी लेने की भी मनाही थी। पिता ने बताया की उनके छिपने की जगह उनके ऑफिस की इमारत में ही थी। पिता के • ऑफिस में ज्यादा लोग नहीं थे। मिस्टर बोस्कुइल, वेप के पिता, दो और सहायकों को छोड़कर सभी को उनके वहां रहने की बात बता दी गई थी। ऑटो फेंक के दफ्तर के भवन में पिछवाड़े की दो मंजिले, जिन तक पहुँचने की सीढ़ी अलमारियों की एक कतार के पीछे छिपी थी। सीढ़ियों के ऊपर बनी जगह से दाई तरफ का दरवाजा घर के पिछवाड़े की तरफ उनकी गुप्त एनेक्सी है। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि मटमैले दरवाज़े के पीछे इतना कमरा भी हो सकता है। गुप्त घर में बहुत सारे कमरे थे। शुक्रवार, 10 जुलाई 1942

लेखिका अपनी गुड़िया किट्टी को संबोधित करती हुई करती हैं, 263 प्रिंसेनग्रास्ट में | उनके पहुंचते ही मिएस तुरंत उन्हें लंबे गलियारे से सीढ़ियों से ऊपर दूसरी मंजिल पर फिर एनेक्सी में ले आई। वहाँ बैठकखाना और अन्य कमरे सामानों से ठुसे पड़े थे। तिल धरने को भी जगह नहीं थी। लेखिका और पिता ने तुरंत ही सफाई का काम शुरू कर दिया। वैप और मिएप ने उनके राशन कूपनों से शॉपिंग किया। पिता ने ब्लैक आउट वाला पर्दा खिड़कियों में लगा दिया। दो तीन दिनों तक लेखिका सफाई के कामों में पूरी तरह से व्यस्त रही।

शनिवार, 28 नवंबर 1942 इन दिनों वो बिजली का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे थे, तथा राशन भी ज्यादा खर्च कर चुके थे। उसके बाद वे बिजली कट गई और चार बजते-बजते अंधेरा हो जाता था। तब समय गुजारने के लिए वे ऊल-जुलूल हरकते करते, व्यायाम करते, पहेलियाँ बुझाते थे। लेखिका ने वक्त गुजारने के लिए नया तरीका खोज निकाला था, वह था दूरबीन लगाकर पड़ोसियों के रोशनी वाले कमरों में झांकना उन्हें दिन भर पर्दे नहीं हटाने दिया जाता था, सिर्फ रात को ही वे पर्दा हटा सकते थे। मिस्टर डसेल की बाबा आदम के जमाने की कहानियाँ लेखिका को बहुत ही ऊबाउ लगती थी। अक्सर लेखिका उनकी डाँट फटकार और भाषणों की लंबी-लंबी ऊबाऊ श्रृंखला को अनसुनी कर देती। जिसकी शिकायत मिस्टर डसेल उनकी माता से कर देती लेखिका रात को बिस्तर पर पड़े हुए अपनी खामियों के बारे में सोचकर या तो हंसती या रो लेती थी। तब वह जो है, उससे अलग होना चाहती हैं।

शुक्रवार, 19 मार्च 1943

टर्की का इंग्लैंड के पक्ष में होने की खबर उनलोगों की खुशियों को निराशा में बदल देता हैं। हजार गिल्डर के नोट अवैध मुद्रा घोषित किये जा चुके थे। यह सब ब्लैक मार्केट का धंधा करने वाले लोगों के लिए तो झटका था। लेकिन उससे भी बड़ा संकट उन लोगों का है, जो या तो भूमिगत है, या जो अपने धन का हिसाब-किताब नहीं दे सकते। उन दिनों हिटलर घायल सैनिकों से बातचीत कर रहे थे। जो हो रहा था बहुत ही करुणाजनक था। सैनिक युद्ध कर अपने पर गर्व महसूस कर रहे थे। वे जख्मों को दिखाकर गर्व महसूस कर रहे थे।

शुक्रवार, 23 जनवरी 1944 लेखिका को परिवार के वंश वृक्षों और राजसी परिवारों की वंशावली तालिकाओं में खासी रूचि थी। यहीं नहीं वह ज्यादातर रविवार अपने प्रिय फिल्मी कलाकारों की तस्वीरें अलग करने और देखने में गुजारती है। मिस्टर कुलगर भी हर सोमवार को उनके लिए सिनेमा एंड थियेटर पत्रिका की प्रति लेते आते। वे किसी फिल्म का नाम सुनते हो मुख्य नायक और नायिकाओं के नाम तथा समीक्षाएं फर्राटे से बोलना शुरू कर देती। जब भी वह नया हेयर स्टाइल करती तो बाकी सभी चिढ़ाते कि किसी फिल्मस्टार की नकल हैं। और फिर उनके बाल पहले की तरह उलझे और घुँघराले हो जाते।

बुधवार, 28 जनवरी 1944 | लेखिका किट्टी को संबोधित करती हुई कहती है कि वह हमेशा उसे नाली के सड़ते पानी की तरह बासी खबरें ही देती है। जिसके लिए वह अपनी हालत बताते हुए कहती है कि उन्हें भी खाने के चक्त या तो मम्मी या मिसेज वान के अपनी बचपन की कहानियाँ बार चार सुनाती थी। यह फिर मिस्टर डिसेल की वहीं कहानियाँ जिन्हें कई बार सुना चुके थे।॥ 

बाकी लोगों को ये कहानियां बिल्कुल कंठस्थ हो गई थी। अब ताजा सुनने सुनाने को शायद कुछ बचा भी नहीं था। जॉन और मिस्टर क्लीमेन जानते थे कि सभी अपने जैसे अज्ञातवास लोगों के बारे में जानने को उत्सुक है, अतः वे वैसे ही बातें करते। उनलोगों के बारे जानकर ये भी खुशी मानाते जिन्हें कैद से छोड़ दिया गया है। उस समय कई प्रतिरोधी दल भी थे, जो अज्ञातवास में छिपे लोगों को वित्तीय सहायता करते। लेखिका उनलोगों के बारे में सोचती है, जिन्होंने इस स्थान तक आने में उनकी मदद की है। वे | रोजाना ऊपर आकर पुरुषों से कारोबार तथा स्त्रियों से राजनीति की बातें करते। उन दिनों हिल्वरसम ने नए राशनकार्ड जारी किये तथा रजिस्ट्रार ने उन अज्ञातवासियों से आग्रह किया है कि निर्धारित दिन आकर वे अपना राशन कार्ड ले जाएँ।

बुधवार, 29 मार्च 1944 | उस समय केबिनट मंत्री मिस्टर बोल्के स्टीन ने डच प्रसारण में युद्ध का वर्णन करने वाली डायरियों को संग्रह करने के लिए कहा। लेकिन लेखिका सोचती है कि युद्ध के दस साल बाद जब ये डायरी छपेगी तो लोग आश्चर्यचकित हो जायेंगे। वह किट्टी से कहती हैं कि भले ही उसने बहुत कुछ बता दिया है पर फिर भी यह बहुत ही न्यून है। वह बताती हैं कि पिछले रविवार को 350 ब्रिटिश वायुयानों ने जब इज्मुईडेन पर 550 | टन गोला-बारूद बरसाया तो उनका घर काँप गया। उन दिनों सब्जी के लिए लाइनों में खड़े होना पड़ता था। चोरी चकारी इतनी बढ़ चुकी थी कि डच लोगों में अंगूठी पहनने का रिवाज तक नहीं रह गया। छोटे-छोटे बच्चे भी लोगों के रिवाज तक नहीं रह गया। छोटे-छोटे बच्चे भी लोगों के घरों में घुस बेधड़क समान उठा ले जाते थे। डचों को नैतिकता अच्छी नहीं है। लोग भुख से बेहाल थे, पुरुषों को जर्मनी भेजा जा रहा था। ब्लैक मार्केट में जूते की कीमत बढ़ चुकी थी। लोग फटे कपड़े और पुराने जुते पहनते खाद्य कार्यालय, पुलिस अधिकारी भी या तो लोगों की मदद कर रहे थे या उन पर आरोप लगाकर उन्हें जेल भेज रहे थे। मंगलवार, 11 अप्रैल 1944

लेखिका कहती है कि वह शुक्रवार और शनिवार को मोनापोली खेल खेलती रही। रविवार दोपहर के वक्त लेखिका के कहने पर उनसे मिलने आया। सवा पाँच बजे दोनों ऊपर सामने वाली अटारी पर चले गये। जाते समय एक कुशन भी ले गयी थी जो मिस्टर | डिसेल का था। एक छोटी सी पेटी पर दोनों बैठे। पेटी छोटी होने के कारण दोनों सटे हुए थे। दोनों अटारी पर छ: बजे तक रहे। अचानक पीने नौ बजे मिस्टर वान दान को सीटी सुनाई दी। वे कुशन के बारे पूछ रहे थे, क्योंकि इधर मिस्टर डसेल कुशन न मिलने

पर बबाल मचा रहे थे। क्योंकि उन्हें डर था कि उस पर पिस्सु न चिपक जाये। करीब साढ़े नौ बजे पीटर पिता को ऊपर बुलाया। उस वक्त गोदाम बिल्कुल शांत हो चुका था। दस बजे सीढ़ियों पर कदमों की आवाजें आई मिस्टर वान दान सभी बत्तियाँ बंद करने को कहा। मर्द लोग वापस नीचे चले गये। सीढ़ियों के बीच वाले दरवाजे पर ताला लगा दिया गया। उसी समय धमाके की आवाज सुनाई दी। बाहर सेंधामार थे, जो मिस्टर वान दान पुलिस कहते हो भाग चुके थे। फिर उन सेंधमारे ने झुट्टा नीच गिरा दिया। लेकिन अंत में उन सेंधमारों को वहाँ से हारकर भागना पड़ा।

मंगलवार, 13 जून 1944

आज के दिन लेखिका का जन्मदिन है वह पंद्रह वर्ष की हो चुकी है। जन्मदिन पर उन्हें कार्की तोहफे मिले। पीटर ने पीओनी के फूलों का खूबसूरत गुलदस्ता उसे उपहार में दिया। चर्चिल उन गांवों में जैसे स्मट्स, आइजनहावर तथा आमोल्ड उन फ्रांसीसी गांवों में गए जिन पर ब्रिटिशों का कब्जा किया और बाद में छोड़ दिया। चर्चिल जन्मजात बहादूर था। ब्रिटिशों ने पूरी तरह से कमर कस ली थी। लेखिका कहती है कि उनके दिमाग में हमेशा इच्छाएँ, विचार, आरोप तथा डाँट फटकार ही चक्कर खाते है। उन पर – आरोपों की बौछार करने वाले दो लोग हैं – मिसेज वान-दान और इसेल। वह कहती है कि उनके व्यक्तित्व के साथ सबसे मुश्किल यह है कि वह अपने आपको को सबसे ज्यादा धिक्कारती हैं। कभी कभी वे स्वयं को इतनी प्रताड़ित करने लगती है कि सान्तवना के बोल सनने के लिए तरस जाती है। वह कहती है कि पीटर उन्हें प्यार करता है एक दोस्त की तरह उसका यह स्नेह दिन व दिन बढ़ता ही जाता हैं, परंतु एक रहस्यमयी शक्ति दोनों को पीछे खींच देती है। दोनों में प्यार होने के बावजूद भी लेखिका की पीटर को धर्म के प्रति नफरत, खाने की पसंद आदि और कई बातें बिल्कुल नापसंद है। पीटर शांतिप्रिय, सहनशील, सहज आत्मीय व्यक्ति है। लेखिका और पीटर अक्सर | अपने भविष्य, वर्तमान और अतीत की बातें करते हैं। लेखिका नीला आसमान, पक्षियों की चहचहाने को आवाज चांदनी और खिलती कलियों का स्मरण करती है। प्रकृति प्रेमी होने पर भी खिड़की खोल बाहर प्रकृति देखने की जोखिम नहीं ले सकती। कई | महीनों बाद एक मौका मिला था। उस रात वह ऊपर मंजिले पर थी और खिड़की खुली थी। वह रसोई और प्राइवेट ऑफिस की खिड़की से प्रकृति के नजारे देखती रही। प्रकृति लेखिका को शांति और आशा को भावना से सराबोर कर देता था। लेखिका कहती है, शुरू से पुरुष महिलाओं पर शासन करता चला आ रहा है। परंतु अब स्थिति बदल चुकी है, अब शिक्षा, काम और प्रगति ने औरतों की आंखे खोली हैं। कई देशों में औरतों को

पुरुषों के बराबरी का हक दिया जाता है। अब महिलाएं पूरी तरह से स्वतंत्र होने का हक चाहती है। मौत के खिलाफ मनुष्य नामक किताब में लेखिका ने पढ़ा हैं कि युद्ध में लड़नेवाले वीर को जितनी तकलीफ, पीड़ा, बीमारी और यंत्रणा से गुजरना पड़ता हैं, उससे कहीं अधिक तकलीफें औरतों को बच्चे जन्म देते समय होती है। औरत ही मानव जाति की निरंतरता बनाये रखनेके लिए तकलीफों से गुजरती है। लेखिका उन लोगों पर भत्सर्ना करती है, जो यह बात मानने को तैयार नहीं कि समाज में औरतों का योगदान कितना महान और मुश्किल है। लेखिका का विश्वास है कि अगली सदी तक यह | मान्यता जरूर बदल जायेगी कि बच्चे पैदा करना औरतों का काम है। वो ज्यादा सम्मान और सराहना की हकदार बनेंगी।

आरोहो : काव्य खंड

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आरोहो : गद्य खंड

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वितान

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प्रश्नोत्तर

1. यह साठ लाख लोगों की तरफ से बोलनेवाली एक आवाज है। एक ऐसी आवाज, जो किसी संत या कवि की नहीं, बल्कि एक साधारण लड़की है। इल्या इहरनबुर्ग की इस टिप्पणी के संदर्भ में ऐन फ्रैंक की डायरी के पठित अंशों पर विचार करें।

उत्तर: इल्या इहरनवुर्ग ने टिप्पणी की है कि यह साठ लाख लोगों की तरफ से बोलनेवाली एक साधारण लड़की की आवाज हैं। एन फ्रैंक को यह डायरी इतिहास के एक सबसे आतंकप्रद और दर्दनाक अध्याय के साक्षात अनुभव का बयान करती है। यहां हम उस भयावह दौर को किसी इतिहासकार की निगाह से नहीं बल्कि सीधे भोक्ता की निगाह से देखते है। इस डायरी में लेखिका के माध्यम से उन साठ हजार लोगों का भय, आतंक, भूख, प्यार, मानवीय संवेदनाएँ, हवाई हमले का डर, पकड़े जाने का लगातार डर को व्यक्त किया गया है। यह डायरी यहूदियों पर ढाए गए जुल्मों का एक जीवंत दस्तावेज है।

2. काश, कोई तो होता जो मेरी भावनाओं को गंभीरता से समझ पाता। अफसोस, ऐसा व्यक्ति मुझे अब तक नहीं मिला… । क्या आपको लगता है कि ऐन के इस कथन में उसके डायरी लेखन का कारण छिपा हैं ?

उत्तर : ऐन अकेलापन महसूस करती थी। उसके व्यक्तित्व के साथ सबसे मुश्किल बात यह है कि वह किसी भी ओर की तुलना में अपने आप को धिक्काती है। ऊपर से माँ के उपदेशों की पोटली भी बड़ी भारी हो जाती तब ऐन उससे ऊबकर मुक्ति की चाह कर  बैठती। कई बार तो ऐन अपने आपको प्रताड़ित करने लगती और सान्तवना के दो बोल सुनने को तरस जाती। ऐन अपनी भावनाओं को, अपनी संवेदनाओं को किट्टी नामक गुड़ियाँ को संबोधित करती हुई डायरी लिखती है।

3. प्रकृति प्रदत्त प्रजनन शक्ति के उपयोग का अधिकार बच्चे पैदा करें या न करें अथवा कितने बच्चे पैदा करें इस की स्वतंत्रता स्त्री से छीन कर हमारी विश्व व्यवस्था ने न सिर्फ स्त्री को व्यक्तित्व विकास के अनेक अवसरों से वंचित किया है, बल्कि जनाधिक्य की समस्या भी पैदा की है।

ऐन की डायरी के 13 जून, 1944 के अंश में व्यक्त विचारों के संदर्भों में इस कथन का औचित्य ढूंढें।

उत्तर: स्त्री ही मानव जाति की निरंतरता को बनाये रखने के लिए कई तकलीफों से गुजरती है संघर्ष करती है। “मौत के खिलाफ मनुष्य” नामक किताब में कहा गया है कि युद्ध में लड़ने वाले वीर को जितनी तकलीफ पीड़ा, बीमारी और यंत्रणा से गुजराना पड़ता हैं, उससे कहीं ज्यादा तकलीफ स्त्री को बच्चे जन्म देते समय होता है। वह अधिक मजबूत और बहादूर सिपाहियों से भी ज्यादा मेहनत करके खटती हैं। अतः प्रकृति प्रदत्त प्रजनन शक्ति के उपयोग का अधिकार स्त्री को ही होना चाहिए। इससे स्त्री के व्यक्तित्व का विकास तो होगा ही साथ ही जनाधिक्य की समस्या भी नहीं होगी।

5. ऐन की डायरी अगर एक ऐतिहासिक दौर का जीवंत दस्तावेज है, तो साथ ही उसके निजी सुख दुख और भावनात्मक उथल-पुथल का भी। इन पृष्ठों में दोनों का फर्क मिट गया है। इस कथन पर विचार करते हुए अपनी सहमति या असहमति तर्कपूर्वक व्यक्त करें।

उत्तर: जहां एक ओर देन उस समय का जीवंत दस्तावेज अपनी डायरी में लिखा वहाँ में से उसने अपने निजी सुख-दुख और भावनाओं का भा वर्णन किया है। इस डायरी में ऐन ने अपने भय, आतंक, भूख, प्यार, मानवीय संवेदनाएँ, प्रेम, घृणा, बढ़ती उम्र की तकलीफें, हवाई हमले के डर, पकड़े जाने का लगातार डर, तेरह साल की उम्र के सपने, मानसिक परिवा और शारीरिक जरूरतें, हँसी-मजाक, युद्ध की पीड़ा, अपना अकेलापन सभी को एक लिखीत रूप दिया है।

6. ऐन ने अपनी डायरी ‘किट्टी’ (एक निर्जीव गुड़िया) को संबोधित चिट्टी की शुक्ल में लिखने की जरूरत क्यों महसूस की होगी ?

उत्तर : ऐन को हमेशा एक शिकायत थी, कि उसे समझने वाला कोई नहीं था। वह एक ऐसे व्यक्ति की तलाश में थी, जो उसको संवेदनाओं, भावनाओं को समझ सके। शायद ऐन 160ने किंट्टी को अपनी बातें व्यक्त करने का जरिया बना लिया था। यहाँ कारण हैं, कि वह अपनी डायरी में किट्टी को सम्बोधित कर अपनी बातें कही हैं।

7. ऐन फ्रैंक का डायरी पहली बार कब प्रकाशित हुई ?

उत्तर: ऐन फ्रैंक की डायरी पहली बार सन् 1947 में प्रकाशित हुई। यह मूलता डच भाषा में थी।

8. ऐन फ्रैंक का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?

उत्तर: ऐन फ्रैंक का जन्म १२ जून सन् १९२९ ई० में जर्मनी के फ्रैंक फेंट शहर में हुआ। 

9. ऐन फ्रैंक और उसके परिवार को अज्ञात स्थान में क्यों छिपना पड़ा ?

उत्तर: सन् 1933 के मार्च महिने में फ्रैंकफर्ट के नगर निगम चुनावों में हिटलर की नाजी पार्टी की जीत के तुरंत बाद जब वहाँ यहूदी-विरोधी प्रर्दशनों ने जोर पकड़ा, तब फ्रैंक परिवार ने अपने को असुरक्षित महसुस किया और अज्ञात स्थान पर छिपने चले गये।

10. ‘सेट्रल ऑफिस फॉॉर ज्यूडश इम्मीग्रेशन’ से किसके लिए बुलावा आया था ? 

उत्तर: सेट्रल ऑफिस फॉर ज्यूइश इम्मीग्रेशन की तरफ से मार्गोट को बुलावा आया

11. मार्गोट कौन थी ?

उत्तर: मार्गोट ऐन की बड़ी बहन थी।

12. मिस्टर वान दान कौन थे ?

उत्तर: मिस्टर बान दान ऐन के पिता के विजनेस पार्टनर थे। 

13. मिएप कौन थी ?

उत्तर: मिएप ऐन के पिता की कम्पनी में काम रही थी, और वह उनके करीबी दोस्तों वहीं में से थी।

14. ऐन और उनके परिवार वाले को क्यों पैदल सफर करना पड़ रहा था? नीर्फे, 

उत्तर: उन दिनों यहूदियों को किसी सवारी पर चलने की मनाही थी। ऐन और उसका सिक परिवार यूहदि होने के कारण सवारी नहीं पा रहे थे।

15. यतनागृहों में कैद यहूदियों को कब यातना गृह से छुड़ाया गया ? 

उत्तर : महायुद्ध में जब मित्र राष्ट्रो के हाथ जर्मनी की पराजय हुई तब अप्रैल 1945 में कीदियों की यातना गृह से आजाद कराया गया।

16. एन फ्रैंक ने किसे सम्बोधित करते हुए डायरी लिखा है ?

उत्तर : ऐन फ्रैंक ने किट्टो नामक निर्जीव गुड़िया को सम्बोधित करते हुए डायरी लिखा

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