Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-1 सिल्वर वैडिंग

Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-1 सिल्वर वैडिंग | एचएस द्वितीय वर्ष के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न हिंदी प्रश्न उत्तर आपके लिए नवीनतम NCERT/AHSEC संकेतकों के अनुसार नवीनतम प्रश्न और समाधान लाता है। छात्र इन आवश्यक अध्याय प्रश्नों को सक्रिय करके प्रत्येक अध्याय के संबंध में अपने सभी संदेहों को दूर करेंगे और हमारे विशेषज्ञों द्वारा प्रदान की गई विस्तृत व्याख्याओं को विस्तृत करेंगे ताकि आपको उच्च सहायता मिल सके। ये प्रश्न छात्रों को समय की कमी के कारण परीक्षा के लिए अच्छी तैयारी करने में मदद कर सकते हैं। Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-1 सिल्वर वैडिंग

Class 12 Hindi (MIL) वितान Chapter-1 सिल्वर वैडिंग

वितान

● लेखक परिचय

● मनोहर श्याम जोशी 

मनोहर श्याम जोशी का जन्म सन् 1935, कुमाऊँ में हुआ था। ये हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार और टेलीविजन धारावाहिक लेखक रहे है। इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। मनोहर श्याम जोशी साप्ताहिक हिंदुस्तान में संपादक के रूप में तथा दिनमान पत्रिका में सहायक संपादक के रूप में कार्य किया। सन् 1984 ई. में भारतीय दूरदर्शन के प्रथम धारावाहिक “हम लोग” के लिए कथा-पटकथा लेखन शुरू किया परंतु बाद में उन्होंने स्वतंत्र लेखन किया। इनका निधन सन् 2006 ई. दिल्ली में हुआ।

प्रमुख रचनाएं :

कहानी संग्रह: कुरु कुरु स्वाहा, कसप, हरिया, हरक्यूलीज की हैरानी, हमजाद, क्याप ‘क्याप’ कहानी के लिए जोशी जी को सन् 2005 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

व्यंग्य संग्रह एक दुर्लभ व्यक्तित्व, कैसे किस्सागों, मंदिर घाट की पौड़ियां, प्रोफेसर षष्ठी वल्लभ पंत, नेताजी कहिन, इस देश का यारों क्या कहना। साक्षात्कार लेख संग्रह बातों-बातों में, इक्कीसवीं सदी। टाटा

टेलीविजन धारावाहिक: हम लोग, बुनियाद, मुंगेरी लाल के हसीन सपने। संस्मरण-संग्रह लखनऊ मेरा लखनऊ, पश्चिमी जर्मनी पर एक उड़ती नज़र उपन्यास : कुरु कुरु स्वाहा, कसप ।

जोशी जी के दोनों उपन्यास हिंदी उपन्यासों की परम्परा से हटकर एक भिन्न धरातल पर खड़े हैं। जोशी जी इसे ‘गप्प बाइस्कोप’ कहते हैं। जोशी जी को अपने उपन्यास का रूप तीसरी दुनिया से मिला जिसे कार्पेतियर ‘जादुई यथार्थवाद’ कहता हैं। जोशी जी ने प्रेरणा तो ‘जादुई यथार्थवाद’ से ली, लेकिन उसे अपने देश की परम्परा में खोजा।

यशोधर पंत जी जो इस कहानी का नायक हैं, अपनी मेज पर आखिरी फाइल का लाल फीता बांधकर अपनी निगाह दफ्तर की पुरानीघड़ी की तरफ दौड़ाते है, जिसमें पांच बजकर पच्चीस मिनट बज रहे थे। उसके बाद उन्होंने अपने मातहतों की ओर देखा जो उनके कारण दफ्तर में बैठे रहते हैं। यशोधर पंतकी यह खासियत थी कि चलते चलते वे अपने जुनियरों से मनोरंजक बात कर लेते थे। यह परम्परा उन्हें कृष्णानंद पांडे से मिली थी। रोटी की तलाश में आये यशोधर पंत को किशनदा ने अपने क्वार्टर में शरण दी। यशोधर जब दिल्ली आये तो कम उम्र के कारण किसी सरकारी नौकरी में नहीं लगाये जा सकते। तब किशनदाने उन्हें मैस का रसोइया बनाकर रख लिया। इतना ही नहीं उन्होंने आर्थिक मदद भी की। बाद में उन्होंने ही अपने नीचे नौकरी दिलवायी तथा हमेशा मार्ग दर्शन किया।

हर दिन की तरह उस दिन भी यशोधर पंत ने अपने सहकर्मियों से मजाक किया। बातों का सिलसिला जारी था, तभी मेनन ने उनकी शादी के बारे में पूछा। पंत जी ने जब बताया की उनकी शादी 6 फरवरी, 1947 को हुआ था तब मेनन बहुत ही चहकर बताता हैं कि आज उनका सिल्वर वैडिंग है। यानी आज के दिन उनकी शादी के पच्चीस साल पूरे हो गये। पंत जी को वैडिंग एनिवर्सरी वगैरह साहबों के चोंचले लगते हैं। इसीलिए चड्ढा के कहने पर पंतजी चाय के पैसे दे देते हैं, परंतु स्वयं चाय के अस्वीकृति प्रदान करते है। उनका मानना हैं जो हमारी चीज या परम्परा नहीं है उसे इनसिस्ट करना समहाठ इंप्रॉपर सा लगता है।

पंत जी पहले दफ्तर साइकिल पर आते थे। परंतु उनके बच्चे आधुनिक युवा हो चले है और उन्हें अपने पिता का साइकिल सवार होना सख्त नागवार गुजरता है। वे पिता से स्कूटर लेने की बात करते हैं। लेकिन पंतजी को स्कूटर निहायत ही बेहूदा सवारी मालूम होती है। और कार वे अफोर्ड नहीं कर सकते तो उसके बारे में सोचना ही बेकार है। | यशोधर बाबू दफ्तर से निकल रोज बिड़ला मंदिर जाते प्रवचन सुनने। यह बात उनके पत्नी और बच्चों को अखरती थी। मंदिर से निकलकर घर के लिए साग-सब्जी खरीद लाते, किसी से मिलना-मिलाना भी इसी समय कर लेते थे। भले ही दफ्तर से पांच बजे

छूटते परंतु घर पहुंचते आठ बज जाते थे। उस दिन मंदिर से आते हुए उनकी निगाह उस जगह पर पड़ी जहाँ पहले किशनदा का

तीन बैडरूम वाला क्वार्टर हुआ करता था। डी.आई. जैड एरिया के इस बदलती शक्त को देखकर उन्हें बुरा सा लगता है। गोल मार्केट से उन्हें इतना लगाव था कि कई बार पद की गरिमा के अनुरूप डी-2 टाइप क्वार्टर मिलने के अवसर ठुकरा दिया। यशोधर बाबू का अपने घर देर से पहुँचने का असली कारण तो यह था कि अक्सर घरवालों से उनका मतभेद हो जाता था। उनका बड़ा लड़का प्रमुख विज्ञापन संस्था में नौकरी करता था। अक्सर उन्हें अपने बेटा को असाधारण वेतन मिलना अजीब लगता था। अपने रिटायरमेंट के समय मिला पैसा बेटा का शुरुआत में पा जाना उन्हें पेंच लगता है। दूसरी तरफ यशोधर बाबू का दूसरा लड़का आई.ए.एस की तैयारी कर रहा है, तीसरा बेटा स्कालरशिप लेकर अमरीका चला गया। उनकी एक बेटी भी थी। जहां एक ओर यशोधर अपने बच्चों की तरक्की से खुश थे, वहाँ उन्हें यह भी अनुभव हो रहा था कि वह खुशहाली भी कैसी जो अपनों में परायापन पैदा करें।

यशोधर बाबू की पत्नी भी उनकी जगह बच्चों की तरफदारी करती थी। उन्हें शिकायत थी कि संयुक्त परिवार के दौर में पति ने उनका साथ नहीं दिया। पहले यशोधर बाबू के साथ उनके ताऊ तथा उनके दो विवाहित बेटे भी रहते थे। पत्नी को इस बात की शिकायत थी, कम उम्र में उन्हें संस्कारों के कारण बुढ़िया बनकर रहना पड़ा। अब उन्होंने पति से साफ-साफ कह दिया था कि ये बातें उसी हद तक मानेंगी जितनी सुभीता होगी। कभी-कभी यशोधर बाबू को लगता है, कि वे शादी नहीं करते तो बेटर होता और लाइफ कम्यूनिटी के लिए डेडीकेट’ कर पाते। साथ ही उन्हें इस बात का भी ध्यान होता हैं, कि किशनदा का अंतिम समय सुखी नहीं रहा। नौकरी के दौरान उन्होंने घर तक नहीं बनाया और रिटायर होने पर गाँव वापस चले जाना पड़ा। मित्रों ने जो कभी उनसे मदद लिया करते थे, उन्होंने भी अपने साथ रहने का प्रस्ताव नहीं दिया। यहां तक की स्वयं यशोधर बाबू ने उन्हें अपने यहां रहने को नहीं कहा। अकेलेपन के कारण वे रिटायर के बाद ज्यादा दिन तक नहीं रह पाये। यशोधर बाबू को मकान बनाने के मामले में किशनदा की उक्ति ही सही लगती। उनका मानना था कि मुर्ख लोग ही मकान बनाते है, सयाने उनमें रहते हैं। नौकरी के दौरान क्वार्टर और उसके बाद पुश्तैनी घर। लेकिन यशोधर का पुश्तैनी घर जाकर बसना मरम्मत की जिम्मेदारी ओढ़ना और बेकार के झगड़े मोल लेना था। पत्नी द्वारा भविष्य का प्रश्न उठाए जाने पर अक्सर वे हँस कर बात को टाल देते थे। यशोधर बाबू मंदिर में बैठे प्रवचन तो सुन रहे थे, परंतु उनका मन नहीं लग रहा था। यशोधर बाबू ज्यादा धार्मिक अथवा कर्मकांडी नहीं हैं। परंतु किशनदा को तरह रोज

मंदिर जाना, संध्या पूजा और गीता प्रेस गोरखपुर की किताबें पढ़ने का यत्न कर रहे थे। | मानों आज भी किशनदा उनका मार्गदर्शन कर रहे थे। प्रवचन में जनार्दन शब्द सुनकर यशोधर बाबू को अपने जीजा जर्नादन की याद आ जाती है। जो बीमार हैं। यशोधर बाबू हर मौके पर रिश्तेदारों के यहाँ जाना जरूरी समझते हैं। वे सोचते हैं कि अहमदाबाद जाकर जीजा की खबर लेंगे परंतु उन्हें पता था यह बात सुन बच्चे क्रुद्ध हो जायेंगे। उनका बड़ा बेटा तो बुआ को पैसे भेजने से इनकार कर देता है। यशोधर बाबू बुआ को पैसा | इसलिए भेजते है, क्योंकि बुआ ने ही उन्हें अपने पास रखा।

| यशोधर बाबू के अनुसार उम्र के साथ आदमी में बुजुर्गित आना ठीक है। पत्नी का बगैर बह का ब्लाउज पहनना, ऊँची हील वाली सैंडल पहनना उन्हें ‘समहाउ इंप्रॉपर लगता। में एक था। वह कभी रोक-टोक नहीं करते और चाहते थे कि वे भी मर्जी से जो सके। फिर से यशोधर बाबू को किशनदा याद आ जाते हैं। कुते पजामें के ऊपर कनी गाठन पहने, सिर पर गोल विलायती टोपी और पांवों में देशी खड़ाऊँ धारण किए हुए और छड़ी ली हुई किशनदा की छवि उनके मन में बसी थी। किशनदा ने ही उन्हें ‘ अरली टू हाम बैड एड अरली टू राइज मेक्स ए मैन हल्दी एंड वाइज’ का मंत्र दिया था।

प्रवचन के बाद यशोधर सब्जीमंडी गये। उन्हें बहुत ही अच्छा लगता अगर उनके बेटे ये जिम्मेदारियाँ खुद निभा पाते। परंतु जब भी यह बात निकलती वे दूसरे की और संकेत कर देते। बड़े बेटे का अपना वेतन पिता के हाथ में न देना भी उन्हें समहाउ इंप्रॉपर मालूम होता है। लेकिन बेटे ने पिता का यह क्वार्टर तक अपना बना लिया। अपना पैसा अपने ढंग से इस घर पर खर्च करते हैं। उस दिन जब सब्जी का झोला लिये क्वार्टर के पास पहुंचे तो उन्हें लगा जैसे किसी गलत जगह आ गए। घर के बाहर सजावट थी और कुछ लोग विदा ले रहे थे। बड़े बेटे को देखा तो अश्वस्त हुए लेकिन कुछ समय तक बाहर। हो खड़े रहे। उसके बाद उन्होंने पत्नी और बेटी को देखा जो लोगों को विदा कर बरामदे में खड़े थे। जब कार वाले लोग चले गये तो वे क्वार्टर में कदम रखा। भीतर पार्टी चल रहीं थी, उनके सिल्चर वैडिंग के अवसर पर लेकिन यह भव्य पार्टी यशोधर बाबू को समाहाठ ईप्रापर ही लगी। गिरीश जो उनकी पत्नी का चचेरा भाई था, वहाँ मौजूद था। | वहाँ उपस्थित सभी ने यशोधर बाबू को बधाई दी। उसके बाद केक काटा गया, पत्नी को केक खिलाया परंतु स्वयं नहीं खाया। यहां तक की लड्डू खाना भी अस्वीकार कर क्योंकि उस समय तक उन्होंने संध्या नहीं की थी। पंद्रह मिनट की पूजा आज वे ज्यादा देर इसलिए लगा रहे थे, ताकि सारे मेहमान चले जाए। ये उस समय को टालना चाहते थे। वे किशनदा से बात करना चाहते थे। उन्हें लगता था कि वही उनका मार्गदर्शन कर

पायेंगे। वे दुविधा में थे कि बीबी बच्चे द्वारा किये गये काम के प्रति उनका रवैया कैसा होना चाहिए। उसी बीच पत्नी द्वारा झिड़के जाने पर लाल गमछा पहनकर बैठक में आये। उनका इस तरह गमछा पहनना बच्चों को अखरता था। इसलिए पहले ही सफाई देते हुए कहा कि मेहमान चले गये इसलिए गमछा पहना जा सकता है। लेकिन बेटी ने उन्हें टोका तभी उनकी नजर मेज पर पड़ी पैकेटों पर पड़ी पूछने पर पता चला कि यह उनके लिए प्रेजेंट हैं। बड़े बेटे भूषण ने बड़ा-सा पैकेट खोलकर ऊनी ड्रेसिंग गाउन निकाला और पिता की ओर बढ़ाते हुए पहनने के लिए कहा और पिता से कहा कि दूध लाते समय यह गाउन पहनकर जाया करे। गाउन पहनकर उनकी आंखों के कोर में नमी आ गई। उन्हें अपने बच्चों द्वारा किये गये पार्टी का आयोजन का जगह अगर यह कहते कि दूध मैं ला दिया करूंगा तो ज्यादा खुशी होती। उन्हें खुशी उस समय होती जब उनके बच्चे उनकी भावनाओं को समझते।

आरोहो : काव्य खंड

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1. दिन जल्दी-जल्दी ढलता है  Click Here
2. कविता के बहाने Click Here
3. कैमरे में बंद अपाहिज Click Here
4.सहर्ष स्वीकारा है Click Here
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6.कवितावली (उत्तर कांड से ) Click Here
7.रूबाइयाँ Click Here
8.छोटा मेरा खेत Click Here
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आरोहो : गद्य खंड

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1.बाजार दर्शन Click Here
2.काले मेघा पानी दे Click Here
3.चार्ली चैप्लिन यानी हम सब Click Here
4. नमक Click Here
5.शिरीष के फूल Click Here
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7. पहलवान की ढोलक Click Here
8.श्रम विभाजन और जाति प्रथा Click Here

वितान

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प्रश्नोत्तर

1. यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों ?

उत्तरः यशोधर बाबू समय के साथ ढल सकने में असफल रहते है क्योंकि सदैव उनके भीतर एक द्वन्द चलता रहता है। यह द्वन्द है ‘जो हुआ होगा’ और समहाउ इंप्रापर का जो हुआ होगा में यथास्थितिवाद यानी ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने का भाव है तो समहाउ इंप्रापर में एक अनिर्णय की स्थिति भी है। ये दोनों ही स्थितियाँ यशोधर बाबू के हालात को ज्यों का त्यों स्वीकार कर बदलाव को असंभव बना देने की ओर ले जाते हैं। यशोधर बाबू किशनदा को अपना मार्गदर्शक मानते थे। किशनदा का मानना भले ही हम आधुनिकता की ओर बढ़े पर हमें हमारी संस्कृति को नहीं भुलना चाहिए। इसी कारणवश यशोधर बाबू समय के साथ नहीं ढल पा रहे थे। यशोधर बाबू को आधुनिकता समहाउ इंप्रापर सा लगता है। इसीलिए वे आधुनिकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

2. पाठ में ‘जो हुआ होगा’ वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकत ( सकती है ?

उत्तर: पाठ में जो हुआ होगा’ का प्रयोग अनिश्चिता के अर्थ में किया गया है।

यशोधर बाबू किशनदा की मृत्यु का कारण उसके एक बिरादर से पूछते है, तब वह कहता है कि जो हुआ होगा अर्थात उसे पता नहीं क्या हुआ था।

दूसरी बार ‘जो हुआ होगा’ का प्रयोग अकेलेपन के अर्थ में किया गया है। जब यशोधर आबू किशनदा से जब पूछते है कि ‘जो हुआ होगा’ से मृत्यु कैसे हुई तो वह बताते है कि हर आदमी की मृत्यु इसी से होती है। चाहे वह अमीर हो या गरीब, गृहस्थ हो या ब्रह्मचारी जीवन के शुरुआत और आखिर में सब अकेले ही होते है उनका मानना है कि दुनिया में अपना कोई नहीं होता।

3. ‘समहाउ इंग्रापर’ वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं। इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है ?

उत्तर: मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखी यह एक लम्बी कहानी है। लेखक ने इस कहानी में आधुनिकता की ओर बढ़ता हमारा समाज एक ओर कई नयी उपलब्धियों को समेटे हुए है तो दूसरों ओर मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाले मूल्य जो कहीं घिसते चलें जा रहे है, उसको दर्शाया है। ‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्याशं का प्रयोग यशोधर बाबू अपने हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं। यह वाक्यांश उनके ऐसे व्यक्तित्व को प्रकाश में लाता है जिसके भीतर द्वन्द चल रहा है। यह द्वन्द है जो हुआ होगा और समहाउ इंद्रापर का यह एक ऐसे द्वन्दशील व्यक्ति को दर्शाता है, जो अनिर्णय की स्थिति में है। जहां वे बच्चों की तरक्की से खुश है, वहीं समहाउ इंप्रापर यह भी अनुभव करते हैं कि यह

खुशहाली भी कैसी जो अपनों में परायापन पैदा करें। इस कहानी में लेखक ने एक आम आदमी के भीतर चल रहे इसी द्वन्द को कहानी का बीज बनाया है।

4. यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्वपूर्ण योगदान रहा और कैसे ?

उत्तर: किशनदा का यशोधर बाबू की जीवन को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मैट्रिक पास कर जब पहली बार यशोधर बाबू दिल्ली आये थे, तो किशनदा ने उन्हें शरण दी उम्र कम होने के कारण पहले तो उन्हें नौकरी नहीं मिली तब उन्होंने उसे मैस का रसोइया बनाकर रख लिया और बाद में अपने नीचे नौकरी दिलवाई। इनता ही नहीं किशनदा यशोधर को आर्थिक सहायता भी करते थे। वे हर तरह से उनका मार्गदर्शन करते थे। यशोधर बाबू भी इसी कारणवश उनके बताये हुए मार्ग का अनुशरण करते थे।

मेरे जीवन को दिशा देने में मेरे माता-पिता का महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मेरे माता पिता ने शिष्टाचार, आचार-व्यवहार सिखाया है। उनके योगदान के कारण ही में उच्च शिक्ष प्राप्त कर रही हैं। उनके कारण मैंने अपने अस्तित्व को पहचाना है। यह शिक्षा मुझे मेरी राह चुनने में तो मदद करेगा ही साथ ही मुझे एक जिम्मेदार आदमी के रूप में प्रतिष्ठित करायेगा।

5. वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं ?

उत्तर: परिवार को मंचरना के लिए आवश्यक है उसके सदस्यों का कत्तर्व्यबोध परिवार तभी सुचारू रूप से चल सकता है, जब परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के प्रति दायित्वशील हो। वर्तमान समय में परिवारों में एक देखा जाता है। कहने को तो एक परिवार में रहते है, परंतु उनके विचारों, सोच में एक बड़ा अंतराल होता है। इस कहानी । के यशोधर बाबू के परिवार में भी वही बात परिलक्षित होती है। उनका परिवार साथ रहता है, परंतु उसमें बिखराव है। यशोधर चालू और आधुनिकता की और बढ़ते उनके बच्चों के बीच एक अन्तराल आ गया है। पत्नी भी बच्चों का ही साथ देती है।

6. निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे कहेंगी और क्यों ?.

क) हशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य

ख) पीढ़ी का अंतराल

ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव

उत्तर : (क) हशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य क्योंकि वर्तमान समय में मानवीय मूल्य कहाँ रखो जाते रहे है। इस कहानी में यशोधर बाबू के बच्चे आधुनिकता के कई उपलब्धियों की समेटे आगे बढ़ रहे थे, परन्तु अपने पिता की भावनाओं को समझ सकने को प्रयत्न नहीं कर रहे थे। इसलिए पिता और बच्चों में एक अंतराल आ गया था। अपने घर और विद्यालय के आस-पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें। जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुजुगों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने का कारण क्या होंगे ?

उत्तर: मेरे पर और विद्यालय के आस-पास बहुत से बदलाव हो रहे है। सड़के बनायो जा रही है. शहर के विकास का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। लेकिन इस बदलावों में कुछ ऐसे बदलाव भी शामिल है, जो हमारे बुजुगों को अच्छे नहीं लगते हैं। खाली जगहों बड़ी बड़ी इमारते, शोपिंग मॉल आदि बनाये जा रहे हैं, जिससे बुजुर्गों के सैर करने की

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